हम त अपना बेटा से परेशान बानी. 60 हजार रुपिया मकान से किराया मिलेला आ ऊ हमनी के साठो रुपिया ना देव. हम मरद मेहरारू कबो कवनो रिश्तेदार के दीहल खाना खा लेलीं त कबो रो रो के रात बीता देनी सँ. अपने घर में बेगाना बना दीहल गइल बा हमनी के. अधिकारियन किहाँ गइनी सँ, बाकिर कुछऊ ना भइल. अब कहाँ जाईं केने जाईं बुझात नइखे. लोग कहत बा कि अदालत के सहारा ल लोग, बाकिर ओकरो ला त साधन चाहीं, राह मालूम होखे के चाहीं. ई कहत कहत ऊ सुबुके लगलन. उनकर नाम पता जनला से कवनो फायदा नइखे ना ही कवनो जरूरत बा. ना त बेटा घरे से निकाल दी त का कर पाई ऊ लोग.

अइसनो एक आदमी के जानत बानी जिनकर घर मकान रहला का बावजूद उनकर बाप महतारी अपना आखिरी दिन में टीसन पर रहि के भीख माँगे खातिर मजबूर हो गइलें आ बाद में टीसने पर ओह लोग के मौतो हो गइल.

हालही में एगो मामिला दिल्ली के नांगलोई में सामने आइल रहे. ओहिजा 76 साल के मुन्नी बेगम के उनकर तीन गो बेटा जंजीर से बान्ह के राखत रहले. जाड़ा, गरमी, बरखा में खुला आसमान का नीचे रहत ओह बुजुर्ग के एगो एनजीओ के शिकायत का बाद पुलिस उनका के बचा के बेटन पर केस दर्ज कइलसि.

ई सब छिटपुट घटना नइखे रह गइल. हालही में दिल्ली के एगो अदालत में 76 बरीस से अधिका उमिर के बूढ़ महतारी बाप के घर से बाहर निकाले खातिर कइल एगो केस में जज वकील से पूछलन कि बेटा कहाँ बा? त वकील बतवले कि शिरडी गइल बाड़े दर्शन करे खातिर. एह पर अदालत के कहना रहे कि लोगो अजीब तरह के पूजा करे लागल बा. एक तरफ त अपना महतारी बाप के घर से निकाल देलें आ दोसरा तरफ मंदिरे मंदिर पूजा दर्शन करे घूमत रहेलें. वकील के तर्क रहे कि संयुक्त परिवार के संपत्ति में बेटो के हिस्सा मिले के चाहीं. एह पर उनुका के फटकारत अदालत कहलसि कि जब रउरा अपना महतारी बाप के आदर मान नइखीं कर सकत त उनुका संपत्ति में राउर कवनो हक ना बन सके. समाज में एह तरह के धारणा बनल जात बा कि बुढ़वा बुढ़िया फालतू हो गइल बा. ओह लोग के अनदेखी होखे लागल बा. एह चलते बूढ़ लोग सामाजिक जीवन से कटे लागत बा आ ओह लोग का सोझा आपन जिनिगी इज्जत के साथ बितावे में दिक्कत होखे लागल बा.

अइसनो नइखे कि हर परिवार में इहे सब होखत बा. बाकिर वइसन परिवारन के गिनिती दिन पर दिन घटले जात बा. कुछ नयका लोग त संयुक्त परिवार के फायदा त लीहल चाहत बाड़े बाकिर ओकरा टूट के दोस बाप महतारी का कपारे डाल देत बाड़े. बुढ़वन के टोकाटोकी आ जरूरत पूरा करे से आपन देह बचावल चाहत बाड़े. ओह लोग के अपना लड़िकाईं के ऊ दिन याद ना आवे जब इहे बाप महतारी ओह लोग के हर जिद्द, हर फरमाइश पूरा करे ला तइयार रहत रहलें. ई लोग ई बात काहें नइखे बूझल चाहत कि बुढ़ापा एक तरह से बचपने के लवटल ह. जब शरीर कमजोर होखत जाला आ मन बेचैन. हमनी का आपन कर्तव्य काहे भुलाइल जात बानी?

जीवन के आखिरी दिन चलत बा त परिवार के माहौल अइसन बनाईं जहाँ घर के पुरनियन के मान सम्मान मिलत रहो आ ओह लोग पर पूरा धेयान दीहल जाव. बुढ़वन का लगे अनुभव, संस्मरण, यादगार के बड़हन भण्डार होखेला जवन नवहियन ला धरोहर होखे के चाहीं, ओकरा के संजो के राखल हमनी के जिम्मेदारी बनेला.

सरकारो के चाहीं कि बुढ़ापा के दिन काटे खातिर पेंशन आ पुनर्वासन क के ओह लोग के सम्मान देव. जीवन में सबले नीमन काम होला अपना महतारी-बाप के सेवा. एकरा के भगवान के पूजा का बरोबर मानल जाला. महात्मा चाणक्य कहले रहलन कि ‘वृद्ध सेवाय विज्ञाननम्’. माने कि बुढ़ पुरनियन के सेवा से खास ज्ञान मिलेला. हमनी के शास्त्रन में महतारी-बाप आ गुरू के बड़हन महिमा बतावल गइल बा. जे लोग एह तीनो के आदर, सम्मान दे के खुश राखेला ऊ तीनो लोक जीत लेला.

देश के औसत उमिर बढ़ला का साथ ही देश में बुढ़वनो के गिनिती लगातार बढ़ल जात बा. जब ले ओह लोग के शरीर चलेला तब ले ऊ लोग परिवार के भार ना बने बाकिर देह गिरते ऊ लोग परिवार के भार बन जाला. परिवार टूटेला त दादा दादी, बाप महतारी तक के बँटवारा होखे लागल बा. ओह लोग के छोटो जरूरत खातिर परिवार में कलह होखे लागेला. हमनी के सोचे के चाहीं कि अइसन काहे होखत बा.

आखिर इहे पुरनिया जब मरेलें त ओह लोग के श्राद्ध त पूरा ताकत लगा के होला, मरला का बाद बड़हन बड़हन भोजभात दिआला. बाकिर जियते जियत ओह लोग के सुधि नइखे लिआत. मजल में सुनहूं के मिलेला कि अब का ओढ़ावेलऽ हो चदरिया चलन का बेरिया?

आखिर हमनी का, हमनी के समाज, हमनी के सरकार राष्ट्र के एह बेशकीमती धरोहर से अनमना काहे बा? अपना पुरनियन के अपमान क के केहु महान ना बन सके इहो याद राखल जरूरी बा.


अशोक भाटिया,
सेक्रेटरी,
वसई ईस्ट सीनियर सिटिज़न असोशिएशन
जिला – पालघर, (मुंबई)
फोन – 07757073896

(हिन्दी लेख का आधार पर भोजपुरी में पेश कइल गइल बा एह लेख के – संपादक)

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