साल का आखिरी दिने आजु जब पिछला साल के लेखा-जोखा लेबे बइठनी त एकाध खास बाति के छोड़ के कुछ ना भेंटाइल. सालो भर एह बहाने भा ओह बहाने भोजपुरी पर आपन-आपन राजनीति चमकावे के कोशिश होत रहल. हर साल का तरह एहू साल भोजपुरी के कई गो विश्व सम्मेलन भइली सँ. भोजपुरी के खासियत होले कि एकर कवनो बाति विश्चस्तर से नीचे के ना होखे. अब त भोजपुरी के शिखरो सम्मेलन होखे लागल बा. अब ऊ शिखर केकरा के मानल जा रहल बा, ऊ बाति बेमानी बा. पाँच क्षेत्र में काम करे वाला लोग मिल के बइठलें त नाम दे दिहल गइल शिखर सम्मेलन.

भोजपुरी के संविधान के आठवीं अनुसूची में शामिल करावे के बाति खूबे होला. बाकिर ओह से फायदा का होखी से बहुते कम लोग के मालूम होखी. ओहसे भोजपुरी के का फायदा होखी सेहू केहू ना बतावे. हँ शायद कुछ पुरस्कार मिले लागी, भोजपुरी के नाम पर कुछ लोग आ संस्थन के अनुदान वगैरह मिले लागी. एकरा अलावे कवनो फायदा होखे त हमरा नइखे मालूम. वइसहूं हमार जानकारी बहुते कम ह एहसे इहो कवनो खास मुद्दा ना भइल. बाकिर घर-बाजार में भोजपुरी बोले वाला दिन पर दिन कमे होत जात बाड़े. भोजपुरी के कवनो अइसन संस्था भा संगठन नइखे जे सभके अपना साथे मिला के चले चाहत होखो. सभकर आपन मुद्दा बा, जवना के भँजावे के बा. अगर रउरा हमरा बाति से सहमति नइखीं, त हमरा संगे उठल-बइठल मत करीं. हम जवन कहत बानी तवने सही बा आ बाकी जे कहत बा सब गलत बा. अगर हमार बाति मान लिहनीं त बहुत बढ़िया, ना त रउरा हमार दुश्मन हईं. राउर हुक्का-पानी बन्द करे-करावे में हम कवनो कोर-कसर ना छोड़ब.

बाकिर एह साल कुछ अउरी भइल. जवना के चरचा जरुरी बा. भोजपुरी के जमीनी स्तर से जुड़े खातिर कुछ खास प्रयास भइल जवना के स्वागत होखे के चाहीं. एह दिसाईं “जय भोजपुरिया” के जीरादेई सम्मेलन के खास प्रशंसा करे के जरुरत बा. महानगर से दूर एगो पिछड़ा इलाका में भोजपुरियन के जुटान निमन काम रहल आ हर संस्था संगठन के अइसने प्रयास करे के चाहीं. विश्व भोजपुरी सम्मेलन, भोजपुरिया शिखर सम्मेलन, भोजपुरी साहित्य सम्मेलन सब कुछ जरुरी होला आ ओकरा से पूरा समाज के जोड़े के कोशिश होखे के चाहीं. छठ पूजा के अवसर पर एही बहाने महानगरो में भोजपुरियन के जोड़े के प्रयास मजगर होत जात बा. जे लोग भी एह दिसाईं काम कर रहल बा ओहू लोग के प्रशंसा होखे के चाहीं. बाकिर सबसे बड़ प्रशंसा के बाति तब होई जब एह सम्मेलन आ प्रयासन के गुटबाजी के अखाड़ा ना बने दिहल जाव. भोजपुरी अबहीं अतना बड़ नइखे कि गुटबाजी के बोझ बर्दाश्त कर पाई. भोजपुरी का काम में जेही लागल बा सभकर प्रशंसा होखे के चाहीं आ व्यक्तिगत विवाद के सामाजिक विवाद में बदले के कोशिश ना होखे के चाहीं. थोड़ बहुत कमजोरी सभका में, ना त अधिका लोग में, जरुर रहेला. ओह कमजोरी के भरल बाजार में देखावल ठीक ना लागे. एहसे भोजपुरी के कवनो भला नइखे होखे वाला, छवि जरुर खराब होले.

अब आईं संगीत फिल्म आ मनोरंजन का दुनिया में. भोजपुरी में बेअकल के नकल जोरदार चलेला. एहू साल चलल. “महुआ” टीवी चैनल धीरे-धीरे हिन्दिया रहल बा. हिन्दी फिल्मन के नकल से भोजपुरी फिल्म दुनिया तबाह हो रहल बिया. छिछोरापन आ फूहड़पन बिकाये वाला चीज होले आ एह चक्कर में लोग छिछोरपन आ फूहड़पन पर उतरल जात बा. मनोज तिवारी बिग बास का घर में गइलन अपना मर्जी से, निकालल गइलन शो वाला का मर्जी से. अब एकरा से आम भोजपुरिया के का मतलब ? मतलब त यूनियन बैंक के ओह अधिकारियन का बेहूदगी से होखे के चाहीं, जवना में बिहार यूपी के मजदूरन के हफ्ता में एकही दिन बैंक आवे के कहल गइल, बाकी दिन अइला पर हिकारत का नजर से देखत दुरदुरा दिहल गइल. रियलिटी शो ना त कबो रियल रहल, ना अब बा. चाहे ऊ कलर टीवी के बिगबॉस होखे भा महुआ के सुर सग्राम. ओह शो में उहे होखेला जवन शो के निर्माता चाहेलें आ एह बाति में कवनो बुराईयो नइखे. अगर हमरा निमन लागी त देखब, ना लागी त ना देखब. केहू हमार गरदन पकड़ के ओकरा के देखे के मजबूर करे वाला नइखे. आ अगर दर्शक ना मिलीहें त स्पान्सर भाग जइहें. स्पान्सर ना मिली त चैनल भाग जाई. हर बाति के आखिरी चाभी दर्शक का रिमोट में बा. संगीत फिल्मो का बारे में उहे बाति बा. हर भाषा, हर समाज में फूहड़पन मौजूद बा आ होला. ई स्वाभाविक बात होला. अब रउरा कवना पक्ष के महत्व देत बानी असर ओह से पड़े वाला बा.

भोजपुरी से कुछ दोसरा लोगन के कष्ट आ शिकायत बा. ऊ लोग कवनो ना कवनो बहाने भोजपुरी के छोटियावे में लागल रहेलें. आ हमनी का बिना ओह चालबाजी पर ध्यान दिहलें ओह लोग का हिसाब से अपना भोजपुरी के गरियावे में लाग जानी. दुनिया के कवन भाषा बा जवना में नंगई आ छिछोरापन के नमूना ना मिली ? अब एहसे ऊ भाषा त नइखे गिर जात, हँ ऊ आदमी, ऊ संस्था जरुर कुछ लोग का नजर में गिर जाई, गिरहूं के चाहीं, जवन ओह छिछोरापन का सहारे आपन नाम चमकावल चाहत बा. भोजपुरी में नंगई बा त हिन्दीओ में बा, अंगरेजीओ में बा, दोसरो भाषा में होखी. अलगा बाति बा कि हम ओह भाषा के समुझत नइखीं. अब ओह छिछोरापन के ढेर चरचा करि के हम भोजपुरिये के बदनाम करे का षडयन्त्र में जाने-अनजाने शामिल हो जात बानीं. जरुरत बा कि ओह छिछोरापन के अनदेखी अनसुनी करे के. “नामे नाम ना त बदनामे नाम” के फायदा ओह लोगन के ना मिले के चाहीं. दोसरे छिछोरापन सापेक्ष होला, निरपेक्ष ना. जवन बाति हमरा छिछोरापन लागेला हो सकेला कि कुछ लोग खातिर ऊ रोजमर्रा के बाति होखे. हमरा नीक नइखे लागत हम ना सुनब. रउरा नीक नइखे लागत रउरा मत सुनीं. बाकिर ओकर नगाड़ा पीट के अइसन माहौल मत बने दीं कि लागो कि भोजपुरी में छिछोरापन आ फूहड़पन छोड़ कुछ दोसर हइये नइखे. चर्चा करे के बा त निमना के, बढ़ियका के करीं. ओकर अतना शोर मचा दीं कि बउरका-खरबका ओह में दबा जाव आ ओकरो लागे कि निमने कइला में फायदा बा.

गीत गवनई में अगर फूहड़पन ढेरे लउकत बा त ओकरा खातिर गीतकारो जिम्मेदार बाड़न. याद कर के बताईं एह साल के सबले बढ़िया भोजपुरी गीत कवन रहल ? याद नइखे नू आवत ? आइबो ना करी. काहे कि अब वइसनका गीत या त लिखात नइखे, या बिकात नइखे. लिखात नइखे त चिन्ता के बाति बा. बिकात नइखे त हमनी का सभे जिम्मेदार बानी. निमनका के प्रोत्साहन ना मिली त बउरका के दबावल मुश्किल हो जाई. एक बाल्टी दूध फाड़े खातिर थोड़के खटाई चाहीं बाकिर खटाई में कतनो दूध मिला दीं ओकर सवाद नइखे बदले वाला, दूध जरुर फाटि जाई. बउरका के नजर अन्दाज करे के सीखीं आ निमनका के प्रशंसा करे के.

भोजपुरी के अगर जिन्दा राखे के बा त भोजपुरी में बढ़िया लेखन होखे के चाहीं, ओकरा के कमाई के भाषा बनावे के जरुरत बा. भोजपुरी में प्रकाशन बेसी होखे के चाहीं. भोजपुरी में वेबसाइटन के संख्या बेसी होखे के चाहीं जवना से कि हर रुचि, हर सवाद के आनन्द लिहल जा सको. भोजपुरी के नारेबाजी के जरुरत नइखे, भोजपुरी बोले-बतियावे वालन के जरुरत बा. भोजपुरी में काम करे वालन के जरुरत बा. भोजपुरी में निवेश के जरुरत बा.

अगर चाहे-अनचाहे हमार बाति केहू के चोट कर जाव त हम माफी चाहब. हमार केहू से व्यक्तिगत विद्वेष नइखे. हम त कबीर पंथी हईं. कबीरा खड़ा बाजार में सभके पूछत खैर. ना काहू से दोस्ती ना काहू से बैर.

रउरा सभे के नयका साल आनन्दमय गुजरे, सपरिवार सभे स्वस्थ आ खुशहाल रहे, इहे शुभ कामना बा.

राउर,
संपादक, अँजोरिया

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