भोजपुरी प्रकाशकन के मजबूरी

अँजोरिया के एगो साहित्यकार आ सम्मानित पाठक दिवाकर मणि जी के एगो टिप्पणी मिलल बा

हमरा खातिर “भोजपुरी सिनेमा” के मतलब होला “टोटल बकवास”। हिन्दी सिनेमा के डी ग्रेड वर्जन भी कहल जा सकेला भोजपुरी सिनेमा के । गिनल-चुनल फिलिमन के बनवला के छोड़ दीं तऽ भोजपुरी सिनेमा उद्योग “फूहड़पन” के कारखाना कहल जा सकेला । पता ना तबो काहे अधिकांश भोजपुरी के समर्पित वेबसाइट अपना सामग्री के नब्बे प्रतिशत एही घटिया फिलिमन खातिर समर्पित कईले बाड़ी सन । हो सकतऽ बा कि वेबसाइट नियंत्रक लोगन के ई कवनो मजबूरी होखे। हमरा त इहे बुझाता कि नियंत्रक लोगन के ई मजबूरी के जड़ शायद हमनीं भोजपुरिया पाठक सभे ही बानीं जा। घटिया फिलिम चरचा के अलावे हमनीं जान के बुद्धि आऊर कहीं शायद लागत ना होई…..

सामान्य टिप्पणियन के हम जस के तस छोड़ दीहिलें कि बाकिर पाठक लोग ओकर जवाब देव बाकिर दिवाकर जी के ई टिप्पणी सीधे हमरा जइसन प्रकाशक संपादकन पर बा, एहसे जवाब दिहल जरुरी बा.

दिवाकर जी रउरा ई जान के अचरज होखी शायद कि अँजोरिया पर जतना साहित्य प्रकाशित बा ओकरा के पढ़े बइठीं त महीना लाग जाई खतम ना हो पाई. बाकिर रउरो छिछिलाहे पानी में गोड़ राख के नदी के गहराई नाप दिहनी. महाराज, एक बार अंजोरिया के सगरी साहित्य त देख लीं. रउरा साहित्यकार हईँ बाकिर बहुते कम भोजपुरी साहित्यकार कंप्यूटर के इस्तेमाल जाने ले. ओह लोग के मालूमे नइखे कि नेट का माध्यम से ऊ लोग आपन रचना पुरा दुनिया ले चहुँपा सकेलन. तबो जे लोग से संपर्क हो सकल ओह लोग का माध्यम से अँजोरिया पर प्रकाशित स्तरीय भोजपुरी साहित्य के कमी ना मिली. हँ साहित्य के कोटा के भरपाई करे खातिर वइसनो साहित्य प्रकाशित करे के पड़ जाला जवना के स्तर प्रतिनिधि साहित्य कहाये लायक ना रहे. हम खुद साहित्यकार ना हईं एहसे हमार साहित्य के मापदण्ड कुछ दोसरे होला. जवन रचना दिल के छू जाव आ जवना में भोजपुरी के संस्कार बरल होखे ओकरे के हम प्रतिनिधि साहित्य मानीले. हिन्दी के अनुवादित साहित्यो भोजपुरी में छप रहल बा आ ओकरो से हम परहेज ना करीं. मिलो त पहिले.

जहाँ तक रहल बात फिल्मी बकवास के त हम अतने कहब कि आजु भोजपुरी के जवन चर्चा चल रहल बा ओकरा पीछे भोजपुरी सिनेमा के सफलता आ फूहड़ गीत संगीत के लोकप्रियते बा. कबो गाँव जवार में रह के फगुआ चइता सुनले होखब त रउरो मानब कि भोजपुरी संस्कृति के परमिसिव कहल जा सकेला जहाँ हर कुछ ढाँके तोपे के जरुरत ना पड़े. हिन्दी का संस्कार से भोजपुरी के आकलन ना हो सके. हिन्दी कृत्रिम भाषा हऽ भोजपुरी ना. आ अइसनका हर भाषा में फूहड़पन के कमी नइखे. सबसे बेसी पार्न कवना भाषा में छपेला? जवन सबसे बेसी बोलल जाले. अगर खाली साहित्ये चरचा कइल जाव त केहू एने झाँकहू ना आई. हमनी प्रकाशक हर बात के निगरानी राखेनी कि हमनी के पाठक का खोजत हमनी का लगे आवत बाड़न. जान के दुख होई बाकिर साहित्य ओह लोग का पसन्द में दसवाँ जगहा पर बा. अधिकतर लोग भोजपुरी गीत खोजत नेट पर मँड़रात रहेला आ मजबूरन साहित्यो देख पढ़ लेला.

दोसरे फिल्मी चर्चा में विजुअल सामग्री आराम से मिल जाले जवना के नयनसुख ले के लोग चटपट चल जाले. हमनी के कोशिश बस अतने रहेला कि जवन सामग्री प्रकाशित होखे तवना के पूरा परिवार पढ़ सके. हमरा सामने त बस एगो मापदण्ड रहेला. हमार बेटी पढ़ाई का चलते बाहर दोसरा शहर में रहेले आ अँजोरिया के नियमित पाठको हिय. हम बस अतने ध्यान राखिले कि अँजोरिया के उहो पढ़ सके आ हमरा कुछ छिपावे के जरुरत ना पड़े.

बढ़िया साहित्य के तुलन मेवा से कइला जा सकेला आ काजू किसमिस कतनो पौष्टिक होखे, कतनो स्वास्थ्य वर्धक होखे ओकरा से पेट ना भरे. पेट भरे खातिर चावल दाल तरकारियो चाहीं. पेट भर खा लिहला का बाद काजू किसमिस चबावे के आनन्द कुछ दोसरे रहेला.

आशा बा कि रउरा इ सगरी पाठक समुदाय के हमनी प्रकाशको के नजरिया पता लाग जाव. हमनी का लगे कवनो मजबूरी नइखे फिल्मी सामग्री प्रकाशित करे के. ऊ त बस एहले रहेला कि ओकरे बहाने कुछ साहित्यो पढ़ा दिहल जाव.

दिवाकर मणि जी से क्षमा याचना सहित,
संपादक-प्रकाशक, अँजोरिया

2 Comments

  1. बहुत दिन बाद आवे के मौका मिलल ह। कुछ अपना काम में एतना अझुरा गईल बानीं कि चाहियो के समय नईंखी निकाल पावत। खैर, प्रभाकर जी के “पेंचर पहुना” से घूमत-घूम “अभिलेखागार” में आ गईनीं, आ एह लेख पर नजर पड़ गईल। ओपी जी उमिर आ ज्ञान में बड़ आदमी बानीं हमसे। हमर एगो पुरान टिप्पणी पर उहां के ई लेख के माध्यम से विचार जान के अच्छा लागल। खैर, मुद्द लेख ना एह लेख पर “मुकेश यादव” जी के टिप्पणी से बा। ऐ महाराज, जाईं कवनो सड़क किनारे आसन जमा के लोग के भूत-भविष्य बतावल शुरू क दीं, खूब चली अपने के धंधा…
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    उमेश जी कहत बानी- “इ जवन टिप्पणी के जिकर भइल बा उनकर उमीर 35 साल से उपरे होई एह उमर के लोगन के भोजपुरी सिनेमा बकवास बुझाला”
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    अगर इहे क्राइटेरिया बा तब त खुदे संपादक महोदय एकरा अंदर आ जाएब, आउर उ टिप्पणीकर्ता यानी कि टिप्पणीकर्ता “दिवाकर मणि” रऊआ “शोधपरक” तथ्य के कोटि में ना अईहें।

  2. संपादक महोदय !
    इ जवन टिप्पणी के जिकर भइल बा उनकर उमीर 35 साल से उपरे होई एह उमर के लोगन के भोजपुरी सिनेमा बकवास बुझाला । बाकिर जिन्दाबाद भोजपुरी फिल्म

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