लेकिन पिंकिया कहाँ बिया?

– ओमप्रकाश सिंह

याद पड़त बा. ओह दिन खबर पढ़ले रहीं कि बालेसर ना रहलें. बालेसर का बारे में जानकारी बटोरे खातिर नेट हँउड़े लगनी त दयानंद पाण्डेयजी के लिखल एगो लेख पर नजर पड़ल. पढ़े लगनी त मन लाग गइल. खोजला पर पांडे जी के फोन नंबरो मिल गइल आ फोन कर के पूछ लिहनी कि का लोक कवि अब गाते नहीं के भोजपुरी अनुवाद क के हम अँजोरिया पर लगा सकीलें. दयानंद जी तुरते हं क दिहनी आ हम शुरू हो गइनी अनुवाद करे में.

तब अइसन ना लागल रहे कि महीनो बीत जाई एह उपन्यास के भोजपुरी करे में. बाकिर लागल आ अनेके महीना लाग गइल. कबो कबो त महीनन बीत जावे दू कड़ियन के अनुवाद का बीच. सबले लमहर देरी भइल जब छह सौ चार वाला मुकदमा के क्षेपक आ गइल. हमरा ई क्षेपक कहानी के प्रवाह रोकत लागल आ एही से हिम्मत ना होखे कि आगे बढ़ीं. अँजोरिया के मेहरबान पाठको लोग के कृपा रहल जे कबो केहू शिकायत ना कइल. केहू ना कहल कि अगिला कड़ी आवे में देरी काहे होखत बा. आ हमरा मन में इहे सवाल गूंजल करे कि “पिंकिया कहाँ बिया?” का हो गइल बा हमनी भोजपुरियन के? भोजपुरी के धंधा करे में त बहुते लोग लागल बा. तरह तरह के नारे बाजी, सम्मेलन, शोशा होत रहेला. भोजपुरी के श्लील बनावेवाला लठधरो लोग के कमी नइखे बाकिर केहूका लगे ई सोचे के समय नइखे कि “पिंकिया कहाँ बिया””

पिछला दस साल से अँजोरिया चलावल आवत बानी. लोग कहल कि अँजोरिया फिल्मी पत्रिका जइसन होखल जात बिया त हमहू पिंकिया के लुकवा दिहनी दोसरा अध्याय में. अँजोरिया के भोजपुरी साहित्य आ सरोकारे ले बान्ह के राख दिहनी. बाकिर कतना लोग बा जेकरा भोजपुरी के चिंता बा, भोजपुरी से लगाव बा? बाँगे खातिर बँगात रहेला कि बीस करोड़ लोग के भाषा हिय भोजपुरी. अब त उहो गिनिती लोग पचीस करोड़ ले चहुँपा दिहले बा. पूछ दीं कि तनी सिलसिलेवार आकंड़ा दे के त बताईं कहाँ बाड़े ई पचीस करोड़ भोजपुरिया? मारीशस के भोजपुरी. सुरीनाम के भोजपुरी बूझले ना बुझाई. काहे कि ओह लोग के भोजपुरी आ हमहन के भोजपुरी में बहुते अंतर आ गइल बा. सुरीनाम वाले त शान से अपना भाषा के सुरीनामी कहेलं आ हमरा एह बात से खुशी बा नाराजगी ना कि लोग भोजपुरी के काहे छोड़ दिहल. दोसरे रूप में सही बाकिर सूरीनामो में भोजपुरी जिंदा बिया एही से संतोष कर लीहिलें. बाकिर हमनी के देश के भोजपुरिया भाई लोग त बस इहे खोजत रहेला कि “पिंकिया कहाँ बिया?”

रउरा सभे जानी भा ना, हमरा त मालूम होखबे करेला कि रउरा में से कतना लोग भोजपुरी साहित्य आ सरोकार पढ़े देखे आवेला आ कतना लोग पिंकिया के खोजत! अगर भोजपुरी साहित्य आ सरोकार से मतलब रहीत त आजु देस में अनेके भोजपुरी पत्रिका रहतीं स, ढेर ना त एगो दू गो अखबारो रहती सँ. पचीस पचास गो साइटो रहती सँ. बाकिर का हाल बा? अकेले मन घबराए लागल त मजबूरन सुधीर भाई के फोन करे के पड़ल कि अरे भाई मैदान में बनल रहीं. सुधीर भाई के राय विचार से हम सहमत होखीं भा असहमत, उहाँ के भोजपुरी से लगाव के हम इज्जत करीलें. सुधीर भाई भोजपुरी ला चिंतित रहेनी बाकिर जब हालात अइसन हो जाव कि जेकरा ला चोरी करीं उहे कहे चोर त बात दोसर हो जाला.

गलत के गलत कहे में सुधीर भाई जइसन हिम्मत दोसरा केहू में नइखे भोजपुरी में. हम त लाजे लिहाजे, झँझट से दूर रहे का इरादा से फरके रहल चाहीलें. बाकिर सुधीर जी के का मिलल? परेशानी छोड़. अलग बात बा कि उनुका एह परेशानीओ से परेशानी ना भइल, लोग के उदासीनता से दुख जरूरे भइल. अपना दस साल के अनुभव से हम अतना त बढ़िया से जान गइल बानी कि एहिजा केहू केहू से सटे वाला नइखे. तरह तरह के लोग से भेंट मुलाकात भइल, कुछ दिन ले निबहल बाकिर फेरू सभे आपन आपन राह ध लिहल. काहे कि हम अपना मजबरी से बइठक सम्मेलन में आ जा ना पाईं. विरुदावली गावे के फुरसत नइखे. भोजपुरी के कर्णधारन के जयकारा लगावे के आदत नइखे. हँ भोजपुरी सिनेमा वाला लोग के ले दही जरूरे बाँटत रहीलें काहे कि जानत बानी कि उहे कैप्सूल के आवरण ह जवना का भीतर काम वाली दवाई दिहल जा सकेला. अँजोरिया के साहित्य आ सरोकारो देखे कुछ लोग आ जाला तब.

सोचौं इमानदारी से. कतना भोजपुरी प्रकाशन जीयत बाड़ी सँ? पत्र पत्रिका खरीद के पढ़े होखी. माँग के तबहियें पढ़ पाएब जब राउर कवनो हित मीत ओह के खरीदत होखे भा अगर कहीं छापत छपवावत होखे त सोना में सुहागा. बाकिर भोजपुरी के कर्णधारन के बतावल पचीस करोड़ भोजपुरिया केने बाड़े, कवना साइट पर जालें, का पढ़ेलें का पसंद करेले?

सर्च क के देख लीं भोजपुरी माने गीत गवनई. सौ में निनान्बे साइट गीत गवनई वाली मिली. फिलिम वाली साइट मिलिहें स बाकिर हिंदी भा अंगरेजी में. हर कुछ दिन पर कवनो ना कवनो साइट धूमकेतु का तरह उगेला भोजपुरी के आसमान पर बाकिर फेर धीरे धीरे बिलाए लागेला. काहे। काहे कि लोग के भोजपुरी पढ़े लिखे के आदत नइखे रहि गंइल. भोजपुरी के सगरी चिंता अंगरेजी भा हिंदी के गटरपटर में होखेला. अगर रउरा भोजपुरी लिख ना सकीं, पढ़ ना सकीं, समुझ ना सकीं त फेर भोजपुरी के बकस काहें नइखीं देत? काहे एकरा फिकिरे दुबराइल जात बानी? छोड़ दीं भोजपुरी के ओह लोग के भरोसे जे भोजपुरी जीयत बा, भोजपुरी सोचत बा, भोजपुरी में बोलत बतियात बा. ओकरा के श्लील बनावे में आपन जान मत गँवाईं.

हम त बस इहे सोचत बानी कि पिंकिया कहाँ बिया? कइसे ओकरा के नचा बझा के भीड़ जुटा लीं. बा रउरा मालूम कि पिंकिया कहाँ बिया?

हँ अगर रउरा दयानंद पाण्डेय जी के लिखल हिंदी के आंचलिक उपन्यास “लोक कवि अब गाते नहीं” के भोजपुरी अनुवाद ई बुक का रूप में चाहीं त आजुए अपना इमेल से हमरा के मेल भेजीं. एही बहाने हमहूं देखीं कि कतना लोग बा जिनका रुचि बा एह भाषा में.

आ अगर अब ले पूरा उपन्यास पढ़ले नइखीं त कम से कम अब पढ़ल शुरु कर दीं. अंजोरिया पर भोजपुरी के तीन गो उपन्यास प्रकाशित बाड़ी सँ. रउरा कवगो पढ़ले बानी ओहमें से?


संपादक प्रकाशक,
अँजोरिया वेब परिवार

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