सदियन से भोजपुरिया माटी के एगो अलग पहिचान रहल बा. ई माटी खाली भोजपुरिए समाज के ना बलुक माई भारती के अइसन-अइसन लाल देहलसि जे लोग भारतीय समाज के हर एक क्षेत्र में एगो नया दिशा अउर ऊँचाई देहल अउर विश्व स्तर पर माई भारती के परचम लहरावल. भोजपुरिया माटी के सोन्ह सुगंध से सराबोर ई महापुरुष लोग खाली भारते का ना बलुक पूरा दुनिया के राह देखावल अउर एगो सभ्य अउर शांति से भरल समाज बनावे में अहम भूमिका निभावल लोग. ई उहे भोजपुरिया माटी हS जवने के संत कबीर अपनी विलक्षणपन से, भगवान बुद्ध अपना उपदेशन से त शांति, सादगी के दूत अउर महान राष्ट्र प्रेमी बाबू राजेंद्र अपना विद्वता अउर कर्मठता से सींचले.

माँ भारती के ई अमर सपूत, बाबू राजेंद्र प्रसाद 3 दिसंबर 1884 के बिहार की सीवान जिला के जीरादेई गाँव में अवतरित हो के भोजपुरिया माटी के धन्य क देहने. भोजपुरिया माटी जवन भगवान बुद्ध, भगवान महाबीर, संत कबीर आदि लोगन की कर्मन के साक्षी रहल बिया, एगो अउरी महापुरुष के अपनी अँचरा में पा के सुवासित अउर गौरवान्वित हो गइल. अउरी हाँ अपनी ए लाल के तेजस्वी मुख-मंडल देखि के धरमपरायन माई श्रीमती कमलेश्वरी देवी फूले ना समइली अउर बाबूजी श्री महादेव सहाय जे संस्कृत अउरी फारसी के मूर्धन्य विद्वान रहने अपनी विद्वता पर ना बलुक अपनी ओजस्वी लाल के देखि के गौरवांवित अउर प्रफुल्लित हो गइने.

प्रखर बुद्धि तेजस्वी बालक राजेंद्र बचपने से फारसी में पढ़ाई शुरु क देहने अउर ओकरी बाद प्राथमिक शिक्षा खातिर छपरा का जिला स्कूल में नाँव लिखावल गइल. एकरी बाद आगे क पढ़ाई खातिर ऊ टी के घोष अकादमी पटना में दाखिला लिहले. 18 बरिस का उमर में नवजववान राजेंद्र कलकत्ता विश्वविद्यालय का प्रवेश परीक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त कइने अउर 1902 में कलकत्ते के, आजुकाल्हु कलकत्ता के नाम बदल के कोकाता हो गइल बा, नामचीन ‘प्रेसीडेंसी कालेज’ में पढ़ाई शुरु कइने. एही प्रेसीडेंसी कालेज में परीक्षा का बाद बाबू राजेंद्र की उत्तर-पुस्तिका जाँचत परीक्षक अतना प्रभावित भइने कि उनका उत्तर-पुस्तिकवे पर लिख देहने की ”The examinee is better than the examiner.” (परीक्षार्थी, परीक्षको से बेहतर बा.) बाबू राजेंद्र का विद्वता के एह से बड़हन अउर का मिसाल हो सकेला? बाबू राजेन्द्र के प्रतिभा दिन पर दिन निखरत गइल अउर 1915 में ऊ विधि परास्नातक के परीक्षा स्वर्ण-पदक का साथे हासिल कइने. एकरी बाद कानूने का क्षेत्र में ऊ डाक्टरेट के उपाधिओ हासिल कइने.

तब के परम्परानुसार बारहे बरिस का छोट उमर में राजेन्द्र के विवाह राजवंशी नाँव का कन्या का साथे कर दिहल गइल अउर तेरह बरिस का दहलीज पर पहुँचते एकर गवनो हो गइल. अइसन मानल जाला की 65-66 बरिस का वैवाहिक जीवन में मुश्किल से लगभग चारे पाँच बरिस ई महापुरुष अपनी अर्धांगनी का साथे रहल अउर बाकी के जीवन अपना माँ भारत माता के चरनन में, मानव सेवा में, समर्पित क देहलसि.

माँ भारती के ई सच्चा सेवक अपनी माई के फिरंगियन का हाथ के कठपुतली बनल भला कइसे देखि सकत रहे? ई महान भोजपुरिया माई भारती क बेड़ी काटे खातिर, ओके आजाद करावे खातिर, स्वतंत्रता सेनानियन का साथे कंधा से कंधा मिला के चले लागल. अउर वकालते का दौरान आजादी का लड़ाई में अपनी आप के पूरा झोंकि देहलसि. ई महान मनई महात्मा गाँधी के विचारन, भारत-प्रेम से एतना प्रभावित भइल कि उन्नीस सौ एक्कइसे (1921) में कलकत्ता विश्वविद्यालय का सीनेटर पद के लात मार देहलसि अउर बिदेशी स्वदेशी के मुद्दा धेयान में राखत अपना प्रखर बुद्धि लइका मृत्युंजय के कलकत्ता विश्वविद्यालय से निकालि के बिहार विद्यापीठ में नामांकन करवा के एगो सच्चा देशप्रेमी के मिसाल कायम क देहलसि. एह ना बिसरेवाला अउर अद्भुत परित्याग खातिर ई भारती-पुत्र सदा खातिर स्वदेशियन का साथे पूरा संसार क नजर में अनुकरणीय अउर अर्चनीय बनि गइल. गाँधीजी का असहयोग आन्दोलन के सफल बनावे खातिर ई महान भारत-भक्त बिहार में असहयोग आन्दोलन के अगुआई कइलसि अउर बाद में नमक सत्याग्रह आन्दोलनो चलवलसि.

देश सेवा क साथे-साथ बाबू राजेंद्र सदा मानवो सेवा में लागल रहने अउर 1914 में बिहार आ बंगाल में आइल बाढ़ में ऊ बढ़ि-चढ़िके प्रभावित लोगन के सेवा कइने, ओह लोगन क दुख-दरद बँटने अउर एगो सच्चा मनीषि का तरह लोगन के प्रनेता बनल रहने. राजेंद्र बाबू के मानव-प्रेम, भोजपुरिया प्रेम के उदाहरण एह बाति से जानल जा सकेला कि जब 1934 में बिहार में आइल भूकंप का समय ऊ कैद में रहने पर कैद से छूटतही ऊ जी-जान से भूकंप-पीड़ितन खातिर धन जुटवले में लागि गइने अउर उनकर कड़ा मेहनति, ईमानदारी, सच्ची निष्ठा एतना रंग ले आइल कि वाइसराय का द्वारा जुटावल धन से बेसी धन इ जुटा देहने. अरे एतने ना, माँ भारती के ई सच्चा लाल मानव सेवा के ब्रत लेहले आगे बढ़त रहल अउरी सिंधु अउर क्वेटा में आइल भूकंपो में भूकंप पीड़ितन के कर्मठता अउरी लगन क साथ खूब सेवा कइलसि अउर कई राहत-शिविरनो के संचालन कइलसि.

एह महान विभूति के महान काम अउर समर्पण से प्रभावित होके इनका के कई गो पदन पर सुशोभितो कइल गइल. 1934 में इनके भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का मुंबई अधिवेशन में अध्यक्ष चुनल गइल. एतने ना, ई दू बेर एह पद के सुशोभित कइने. भारतीय संविधान का निर्माणो में ए महापुरुष के बहुत बड़हन जोगदान बा. इनकरी विद्वता क आगे नतमस्तक नेता लोग इनहीं के संविधान सभा के अध्यक्ष पद खातिर चयनित कइले अउर हाँ बाबा अंबेडकर के भारतीय संविधान का शिल्पकार का रूप में प्रतिस्थापित करवले में एही महान विभूति के हाथ रहे काहे की ई महापुरुष बाबा अंबेडकर के कानूनी विद्वता से पूरी तरह से परिचित रहे अउर जानत रहे की बाबा अंबेडकरे एह काम के अच्छी तरे निभा सकेने.

स्वतंत्र भारत क पहिला राष्ट्रपति का रूप में कार्यभार संभालते अपनी दूरदृष्टि अउर विद्वता से भारत की विकास-रथ के विकास मार्ग पर अग्रसर कइले में ई महापुरुष अहम जोगदान कइलसि. ई महापुरुष सदा स्वतंत्र रूप से अपनी पांडित्य अउर विवेक से काम करत रहल अउर कब्बो अपनी संवैधानिक अधिकारन के हनन नाहीं होखे देहलसि.

एह महान विभूति में देश-प्रेम, परहितता एतना कूट-कूटके भरल रहे की भारतीय संविधान के लागू भइले का एकदिन पहिले अपनी बहिन भगवती देवी क स्वर्गवास भइला क बावजूद ई मनीषि पहिले देश का प्रति अपनी कर्तव्यन के निभवलसि अउर ओकरी बादे अपनी बहिन क अंतिम संस्कार में शामिल भइल.

ए महापुरुष के चाहेवालन में खाली भोजपुरिये ना बलुक पूरा भारतवासी रहलन. इनकर लोकप्रियता मनई लोगन का सिर चढ़ि के बोले. एकर ज्वलंत उदाहरण इहे बा कि पंडित नेहरू डा. राधाकृष्णन के राष्ट्रपति बनावल चाहत रहने बाकिर बाबू राजेंद्र प्रसाद का समर्थन में पूरा भारतीय समाज के देखि के नेहरू के चुप्पी साध लेबे के पड़ल. जब 1957 में फेर से राष्ट्रपति के चयन के बात उठल त चाचा नेहरू दक्खिन भारत के सब मुख्यमंत्रियन के चिट्ठी लिखि के आपन इ मनसा जाहिर कइने की ए बेरी कवनो दक्खिन भारतीये के राष्ट्रपति बनावल जाव. पर दक्खिन भारतीय मुख्यमंत्री लोग ई कहि के एह बाति के सिरे से खारिज क देहल लोग की जबले डा. राजेन्द्र प्रसाद रहिहें तबले उनहीं के राष्ट्रपति रहल ठीक बा. अउर ए तरह से राजेन्द्र बाबू के दोबारा राष्ट्रपति चुनल गइल. 12 बरिस ले राष्ट्रपति पद सुशोभित कइले क बाद सन् 1962 में अवकाश ले लेहने.

एह महापुरुष के सादगी, समर्पण, देश-प्रेम, मानव-प्रेम अउर प्रकांड विद्वता आजुओ लोगन के अच्छा काम करे के प्रेरणा दे रहल बा. ए महान भोजपुरिया के सर्वोच्च भारतीय नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से सम्मानितो कइल गइल बा.

राजेन्द्र बाबू साल 1946 में आपन आत्मकथा लिखले. कईगो अउरीओ चर्चित अउर पढ़े लायेक किताबन के रचना कइले जवने में ‘बापू के चरणों में’, ‘गाँधीजी की देन’, ‘भारतीय संस्कृति’, ‘सत्याग्रह एट चंपारण’, ‘महात्मा गाँधी और बिहार’ आदि के नाम खास बा.

माँ भारती के ई अमर सेवक 28 फरवरी सन 1963 के राम, राम के जाप करत अपनी इहलौकिक नश्वर देहि त्यागि के हमेसा-हमेसा खातिर परम पिता परमेश्वर का घरे लवटि गइल. आजुओ अपना सेवा भाव से ऊ भारतीय जनमानस के सदा आगे बढ़े खातिर प्रेरित करेले. हमेशा से कुछ भारतीय चिंतकन के एकर बहते अफसोस रहल की एह महापुरुष खातिर, माँ भारती की सपूत खातिर, आजु ले भारत सरकार ना त कवनो सम्मानित दिन के घोषणा कइलसि ना इनका नाम पर कवनो बड़हन कार्ययोजना चलवलसि. अउर कहाँ ले बताईं अपनी घर बिहारो में, अपनन क बीचे ई महान भोजपुरिया उपेक्षित रह गइल अउर ओतनो राजकीय सम्मान ना पवलसि जेतना एहु से बहुते-छोट-छोट राजनीतिज्ञन भा छुटभईयन के मिलल. खैर, अइसन महापुरष के कवनो सनमान के जरूरत ना होला. अइसन लोग त जनमानस का दिल में विराजेला, सनमान पावेला अउर जनमानस द्वारा जयजयकारल जाला. हर भारतीय, हर भोजपुरिया आजुओ गौरव महसूस करेला की ऊ एतना बड़हन, महान महापुरुष के संतान हS. आजु ऊ अइसन माटी में खेल-कूद रहल बा, अइसन हवा में साँस ले रहल बा जवने में राजेंद्र बाबू जइसन लोग खेल-कूदि चुकल बा, साँस ले चुकल बा अउर ए माटी के, हवा के सुवासित क देले बा.

धनि बा ऊ भारत नगरी जहाँ अइसन-अइसन महापुरुषन के प्रादुर्भाव भइल अउर जे लोगन के कीर्ति आजुओ पूरा संसार के रोशन क रहल बा. अइसन महापुरुषन के काम हम भारतीयन के गौरवान्वित करेला अउर हमनीजान शान से, सीना तानि के कहेनी जा कि हमनी का भारतीय हईं जा. माँ भारती के अमर-पुत्र, भोजपुरियन के सरताज, प्रकांड विद्वान, सहृदय, भारतवासियन द्वारा पूजित एह महापुरुष के हम शत-शत नमन, वंदन करत बानी.

जय हिंद जय भारत..

-प्रभाकर पाण्डेय ‘गोपालपुरिया’

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