पुण्य स्मरण

“सूझ बूझ” पत्रिका के दुसरका अंक से पता चलल कि हरिवंश पाठक गुमनाम जी अब नइखीं. मन माने के तइयार नइखे. जहिया ले पढ़ले बानी, आँख भरले रहतिया. भोजपुरी में उहाँ अस गीत आ गजल लिखेवाला कवनो रचनाकार से अभी तक हम नइखीं मिलल. शिल्प के बात करीं त मोती चुनल आ पिरोवल केहूँ उहाँ से सीखे. लगभग 27-28 बरिस हो गइल उहाँ से मिलला. “जमानिया” हमरा किहाँ से बहुत दूर नइखे,बाकिर हमार ई दुर्भाग्य बा कि नोकरी में अइला का बाद बाहरे रहला का कारन गाँव पर बहुते कम समय दे पवले बानी. कई बेर चहलीं कि उहाँ से मिल पाईं भा फोने प बतिया लीं बाकिर अपना व्यस्तता आ आलसी स्वभाव का कारन सफल ना हो पवलीं.एने 6-7 महीना से बेचैन रहीं, कई लोगन से उहाँ के कंटैक्ट नं. मङलीं बाकिर मिलल ना.

अजुओ उहाँ के चेहरा बिसरत नइखे. जब हम एम.ए. करत रहीं बोधगया से (मगध विश्वविद्यालय के स्ना. विभाग में) त रोहतास जिला में आयोजित कुछ कवि सम्मेलनन में उहाँ का सङे काव्य-पाठ करेके मोका मिलल रहे. ओह घरी उहाँका हमरा एगो गीत के कुछ संशोधन से सँवरले रहीं. कबो-कबो भय होत रहेला कि एह तरह के रचनाकार जब चलि जइहें त का होई ? अब आजु का कहीं ?

गुमनामे जी का भाषा में हम कहल चाहबि कि

गीतों के डालकर कमंद
हम कि लबेबाम आ गए
बिरच गए दर्दों के छंद
घाव बड़े काम आ गए.

परत-परत प्यार जम गया
पोर-पोर पीर बस गई
प्यास प्राण-प्राण में भरे
रिश्ते गुमनाम आ गए.
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मटिया क गगरी पिरितिया क उझुकुन
जोगवत जिनिगी ओराइ
सगरी उमिरिया दरदिया के बखरा
छतिया के अगिया धुँआइ
बूड़ि जात कजरा में अँचरा के कोरवा
लोरवा लिखल बा लिलार.

– रामरक्षा मिश्र विमल


दुर्भाग्य हमहन के बा जे भोजपुरी साहित्य के अइसनो लोग गुमनाम रहि जात बा. गुमनाम जी का बारे में पढ़नी त खोजल शुरू कइनी. पता चलल कि गुमनाम जी के निधन पिछला साल ३१ दिसंबर २०११ के साँझे भइल रहे बाकिर एहिजा ले खबर चहुँपे में तीन महीना लाग गइल.

गुमनाम जी का बारे में एगो लेख :

संपादक, अँजोरिया का तरफ से श्रद्धांजलि

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