जिए भोजपुरी ! बाकिर जिए त जिए कइसे?

भोजपुरीए ना हिन्दीओ पत्रिकन के प्रकाशन आजुकाल्हु मुश्किल हो गइल बा काहे कि एक त लोग पढ़े के आदत छोड़ दिहले बा आ दोसरे किताब खरीदे के. रोज रोज के खरचे जुटावल जब मुश्किल बनल होखे त किताब भा पत्र-पत्रिकन के के खरीदो. बाकिर सवाल बा कि भोजपुरी में प्रकाशन के बढ़ावा दिहलो जरूरी लागत बा. भोजपुरी के अधिका लिखनिहारन के नेट इस्तेमाल करे ना आवे आ जेकरा आवे ला ओहमें से अधिका लोग के भोजपुरी लिखे ना आवे. जोगावे के जरूरत बा भोजपुरी के लिखनई के, त प्रिंट प्रकाशन वेब प्रकाशन से अधिका जरूरी बा. एही सब के मद्दे नजर सोचत बानी कि भोजपुरी के एगो पत्रिका के प्रकाशन शुरू कइल जाव जवन बिना कवनो दाम के लोग का घरे डाक से भेज दिहल जाव.

सवाल उठत बा कि बिना दाम के पत्रिका छपवावे, पठवावे के खरचा कइसे निकली? एह पर बाद में सोचब. पहिले त हम ई जानल चाहब कि भोजपुरी पत्रिका पढ़े क सवख कतना लोग के बा. कम से कम एक हजार सदस्य मिलस तबहिये प्रकाशन शुरू कइल जा सकी वइसे लक्ष्य रही एक लाख सदस्य के. अगर सदस्यन के गिनिती निकहा हो जाई त विज्ञापन भा स्पान्सरशिप से खरचा निकाले के सोचल जा सकेला. पहिले त माँग देखे के बा, माँग रही त बाजारो बनावल जा सकेला.

भोजपुरी के बढ़ावे में ना, त कम से बढ़ावा देबे में हमेशा से अँजोरिया, आ अब भोजपुरिका, लागल रहेले. एहसे दू गो फैसला कइले बानी. एक त हर साल कुछ प्रकाशित किताबन के इनाम देबे के आ एगो भोजपुरी पत्रिका निकाले के. साल 2014 में छपल भोजपुरी किताबन के प्रकाशक एह इनाम ला अपना प्रकाशित किताब के एक प्रति आ ओकर टाइप कइल साफ्ट काॅपी हमरा के भेज सकेलें. जवना किताब के इनाम ला चुनल जाई ओकरा प्रकाशक के 2100/- एकइस सौ रुपिया से ले के 21000/- एकइस हजार रुपिया तक के इनाम दिहल ज सकेला आ पुरस्कृत किताब के साफ्ट काॅपी दुनिया भर के भोजपुरी पढ़निहारन ला भोजपुरिका भा एकर कवनो सहयोगी वेबसाइट पर उपलब्ध करा दिहल जाई. हमार फैसला अंतिम होखी आ ओह पर कवनो विवाद ना कइल जा सके काहे कि हम कवनो शुल्क नइखी मांगत, ना ही समाज से चंदा बटोरे के कवनो योजना बा.

रहल सवाल भोजपुरी पत्रिका के त भोजपुरी प्रेमी लोग आपन पूरा पता आ मोबाइल नंबर हमरा के ईमेल से भेजल शुरु क देस. जइसे जइसे पता जुटत जाई तइसे तइसे पत्रिका प्रकाशन का दिशाईं डेग बढ़त जाई आ एक हजार सदस्य जुटते प्रकाशन शुरु क दिहल जाई. राउर पता आ मोबाइल नंबर हम केहू दोसरा के ना देब बाकिर समय आ जरूरत का हिसाब से विज्ञापन देबे वालन से शेयर कइल जा सकी. एह प्रस्तावित पत्रिका में प्रकाशन खातिर आवे वाला हर रचना के संशोधित करे के अधिकार हमरा रही आ जिनका एह अधिकार से विरोध होखो ऊ आपन रचना मत भेजीहें. प्रस्तावित पत्रिका आम भोजपुरिया खातिर होखी विद्वान लोग ना. हमार कोशिश इहो रही कि भोजपुरिका के भोजपुरी शैली के बढ़ावा मिल सको आ भोजपुरी के एगो मानक रूप तइयार कइल जा सको.

– ओमप्रकाश सिंह,
anjoria@outlook.com


एह विषय पर रउरा सभे के सलाह, टीका टिप्पणी के स्वागत बा. मत सोचीं कि हमरा हँ में हँ मिलावल जरूरी बा. चाहब कि सभका राय से मिला जुला के एगो नीक राह निकालल जाव.

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