याद बा हॉस्टल के ऊ रात जब बिजली चल जात रहुवे. एगो कवनो कोना से आवाज उठी आ थोड़ही देर में पूरा हॉस्टल तरह तरह के आवाज से गूंजे लागी. कुछ लोग त एहले आवाज निकाली कि मन के डर खतम होखे त बाकी लोग ओह हुँआ हुँआ में आपन आवाज मिलावे लागी. कारण कि ओह अन्हार से सभे परेशान रहत रहे आ ओह परेशानी से निबटे के कवनो राह ना रहत रहे. बिजली त तबे आई जब ओकर मन करी. स्वाभाविक रूप से एह शोर से ओह परेशानीए के अभिव्यक्ति होखत रहुवे.

अब आईं. आजु हमनी के देश में सत्ता के बिजली पता ना कब से गायब बिया. लागत नइखे कि कवनो सरकार के देश के चिन्ता होखे. सगरी राजनीतिक दल अपने भला खोजे में परेशान बाड़े. जे सत्ता में बा ऊ आपन सत्ता बचवले राखे में लागल बा त जे विरोध में बा ऊ सत्ता के स्वाद लेबे ला परेशान बा. पहिले का जमाना में पत्रकारिता एगो जुनून होखत रहे. पत्रकारन का मन में एगो बड़हन उद्देश्य रहत रहुवे जवना ला ऊ हर कठिनाई झेलत जनहित के बात खातिर आवाज उठावत रहले. गँवे गँवे पत्रकारिता जुनून ना रह के धंधा बन गइल आ अब पत्रकारिता के मतलब धन उगाही होखल जात बा. अगर ई साँच ना रहीत त भाषाई अखबार ग्रामीण पत्रकारन के टोली ना बनवते आ दृश्य मीडिया में सिटीजन जर्नलिस्ट के प्रचलन ना होखीत. एहसे दुनु पक्ष फायदा में बा. मीडिया तनखाह देबे ला मजबूर ना होखे भा कुछ टुकड़ा फेंक दिहल जाला एह ग्रामीण पत्रकारन का सोझा. आ ऊ लोग अपना पत्रकार होखला के धौंस देखा के धन उगाही में लाग जाला. नइखीं कहत कि सभे अइसने बा बाकिर जवना चिलम पर ई चिंगारी चढ़ेले से बहुते बढ़िया से जानेला ई सब.

आजादी का पहिले से ले के आजादी का बहुत दिन बाद ले अखबारे एगो माध्यम रहत रहुवे समाचार के. तब अखबारन में संपादक का नामे चिट्ठी लिखल आ ओह चिटठी के छप गइल बहुते बड़ उपलब्धि मानल जात रहुवे. गँवे गँवे अखबार के सामग्री संपादक के अधिकार क्षेत्र से निकाल के प्रबन्धक का अधिकार क्षेत्र में, भा सीधे मालिक का नियन्त्रण में, जाये लागल. मालिक भा प्रबन्धनो पोसुआ होखत गइले आ एकर सबले खराब रूप लउके लागल दृश्य मीडिया में. आम आदमी के आवाज गँवे गँवे बिसरा दिहल गइल, संपादक का नाम चिट्ठी या त खतम कर दिहल गइल भा कवनो कर्मकाण्ड का तरह जगह भरे का कामे आवे लागल. ओह चिट्ठियन के सामग्री प्रकाशक प्रबन्धक के व्यावसायिक हित से मेल ना खाव से ओकनी के जगह मिलल मुश्किल हो गइल.

अइसने माहौल में सामने आ गइल सोशल मीडिया. ट्वीटर आ फेसबुक एगो बड़हन ताकतवर मीडिया में बदल गइल. हालांकि फेसबुक के प्रवृति ओकरा के आत्म प्रशंसा के माध्यम बना दिहलसि जबकि ट्वीटर जनता के आवाज जस बनत गइल. ट्वीटर पर अधिकतर सरकार के, प्रशासन के, भँड़ुआ पत्रकारन के खिलाफ आवाज उठावल जाला. ट्वीटरे के ताकत का डर से भँड़ुआ मीडिया कुछ काबू में आवत नजर आवत बा. हालांकि सरकार आ प्रशासन परेशान बा एह चहचहाहट से. ओकरा बूझात नइखे कि कइसे काबू करे एह ट्वीटरन के. मीडिया के त लाइसेंस, विज्ञापन, पेड न्यूज का जरिए काबू कर लिहलसि सरकार बाकिर ट्वीटर पर का करे?

कुछ दिन पहिले ले हर विरोध प्रदर्शन, रैली,जुलूस का पीछे कुछ आयोजक रहत रहले. ई आयोजक राजनीतिक गोल होखसु भा लेबर यूनियन, भा कवनो तरह के संगठन. एहसे हर विरोध का पाछा कुछ निहित स्वार्थो रहत रहुवे आ सरकार के पता रहत रहुवे कि एह विरोध का पाछा के बा जवना चलते ओकरा सुविधा रहत रहुवे सौदा पटावे के. बाकि ट्वीटर सगरी खेल बिगड़ले जात बा. हाल के बलात्कार विरोधी रैली में ट्वीटर के ताकत के पहिला प्रदर्शन देखे के मिलल बा सरकारो के आ बाकी राजनीतिक गोलो के. बिना कवनो नेता, बिना कवनो संगठन, बिना कवनो पोस्टर बैनर प्रचार के हजारो हजार लोग जुट गइल. पहिला बेर राष्ट्रपति भवन जाए वाला राह पर विरोध जतावे वाला जुटलन आ सरकार के मजबूर होके रूस के राष्ट्रपति पुतिन के स्वागत के जगहा बदले के पड़ल.

अन्ना हजारे के रैली आ केजरीवाल के आन्दोलन जनता के आवाज ना रह गइल काहे कि एह लोग के आपसी विरोधाभा सगरी आंदोलन बरबाद कर दिहलसि. पहिला बेर त लागल कि अब शायद फेर कबो जनता ना जुटे कवनो विरोध में बाकि ट्वीटर फेसबुक का जरिए भइल बलात्कार विरोधी आन्दोलन आसरा दे दिहलसि कि ना अब जनता के आवाज दबावल आसान नइखे. ऊ देर सबेर सड़क पर निकलिए आई. सरकारो पूरा ताक में बिया कि कइसे एह सोशल मीडिया के काबू में ले आवल जाव आ एह काम में ओकरा मीडिया के मुख्य धारा के सहरो मिलत बा जम के. काहे कि ओहू लोग के दिक्कत हो गइल बा आपन भँड़ुआगिरी करे में.

एहसे अगर अबही ले रउरा ट्वीटर पर नइखीं त देर मत करीं. जल्दी से ट्वीटर पर आपन खाता खोल लीं आ चहचहाइल शुरू कर दीं. रउरा के बतावत चलीं कि अँजोरियो के आपन खाता बा ट्वीटर पर. आईं अँजोरिया के फालो करीं, आपन ट्वीट कइल करीं, आ तब अँजोरियो के सुविधा हो जाई रउरा सभे के फालो करे में.

कवि नीरज के एगो पंक्ति दोहरावे के लालच टार नइखीं पावत कि,

बदतमीजी कर रहे हैं आज फिर भौंरे चमन में
साथियों, आँधी उठाने का जमाना आ गया है.
न्याय का चोगा पहन कर है खड़ी चंगेजशाही,
तुम नहीं अब भी उठे तो फिर जमाना क्या कहेगा?

भा दुष्यन्त के शब्दन में,
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए.
मेरे सीने में न सही, तो तेरे सीने में सही,
हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए..

– ओमप्रकाश सिंह

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