दू दिन पहिले हमरा एगो लेख मिलल. लेख हिन्दी में रहे आ एगो हिन्दी कर्मी के संघर्ष गाथा रहल. कइसे एगो आदमी बालश्रमिक से अपना जिनिगी के शुरुआत कर के कवनो भाषा के शब्दाचार्य तक बन गइल. बीच में अनगिनत पड़ाव, अनगिनत बाधा बाकिर सफर रुकल ना चलत रहल. एगो जिद्दी भाषा सेवी का बारे में लिखल ई लेख हमरा के मजबूर कर दिहलसि सोचे खातिर. का करीं ? एकरा के सीधे नकार दीं. एकर भोजपुरी अनुवाद कर के प्रकाशित करीं. अँजोरिया के कार्यक्षेत्र में ई लेख कहाँ ले ठीक रही. वगैरह वगैरह.

अँजोरिया के नीति वाक्य हऽ अँजोरिया अनलिमिटेड…. मतलब कि अँजोरिया खाली भोजपुरी के बात ना करे भोजपुरी में बात करेले. एकर कैनवास बहुते बड़हन सोचल गइल बा. अलग बाति बा कि आर्थिक, व्यक्तिगत समस्यन आ समयाभाव का चलते बहुत कुछ चाहियो के ना कइल जा सके आ हम ई मान के संतोष कर लिहिलें कि अकेला चना भाँड़ ना फोड़ सके.
अगर अँजोरिया के संचालक प्रकाशक का रूप में हम कहीं हार मनले बानी त इहे कि हम कवनो अइसन आदमी आजु ले ना खोज पइनी जे अँजोरिया के ज्योति हालात के झँझावातन से बचावत आगा ले बरकरार राखि सको. बीरबल लाओ ऐसा नर, पीर बावर्ची भिश्ती खर. खैर, एह समस्या के कवनो समाधान आजु नइखे बाकिर हमार कामना इहे बा कि जबले हो सके अँजोरिया के ज्योति जरवले राखे के, एह उमेद में कि कबो त केहू मिली जे एह बैटन के अगिला दौर में ले जा सकी.

हँ त बात होत रहुवे अरविन्द कुमार के हिन्दी अकादमी शलाका सम्मान से सम्मानित भइला पर लिखल आलेख के. हिंदी के विकास खातिर जइसन काम अरविंद जी कइले बानी काश वइसनके कवनो जिद्दी बाकिर समर्थ सेवक भोजपुरियो के मिल सकीत ! इहे सोच के थोड़ देर ला सोचनी कि काहे ना अँजोरिया के एगो हिन्दी अध्याय शुरु कर दिहल जाव ! फेर लागल कि एगो गाछ का भरोसे टिमंबर मर्चेंट के बोर्ड लगावल ठीक ना रही. दोसरे हिन्दी के सेवक अतना बाड़े कि ओकर चिन्ता करे के जरुरत हमरा ना होखे के चाहीं. से दयानन्द पाण्डेजी के लिखल लेख के जस का तस हिन्दीये में प्रकाशित कर दिहनी. अँजोर दुनिया पर. पढ़ीं आ खुद देखीं कि अरविन्द कुमार जी जइसन अनुकरणीय व्यक्तित्व कतना मिलेले !

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