-डा.अशोक द्विवेदी

bhikhari-sketch
लोकमन आ लोकरंग के चतुर चितेरा भिखारी ठाकुर आजुओ भोजपुरी के सबसे चर्चित व्यक्ति बाड़न. केहू उनके समय-संदर्भ के सर्वाधिक चर्चित नाटककार का रूप में, भोजपुरी के ‘शेक्सपियर’ मानल त केहू भोजपुरी भाषा-साहित्य के प्रचार-प्रसार खातिर ‘भारतेन्दु’ का नाँव से नवाजल. पुरबी राग के जनक महेन्दर मिसिर का बाद, बलुक उनहूँ ले ढेर भिखारी ठाकुर क नाँव चर्चा में रहल. साहित्य अकादमी उनके भारतीय साहित्य निर्माता का वर्ग में रेघरियावत “भिखारी ठाकुर” नाँव क ‘मोनोग्राफ’ प्रकाशित कइलस. भिखारी आखिरकार ई सिद्ध कइये दिहलन कि लोकप्रियता कवनो रचनाकार कलाकार के महान आ अमर बना देले.

भिखारी का दिसाईं लोकरुचि जानिये के फिलिम बनल, कलाकार आ गायक चमकलें सs आ कतने लोग उनकर नाटक खेलि के रंगकर्मी कहाये लागल. उनका नाँव पर लोगन के पी-एचडी मिलल. कतने लोग जानकार, विद्वान कहाता. इहे ना, उनका के केन्द्र में रख के लिखाइल उपन्यासो वइसहीं चर्चित भइल. ई सर्वकालिकता निराद्रित आ उपेक्षा के शिकार भोजपुरी का भिखारी के अक्षर कीरति के प्रमाण आ निशानी बा.

गँवई जनमानस के कतने सोच-सरोकार, असंगति-विसंगति, कुन्ठा, अंधविश्वास, खुदगर्जी आ शोषन के भिखारी ठाकुर अपना मौलिक अन्दाज में, अपना नाटकन में चित्रित कइलन. गँवई-समाज में, जवानी आ सेक्स का मानसिकता के रूप-विरूप-विद्रूप के उजागर कइलन, अशिक्षा, अज्ञान आ जड़ता के देखवलन. बाल-विवाह, बेमेल-विवाह, परिवार आ समाजिक संबंधन का विकृति पर अँगुरी धरत सबके सावधान कइलन. समाजिक चेतना जगावे खातिर खेल-तमाशा, नाच-नाटक, गावल-बजावल कूल्हि कइलन. मनोरंजन का बहाने ऊ समाज का ओह तोपल-ढाँपल साँच के देखावे के उतजोग कइलन, जवन कवनो सूत्रधार, नाटककार आ लिखनिहार करेला.

एगो जमाना रहे कि पटना, आरा, छपरा, बलिया में उनका नाच के तूती बोलत रहे; उनका मौलिक विदेसिया शैली के कवनो जबाब ना रहे. उनकर मौलिक, अनूठा भोजपुरिया अन्दाज दूर दूर ले आपन धमक आ खनक पैदा कइलस.

भिखारी ठाकुर समय-सन्दर्भ के लोक जीवन, समाज आ परिवेश के ऐना देखावे वाला कतने नाटक (विदेसिया,bभाई विरोध, बेटी वियोग, कलियुग प्रेम, राधेश्याम बहार, गंगास्नान, बिधवा विलाप, पुत्र वध, गबरघिचोर आ ननद भउजाई) लिख के खेललन.

आशु कबिताई में माहिर भिखारी के भक्ति भजन आ आस्था से जुड़ल ‘राम विवाह, कृष्ण लीला, जसोदा सखी संवाद, भिखारी हरिकीर्तन, राम नाम माला, आरती, आ निरगुन बहुत लोकप्रिय भइल.

पूस महीना, शुक्ल पंचमी संवत् 1944 यानी 18 दिसंबर 1887 के कुतुबपुर, जिला सारण में जनमल भिखारी नाँवे मातर के पढ़ल लिखल रहले. ईहो कहल जाला कि उनकर मूल जनम स्थान आरा (भोजपुर) रहे,जवन गंगा सरजू का बाढ़ आ कटान में बहि दहि के सारन जिला का सीमा मे आ गइल. साधारन, साधन विहीन, गरीब नाऊ परिवार में जनमल भिखारी अपना समय के सामन्ती समाज के थोथा अहंकार आ मानसिकता के निकहा देखले समझले रहलन. बाढ़ सूखा, दैवी आफत, गरीबी आदि के बदहाली आ भुखमरियो देखले रहलन. कमाए खाए खातिर आपन घर परिवार छोड़ के परदेश जाए के मजबूरी से उपजल किसिम किसिम के विसंगतियन के देखले आ अनुभव कइले रहलन. लोक से अरजल एही अनुभव, ज्ञान आ बोध के ऊ अपना विलक्षण प्रतिभा, कल्पना शक्ति आ विचार से संपन्न कइके अनोखा अंदाज में फेरू “लोक” के लौटवलन. भोजपुरी का एह कीर्तिपुरुष सपूत के नमन.

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