– उमेश चतुर्वेदी

गृहमंत्री पी चिदंबरम के हिंदीओ बोलत कमे देखल-सुनल गइल बा. खालिस अंग्रेजी में सांसदन के सवालन क जवाब देबे वाला पी चिदंबरम अगर भोजपुरी में बोले के मजबूर हो जासु त बूझ लीं कि भोजपुरी क बारे में राजनीतिक नजरिया बदले लागल बा. गौर करे लायक बाति इ बा कि चिदंबरम ओह तमिलनाडु से आवेलन जहवाँ साल 1967 में हिंदी विरोधी आंदोलन तेज भइल रहुवे.

अब चूंकि 17 मई 2012 के गहमंत्री लोकसभा के आश्वस्त कइले बाड़न कि भोजपुरी के संविधान के अठवीं अनुसूची में शामिल करावे के ठोस प्रस्ताव मानसून सत्र में ले आवल जाई, एकरा पूरा ना होखे के अनेसा ना जाहिर कइल जा सके. हालां कि इतिहास गवाह बा कि तीस अगस्त दू हजार दसो कें इहे सवाल कांग्रेस के संजय निरूपम आ जगदंबिका पाल अउर राजद के रघुवंश प्रसाद सिंह उठवले रहलें तबो सरकार से अइसने कुछ आश्वासन मिलल रहुवे.

संविधान के अठवीं अनुसूची में भोजपुरी के शामिल ना हो पवला के बड़का वजह सरकार क मयभावत नीति त बड़ले बा, भोजपुरियन क आपन सोचो एगो वजह बा. हिंदी के भोजपुरीभाषी बड़हन इलाका के सबले बड़ आपन सोचो रहल बा. हकीकत बा कि भोजपुरियन के सोच हमेशा से राष्ट्रीय रहल बा. भोजपुरी भाषी लोग अपना के राष्ट्रीयता से बेसी जुड़ल मानत आइल बा. आ शायद एही चलते भोजपुरी के स्वाभिमान क सवाल ओकरा वइसे परेशान ना करे, जइसे मैथिलभाषियन भा दोसर भाषा-भाषी समूहन के करेला. एकरा बावजूद अगर भोजपुरी के अठवीं अनुसूची में शामिल करे के सुगबुगाहट शुरू भइल बा त ओहमें सबले बड़हन योगदान एह इलाका के सक्रिय संस्कृतिकर्मियन आ साहित्यकारन के बा. ईश्वरचंद्र सिन्हा, विवेकी राय, मोती बीए, विद्यानिवास मिश्र, अनिल कुमार आंजनेय, पांडेय कपिल, भगवती प्रसाद द्विवेदी जइसन तमाम धुरंधर भोजपुरी को उहे मान्यता दिआवे ला सांस्कृतिक अलख जगवले रखलें जइसन दोसर भाषाई लोग कइल. बाकिर दुर्भाग्य बा कि भोजपुरिया समाज में आन-बान खातिर लड़े-मरे वाल तेवर कबहियों ना लउकल. संविधान में भाषावन के राजकीय हैसियत देबे वाली अठवीं अनुसूची में पहिले चौदहे गो भाषा रहली सँ. साल 1967 में संशोधन करके सिंधी के शामिल कइल गइल. बाद में दोसरो भाषन खातिर आंदोलन होखे लागल त 1992 में मणिपुरी, नेपाली अउर कोंकणी के शामिल कर लिहल गइल. लेकिन देश के एगो बड़हन हिस्सा के आकांक्षा ना पूरल. से साल 2004 में मैथिली, बोडो, संथाली आ डोगरी के शामिल कर लिहल गइल. बाकिर एह सगरी कवायद में पांच महाद्वीप, 12 गो देशम समेत देश के महानगरन दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, नासिक, लुधियाना, वगैरह के एगो बड़हन आबादी के भाषा भोजपुरी उपेक्षिते रह गइल. बिहार में पहिला नंबर पर बोले जाए वाली भाषा अठवीं अनुसूची में जगह बनावे में एहसे कामयाब ना भइल कि ऊ राजनीतिक आकांक्षा क प्रतीक भाषा ना बन पाइल. लेकिन संसद में अब जे तरह ओकरा खातिर सवाल उठावल जात बा ओहसे एक बाति त साफ हो गइल कि इहो भाषा आपन राजनीतिक हैसियत बनावे ओरि बढ़े लागल बिया.

भोजपुरी के मान्यता के राह में एगो बड़हन बाधा एकरा के भाषा मनले स इंकारो रहल बा. भाषा खातिर जरूरी साहित्य के कमी के रोना लोग रोवत रहल बा. बाकिर अब भोजपुरीओ में बहुते साहित्य रचाए लागल बा. हजारी प्रसाद द्विवेदी जइसन विद्वान कबीर क वाणियनो में भोजपुरी के अनगिनत ठेठ शब्द खोज निकलले बाड़ें. अब जवना तरह चिदंबरम भोजपुरी बोल के एह इलाका के सांसदन क दिल जीते के कोशिश कइले बाड़ें, ओहसे एगो उमेद जरुर बनल बा. बाकिर सवाल ई बा कि का मान्यता हासिल कइला क बाद भोजपुरी अपना लोगन के राजनीतिक आकांक्षा पूरावे आ जरूरी सामाजिक हैसियत हासिल करावे में मददगार साबित हो पाई.


उमेश चतुर्वेदी के ब्लॉग मीडिया मीमांसा से साभार


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