– डॉ प्रकाश उदय

भइया हो, (पाती के संपादक) जतने मयगर तूँ भाई, संपादक तूँ ओतने कसाई। लिखे खातिर तहरा दिकदिकवला के मारे असकत से हमार मुहब्बत बेर-बेर बीचे में थउस जाला, बाकिर तवना खातिर तहरा मने ना कवनो मोह ना माया। के जाने कवन कुमुर्खी तहरा घेरले बा कि भोजपुरी के पोंछ तहरा से छुटले नइखे छूटत। हिंदी के अतना मानिन्द-मानिन्द बिदमान लोग नरेटी फार-फार के बतावत बा कि भोजपुरी के बढ़न्ती से हिंदी के बड़ा भारी नुकसान होई तब्बो तहरा होश नइखे होत। हिंदी के नुकसान माने सीधे-सीधे हिंद के नुकसान, अतना त तहरा बुझाते होई! तब्बो तूँ , भोजपुरी में लिखे के के कहो, लिखवावहूँ से बाज नइखऽ आवत। अपने त अपने, हमरो के चाहऽ तारऽ कि ओही में घसेटले रहीं।

जानत बाड़ऽ कि हम हिंदिए के महटरई करींला, ओकरे कमाई खाईंला। अइसना में तहरा फेरा में परि के हमहूँ अगर एह भोजपुरिए के बढ़न्ती बतियाइब त अपना ‘हिंदी-बचाओ-भाई-जी-लोग’ के भला कवन मुँह देखाइब ! हिन्दी के खा के भोजपुरी के बजाइब त ई भाई जी लोग लागी हमारे के बजावे। गनीमत कहीं कि रामविलास शर्मा इन्हन लोग के उपराये से पहिलहीं सिधार गइल बाड़े । ऊ बेचारू अंग्रेजी के महटरई करत रहन आ हिंदी के बढ़न्ती बतियावत रहन। कवन ठीक कि हिंदी के खा के भोजपुरी के बढ़न्ती बतियवला प पितपिताइल भाई जी लोग कहियो उनुको फँफेली ना पकड़ लिहित कि ‘तुम अंग्रेजी का खा के हिन्दी का काहे बजावता है!’

जे जेकर खाय ओकरे बजावे – भाई जी लोग के ई बात हमरा त भइया हो, बड़ा मनभावन लागत बा। एक जना बीएचऊ के हिन्दी के पोरफेसर के भोजपुरी के बात बतियवला प एही भाई जी लोग में से एक जना से उनुका बारे में ई सुने के मिलल कि यह बेशर्म जिस पत्तल में खाता है उसी में छेद कर रहा है । ई सुन के हमरा अइसन जीव त बुझऽ जे अघाइए गइल। राज-रजवाड़ा आ जमींदार जी लोग के ढह-ढिमिला गइला के बाद से एह वजन के बात-बतकही सुने खातिर करेजा खखन गइल रहे। ओंइसे, हिन्दी वाला लोग हिन्दी के खाता – ईहो कवनो ब्रेकिंग न्यूज से कम नइखे । पता लगावे के चाहीं कि अतना-अतना हिन्दिहा लोग अतना-अतना दिन से हिन्दी के खाता, खाते जाता, तब्बो हिन्दी ओरात काहे नइखे ! जे खाए में लागल बा ओकरा लगन में कुछ कमी बा कि जवन खवाता तवने में थेथरई कुछ जादे बा ! भला कि भाई जी लोग अभी ईहे मान के चलत बा कि हिन्दी के खनिहार लोग हिन्दिए विभागन में पावल जाला। जहिया एह लोग कि ई पता चली कि एह देश के कुछ दोसरो-दोसर लोग दोसरो-दोसर विषय हिन्दिए में पढ़त-पढ़ावत बा, आ अपना विषय के अलावा हिन्दियो के खात बा, त सोचीं, कि भाई जी लोग के कतना मरिचा लागी—च्च्-च्च्-च्च् ।

अइसना में, रउरा भोजपुरी के बात उठा के एह भाई जी लोग के पेट प काहे लात मारे प लागल बानीं ? रउरा लाजो नइखे लागत ? इहाँ सब हिन्दी के बचावे में लागल बानीं त काहे खातिर, खाहीं खातिर न ? रउरा से केहू के खाइलो-पीयल नइखे देखल जात ? रउरा त एह बात के गुमान होखे के चाहीं कि इहाँ सब एके साथे हिन्दी के ‘खाता’ आ ‘त्राता’ दूनो के भूमिका निबाह रहल बानीं । ई कवनो मामूली बात बा जी ? जवन हिंदी अपना बले सँउसे हिन्दुस्तान के एकवट के अंग्रेजन के भगा भेजलस तवना हिंदी के भाई जी लोग बचावे के बेंवत राखत बा ! त रउआ मान लेबे के चाहीं कि ई बेंवत धुर्की-धूर-कट्ठा वाला ना ह, एकर बिगहन बिस्तार बा।

सँउसे देश के, गुजराती के गांधी जी आ बंगला के सुभाष बाबू आ असहीं जाने कवना-कवना भाषा के कतने-कतने विभूतियन के एक भाषा-बल बन के, आजादी के लड़ाई के जवन हिन्दी हिन्दुस्तान के जन-गण-मन से जोड़ देलस तवना हिंदी के एह प्रबल प्रताप के जवन भाई जी लोग कवनो गिनती में नइखे राखत,ओकरा के अतना दीन-हीन बतावत बा कि भाई जी लोग ना आपन अलम देबे, ना सहारा देबे त भहरा के गिर परे, तवना भाई जी लोग के घनघमण्ड के घनघनहट से हम त भइया हो, थरथरहट में परल बानीं आ चाहत बानीं कि तूहूँ थरथरा। जे एह हिन्दी के भोजपुरी से डेरवावत बा, मैथिली आ मगही आ अवधी आ छत्तीसगढ़ी आ बघेली आ मेवाती आ अउर-अउर से डेरवावत बा आ मान लेत बा कि एह डेरववला से हिन्दी डेरा जाई ओकरा एह हिम्मत से ना, त कम से कम, ओकरा एह हेहरई से, एह थेथर्रइं से त तहरा थरथराहीं के चाहीं।

हमरा पता बा कि भाई जी लोग के बल-बेंवत प जतना हमरा भरोसा बा ओतना तहरा नइखे । तूँ त जइसे ओकर मुँह थूर देल चाहेलऽ जे अपना भगवान के रछेया खातिर कवनो मींया के भा अपना खुदा के हिफाजत खातिर कवनो हिन्दू के कपार फोर देबे खातिर तइयार होला, कि ऊ ना बचइहें तोरा के त तें का बचइबे रे उनुका के, ओसहीं, हमरा पता बा कि हिन्दियो के बचावे के बात करे वालन खातिर तहरा लगे लबदा-लाठी छोड़ के कुछ आउर बा ना, कि हिन्दी ना बचाई तोरा के त तें का बचइबे रे हिन्दी के।

बाकिर हम त ईहे कहब कि भइया हो, तहरा हमरा भाई जी लोग के समरथ के कवनो खबर नइखे। खिसिया मत त हम तनी कोशिश करीं तहरा के समझावे के । देखऽ, भाई जी लोग के सकत के दूगो छोर बा,एगो त हिन्दी के ‘खाता’ वाला आ दुसरका हिन्दी के ‘त्राता’ वाला। पहिलका वाला के महिमा कि हिन्दी जवना के हिन्दी प्रदेश कहल जाला तवना में अतना खवा चुकल बा कि एक ओर अंग्रेजी इस्कूलन के बाढ़ बढ़ियाइले जाता आ दुसरका ओर हिन्दी से बीए-एम्मे करे वालन के परीक्षा के उत्तर-पुस्तिका उठा के देख लीं, रुपया में बारह आना में जवन भाषा पढ़े के मिली ओमें जहाँ मन तहाँ से, जइसे मन तइसे, जियते नोच-बकोट के खइला-खवइला के अनगिनत निशान मिल जाई।

ई नोचन-बकोटन चलत रहो तवना खातिर जरूरी बा कि हिन्दी के एह भोजपुरी, मैथिली, मगही, अवधी, बघेली, छत्तीसगढ़ी, ब्रजी, कौरवी, हरियाणवी, बुंदेली, कन्नौजी, मारवाड़ी, जयपुरिया, मेवाती, मालवी, कुमाउनी, गढ़वाली, निमाड़ी के इलाका से छूट-छटक के बहरी मत निकले दियाव, देश भर में मत पसरे दियाव। हिंदी यू पी,बिहार, एम पी, राजस्थान वगैरह के मिला-जुला के बनल कवनो एगो प्रदेश के भाषा ना ह, ई सँउसे देश के भाषा ह आ एह नाते एह हिन्दी प खलिसा भोजपुरियने के दावा नइखे, जतना दावा भोजपुरियन के बा ओकरा से जरिको कम भा बेसी बंगला भा पंजाबी भा मलयाली बोले वालन के नइखे — ई बात भइया हो तूहीं सोच के देखऽ कि हिन्दी के जे नोच-चोंथ के खाए-चबावे में आ एगुड़े एही परोजन से बचावे में लागल बा ओकरा कइसे सोहाई, कइसे सहाई ! आ भाई जी लोग के ई जवन सु-भाव, सु-बिचार बा कि हिन्दी के एही भोजपुरियादिक इलाका में बान्ह के राखल जाय तवन तब्बे ताड़ प चढ़े पाई जब ई भोजपुरियादिक भाषा लोग लुकाइल रही, आपन मुँह ना उठाई, संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल होखे के नाम ना लीही।

रउरा से हमार दूनो हाथ, दसो नोह जोड़ के अरज बा, निहोरा बा कि हमरा एह हिन्दी-बचाओ-छाप-भाई जिउअन के महामहान मन-भावन के समझीं, हिन्दी के देश भर में बँउड़ियाय से बचा के लरही में बान्ह के घरहीं में राखल ई लोग चाहत बा त रउआ एह लोग के ओह लोग के बरोबर मयगर मानीं जे चिरई के अपना पिंजड़ा में बान्ह के बुला एसे राखेला कि खुला आकाश में उड़ला प जान के खतरा बा। अंत में ईहो कहब कि हिंदी के ‘खाता’ बनल रहे खातिर ओकर ‘त्राता’ बने के नाम प भाई जी लोग भोजपुरी प जवन तरनाता तवना के पापी पेट के आग के राग मान के उहाँ सब के अतमा के शान्ति खातिर भोजपुरी के बात आ भोजपुरी में बात के बात कुछ हजार साल नाहिंए बतियावल जाय त का हरज ! नाहीं… कहे के माने कि तनी सोचे के त चहबे करी…


हिन्दी विभाग, श्री बलदेव पी.जी. कॉलेज,
बड़ागाँव, वाराणसी


भोजपुरी दिशाबोध के पत्रिका पाती के सितम्बर 2017 अंक से साभार

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