– डॉ॰ उमेशजी ओझा

UmeshOjha

औरत आपन पुरा उमिर अपने-आप के सुहरावे आ सम्हारे में परेशान रहेली. काहे कि हमनी के पुरूष प्रधान देश में औरतन के डेग-डेग प आहत कइल जाला. ई लोग समाज में आर्थिक नजर से अपना पति भा कवनो मरद प निर्भर रहे वाली होली. खाली बइठल औरत कुछुओ कमा के आपन पहचान बनावल चाहेली. सीधा-साधा बोली में कहीं त जुआ औरतन के अइसन कमाई के तरीका बन जाला जवन बस उनकर होला. बाजी दस रूपईया से खेलल जाउ चाहे सई रूपईया से, जुआ में जीतल पईसा बडी गरमी देबेला. जुआ आजु के नया खेल नइखे. महाभारत काल में पांडव एही खेल में आपन राजपाट आ आपन मेहरारू द्रोपदी के दाव प लगा बइठल रहले.

आजु जुआ ‘स्टेटस सिम्बल’ मानि के मनचाहा खेलल जाता. जे जुआ ना खेलल ऊ बड़ आदमी नइखे मानल जात. एह काम चलाउ कहावत के ढेर महत बा, अकसर हर पईसा वाला कहीं क्लब भा अपना घरे में जुआ के मजलिस बइठा लेत बाड़न आ लमहर हाथ मारिके, भा हारि के, दुनो में अपना के गौरवान्वित महसूस करेला लोग.

अबहीं के समय में औरत जुआ खेलत बारी ई सही बा. बाकी ई कहल तनिक कठिन बा कि कब आ कवन दशक में औरत ई मरदाना सवख के कवना जिद से अपना लिहली. बाकिर अनुमान लगावलो अतना कठिन नइखे. आजादी के बाद के करीब सत्तर बरीस में हिन्दुस्तान के औरत कहाँ से कहाँ निकलत चली जात बाड़ी सँ ई केकरो से लुकाइल नइखे. शायद ओहि क्रांति आंदोलन के एगो चरण ह जुआ के सवख. आजु मुँहबोली आधुनिकता के रूप से देखे के मिलत ओकर दूगो रूप बा – पहिला सकारात्मक आ दुसरका नकारात्मक. जुआ आधुनिकता के एगो नकारात्मक रूप ह जेकरा के औरत अपनवली.

महानगर के आबो-हवा में ताश के खेल कब घर में घुस गइल पता ना. घर के कामकाज से बेखबर कुछ सुखी सम्पन्न औरत खाली समय काटे खातिर आ आपन जायदाद के देखावे खातिर आ आपन मरद के अथाह पईसा के ठेकाने लगावे खातिर कबो एगो सहेली त कबो दूगो सहेली का साथे जुटि के ताश खेलत रहली. आम तरीका से त ताश पपलू, तीन पत्ती, रमी, ब्रिज भा आधुनिकतम मैरिज खेल से खेलल जाला.

कुछ बडहन अफिसरन के मेहरारू आ उनकर चमचिया, पईसा के कमजोर बाकी देखावा करे वाली कुछ मध्यम वर्ग के पढ़ल-लिखल, मन से विचलित औरत अपना घर-परिवार के देख-रेख के बदले जुआ खेलेली. काहें कि जुआ के उ लोग ‘स्टेटस सिम्बल’ मान बइठल बा.

ऐकरा अलग फउजी माहौलो में औरतन के जुआ धड़ल्ले से चल निकलल बा. घर में नोकर भा नोकरानी प लईकन के छोड़िके जुआ खेलत देखल गइल बा. काॅलेजिया लईकिओ लोग, मामूली घर के ऊबल औरत, दिन-राती खटे वाली नोकरानिओ ढंग से जुआ खेल लेत बाडी सँ. जमीन प खरिका भा झिटीका से लकीर खींच के, लुडो खेले वाला पासा, झिटिका भा ईमली के दानो से जुआ खेल लेला लोग. बाजी दस रूपईया के होखे चाहे सई रूपईया के. खेले वाला के बगलीए बाजी के रकम तय करेला. अबही एकेरा अलावे घरन में जुआ अब चिटफंड के नाम से बडी धूम-धाम से चल रहल बा.

ई सही बा कि जुआ के लत वाली औरतन के संख्या कम नइखे. अईसन औरतन के चाहे तीन प्रतिशत निकले चाहे बीस प्रतिषत बाकिर आधुनिकता के नाम प औरत जुआ अपनवले बाडी आ अपनावत जात बाडी.


(लेखक के एह विचार से असहमत होखला का बावजूद एह लेख के प्रकाशित करत बानी कि सभे देखो कि के तरह आदमी औरतन के कवनो ना कवनो बहाने हिनाई करे में लागल रहेलें. जुआ खाली औरते ना खेलऽ सँ, मरदो लोग जुआ कम ना खेले. बाकिर लेखक एकरा के अइसन एकांगी बना के परोसले बाड़न कि लागो कि ई बुराई सबले अधिका औरतने में बा.

पूछे वाला पूछ सकेलें कि जब संपादक एह रचना के मूल भावना से अतना खिझियाइल रहलन त प्रकाशित करे के कवन मजबूरी रहे? बस ईहे मानलीं कि हम ना चाहीं कि एहिजा बस हमरे तरह के पक्ष राखल जाव. जब जब मौका मिलेला हर तरह के राय-विचार परोसे ला तइयार रहीलें बस ओह लेख के सामाजिक मान्यता का सीमा में होखे के चाहीं.
– संपादक)


लेखक परिचय :
वाणिज्य में स्नातकोत्तर, बी॰एच॰एम॰एस॰, आ पत्रकारिता मे डिप्लोमा लिहले उमेश जी ओझा साल 1990 से लिखत बानी. झारखण्ड सरकार में कार्यरत उमेश जी के लेख आ कहानी अनेके पत्र पत्रिकन मे प्रकाशित होत रहेला.

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