– अमितेश कुमार

बीतल कुछ दिन के एगो खबर ई रहे कि महुआ चैनल के सुर-संग्राम के फ़ाइनल में हंगामा हो गइल, जेकर चलते कार्यक्रम रद्द क देहल गइल. फ़ाइनल के आयोजन पटना के विख्यात आ ऐतिहासिक गांधी मैदान में भइल रहे. पिछला दु साल से गांधी मैदान ई हंगामा होत देखता जबकि एह मैदान पर सभा करे के एगो ऐतिहासिक रेकार्ड बा. स्वतंत्रता संग्राम के समय के होखे भा स्वतंत्रता के बाद, लोकतंत्र के विकास से संबंधित होखे, गांधी मैदान हर प्रकार के सभा के आयोजन ला एगो माकुल जगह बा. इहो बात ध्यान राखी कि एही मैदान पर प्रसिद्ध ‘पुस्तक मेला’ आ औरो भी कई प्रकार के मेला लागल करेला. खैर ई सब बतावे के मकसद इहे बा कि ई सारा आयोजन शांतिपुर्वक ही अक्सराहां संपन्न हो जाला. फ़ेर का कारण बा कि सुर-संग्राम के एह आयोजन में हंगामा हो गइल? कारण जे भी होखे ई नया बन रहल बिहार के छवि ला ठीक नईखे.

कार्यक्रम में हंगामा के कारन बतावल गइल बा कि कुछ विद्यार्थी लोग बिना पास के कार्यक्रम में घुसे के चेष्टा करत रहे. असफ़ल भइला पर ऊ लोग हंगामा कइलक आ कार्यक्रम रद्द क देहल गइल. हम नईखी जानत कि कार्यक्रम के पास मिले के व्यवस्था का रहे. लेकिन, सुर-संग्राम के लोकप्रियता के देख के चैनल पर्याप्त व्यवस्था कइले होई. आ अइसन हर कार्यक्रम में ई आशंका रहेला कि अइसन कुछ तत्त्व अईहें, जे बिना अधिकार घुसे के कोशिश करीहें. कार्यक्रम संचालक के ई बात के अंदाजा होइ. एह अनाधिकार प्रवेश के रोकेला सुरक्षा के का उपाय रहे ? पटना पुलिस आ महुआ चैनल एकरा प्रति केतना गंभीर रहे ? कहल जाता कि सुरक्षा पर्याप्त ना रहे. सही बात बा, अगर सुरक्षा पर्याप्त रहित त मामला एतना गम्भिर ना होइत. जाहिर बा की पुलिस एह आयोजन के गम्भीरता से ना लेलक भा जान बुझ के सुरक्षा में लापरवाही भइल. ई गौर करे वाला तथ्य बा. काहे कि एह देश में जहां हर दु महिना पर बम विस्फ़ोट होता, ओह समय में एतना लमहर आयोजन के सुरक्षा के ले के लापरवाही बरतल गइल. एकरा लेले पुलिस आ चैनल दुनु से जवाबतलब करे के चाहीं.

खैर, सारा दोष पुलिस आ चैनल के ना दे के कुछ छात्र भा ओह उत्पाति भीड़ के प्रवृतिओ पर विचार करे के पडी. काहे कि रऊआ के अगर अइसन कौनो कार्यक्रम में घुसे ना दियाई त रऊआ उहां तोड़-फ़ोड़ करब ? सबसे पहिले रऊआ पास के जोगाड़ करतीं आ ठाट से कार्यक्रम के आनंद लेती. लेकिन ना… भीड़ के ई प्रवृति ठीक नईखे. आज जबकि ए बात पर विचार कइल जाता कि बिहार में फ़िल्म के शुटिंग के संभावना बढावल जाव. कुछ निर्देशक ई साहस करतो बाडे, ई घटना एगो खराब संकेत देता. अइसे ई सुधार हमनी के अपना व्यक्तिगत स्तर पर भी करे के पड़ी. तबे बिहार के छवि सुधरी.

एगो तर्क ई आइल कि ई उपद्र्व चैनल द्वारा फ़ैलावल गइल अश्लीलता के विरोध में कइल गेल. एह तर्क के हम निंदा कर तानी. काहे से कि विरोध कि ई तरीका ना ह. वइसे भोजपुरी मनोरंजन उद्योग में आज अश्लीलता एगो बड़ समस्या बा. फ़िल्म आ गीत के साथे साथे चैनलो एकर जिम्मेवार बा. लेकिन ऊ लोग ज्यादा जिम्मेवार बा जे ए अश्लीलता के हिस्सा बा. जइसे रवि किशन के उदाहरण लीं. रवि किशन भोजपुरी के अलावाहू कई गो भाषा में काम करतारे लेकिन उनकर भोजपुरी के काम आ अन्य भाषा के काम में अंतर देखीं. उ एगो स्थिति में बाड़े कि अश्लीलता के खिलाफ़ अभियान चलावस लेकिन उहो एकरा के भुनावतारें. अश्लीलता से निबटे के प्रयास हमनी के अपना ढंग से करे के पड़ी. तबे भोजपुरी के छवि में सुधार होई. कुछ लोग एह ढंग के प्रयास करत बा.

अब महुआ चैनलो पर कुछ बात क लेहल जाव. ई चैनल अपन शुरुआती रफ़्तार के खो देले बा. हिन्दी के नकल से केतना दिन काम चल सकता ? भोजपुरी के कहानी आ ओकर समाजो एकरा कार्यक्रम में आवे के चाही. कुछ कार्यक्रम अइसन बा जइसे कि “ढिसुम ढिसुम”. जहां तक सुर-संग्राम के बात बा, त एकर फ़ार्मेट के बदल देवे के चाही. यू.पी. आ बिहार के कब तक मुकाबला होई ? भोजपुरिया समाज के प्रांतीयता में ना बांटे के चाही. अंत में इहे कहे के चाहतानी कि ए मामला के जांच होखे. आ तब तक हमनी के अपना उपरो विचार करी जा. चैनल, पुलिस आ राज्य सरकारो ए मामला के गंभीरता से लेवे. काहे कि ए हंगामा से एगो गलत संदेश जाता.


अमितेश कुमार दिल्ली विश्वविद्यालय से हिन्दी में पी॰एचडी॰ कर रहल बाड़े.
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