पिछला हफ्ता गाजीपुर जिला के नंदगंज थाना के पुलिस तीन गो परिवार के मेहरारुवन के थाना उठा ले गइल आ ओहिजा बंधक बना के राखि लिहलसि. फिरौती का रुप में ओकर माँग रहुवे दू गो आरोपियन के थाना में हाजिरी. ओह औरतन में एगो औरत यशवंत के महतारीओ रहली जिनकर पूरा मामिला से कवनो लेना देना ना रहुवे. संजोग से ऊ ओह घरी अपना पटीदारी में दयादिन का घरे गइल रहली आ ओह घर के सवांग पर एगो हत्या के आरोप रहे. पुलिस आइल आ सगरी मेहरारुवन के उठा ले गइल आ ओह लोग के तब ले बन्हक बना के रखलसि जब ले ऊ आदमी थाना में आत्म समर्पण ना कर दिहलसि.

यशवंत जानल मानल पत्रकार हउवन आ पूरा देश के पत्रकार उनका के जानेले. बाकिर एह सब का बावजूद उनकर केहू सुने के तइयार ना भइल आ महतारी तबे थाना से लवटि पवली जब पुलिस के मकसद पूरा हो गइल. एह गैर कानूनी काम के जतना विरोध कइल जाव ओतना कम होखी. काल्हु मऊ से संपुर्णानन्द दूबे के पाती आइल त पूरा घटना के जानकारी लिहनी. एह सिलसिला में यशवंत के लिखल अपना महतारी के नामे एगो सार्वजनिक चिट्ठी रउरा सभे के सोझा ले आवे लायक लागल. यशवंत पत्रकारन के आवाज का रुप में जानल जाये वाला लोकप्रिय वेबसाइट http://bhadas4media.com के संचालक हउवन. पेश बा उनकर अपना महतारी का नामे लिखल चिट्ठी के भोजपुरी अनुवाद

आदरणीय माँ
गोड़ लागीं.

माँ, हमरा समुझ में आ गइल बा कि तू सभ हमरा के पुलिस अधिकारी काहे बनावल चाहत रहलू. आईएएस अधिकारी बनावल चाहत रहलू. हम पढ़ाई लिखाई में अपना जवार में सबले तेज रहीं, से रउरा लोग सोचत रहीं कि इलाहाबाद पढ़े गइल बा, पढ़ लिख के अधिकारी बन के लवटी आ तब घर के सगरी दुख खतम हो जाई. बाकिर माँ, हम भगत सिंह के आदर्श मानत एगो नक्सलवादी संगठन आइसा से जुड़ गइनी. अपना परिवार के दुख दर्द का सोझा समाज के दुख दर्द ज्यादा बड़ लागल आ नौकरशाह बन के अपने जनता पर राज करे का जगहा जनता का बीचे रहि के ओह लोग के गोलबंद करिके सत्ता शासन से लड़ाई कइल उचित लागल. बाकिर ई ढेर दिन ले चलल ना. हमरा लागल कि जनता का बीच रहि के ओकरा के गोलबंद कइल बेहद मुश्किल काम बा से हम बीच के रास्ता चुन लिहनी. कलम का जरिये जनता के आवाज उठावल शुरु कइनी. इलाहाबाद आ बीएचयू में छात्र आन्दोलन, नुक्कड़ नाटक, गाना बजाना करत कब पत्रकार बन गइनी पता ना चलल.

बाकिर, उहे कीड़ा जवन हमरा के भगत सिंह के रोल मॉडल माने के कहलसि आ परिवार के हित का बजाय समाज आ जनता के हित के बड़हन माने के नसीहत दिहलसि, हमरा के कतहीं चैन से ना रहे दिहलसि. सिस्टम के, आफिस आफिस का खेल में रमे ना दिहलसि. काहे कि हर जगहा नामो भर के नैतिकता आ ईमानदारी के निर्वाह भारी पड़े लागत रहे. ई नैतिकता आ ईमानदारी कवनो आरोपित भाव ना ह, बलुक बचपन में गाँव का स्कूल में उच्च विचार वाली कविता कहानी स्लोक पढ़ला का चलते बा जवना के झूठ मनला के बावजूद अपना व्यवहार के हिस्सा आजु ले ना बना पवनी. काहे कि तू ही सभ कहत रहलऽ कि झूठ बोलल गलत हऽ, चोरी कइल गलत हऽ. से उहे मानत अइनी. हालांकि अब हमरा लागेला कि ई सब बाति फर्जी हऽ. नैतिकता दू तरह के होले, एगो गाँव वाली जवना के हम तू जियेनी, दोसरका शहर वाली जवना के सफल कहाये वाला चालाक लोग जियेला बाकिर बतावे ना.

हँ, त माँ हम कहत रहनी कि पढ़ाई लिखाई में ठीकठाक होखला का चलते हम पढ़ाई लिखाई में लागल रहनी आ हमरा सामनही बेईमान पत्रकार आ रीढ़विहीन संपादक आफिस का बहरी के धन्ना सेठन से साँठगाँठ कर के मिशन मनी के अभियान चलावत रहले. अपना संस्थानो के बेइमानी के रकम खिआवत रहले त प्रबन्धन खुश हो के ओह लोग के तरक्कीओ देत गइल. ओह लोग का परिवारन में समृद्धि आवत गइल, फ्लैट आ कार खरीदात गइल. दोसरा तरफ हम लिखले पढ़ला के आदर्श मानत रहनी. निमन काम का चलते हमार तनखाह बढ़त गइल, तरक्कीओ मिलत गइल बाकिर सब कुछ बढ़ला का बावजूद, ३५ हजार रुपया के तनखाह का बावजूद महीना का अन्त में पइसा खतम हो जात रहल. ओही कीड़ा का चलते हम आजु ले कहीं जम ना पवनी. सफल ना हो पवनी, काहे कि दुनिया जवना के सेटल होखल कहेले, सफल होखल मानेले, ऊ हमरा खातिर गिरला सरीखा होला, आँख मूंद लेबे जइसन होला. जवन सुख अपना फकीरी में पावेनी ऊ अंबानी बन गइला का बादो हमरा कतई नसीब ना हो सके. बाकिर एह फकीरी के का करीं जे तोरा के थाना जाये से ना बचा सकल.

बाकिर माँ, चिन्ता मत करीहे. हमरा खातिर तू हीं अकेला माँ ना हऊ, तोहरा जइसन लाखो महतारी बाड़ी जवना के बेटा हमरे जइसन हउवें. जे चहीहन कि उनका महतारियन के उत्पीड़न करे वाला के सजा मिले बाकिर उनका तरीका मालूम नइखे. हम कोशिश करब जे माँ तोहरे ना, आगा से तमाम महतारियन के अइसनका जिल्लत जलालत से दू चार ना होखे के पड़े. एकरा खातिर हमरा सोनिया गाँधी से ले के मायावती जइसन तमाम महिला महतारियन से भेंट करे के पड़ी त करेम. कानून अपना हाथ में ले के आपन बाति राखे के पड़ी त ओकरो पर सोचब काहे कि अइसने भगत सिंह सिखवले बाड़न. बाकिर तोरा अपमान के भुलायब ना. हमरा पता बा तू जल्दिये सब कुछ भुला देबू. सभका सोझा अइसन पेश करबू जइसे कुछ भइले ना होखे. कहबू कि पुलिस तोहरा साथे बढ़िया बेवहार कइले रहुवे, बढ़िया से रखले रहुवे. बाकिर हमरा मालूम बा कि तोहार मन भीतर कहीं से चटक गइल होखी. जवन गहिर कचोट लागल होखी ओकराके हम समुझत बानी. तू आपन दुख व्यथा केहू से कह ना सकऽ काहे कि कहला के अधिकार त पुरुष आ पुलिस का लगे बा. तोहरा लोगन के त बस रिसीविंग एंड पर राखल गइल बा, महसूस करत रहे खातिर.

माँ, हम नइखी जानत कि तोहरा के अपमानित करे वाला हम केकरा के मानीं ? नंदगंज के थानेदार के, की इलाका के सर्किल आफिसर के, कि पुलिस कप्तान के ? आ की आईजी के मानीं, की मुख्यमंत्री मायावती के मानीं. एह लोकतंत्र के मानीं कि खुद अपना के दोषी मानीं. हमरा त सभ एके जइसन लागत बाड़े. हिंसक जानवर के पूरा शृंखला बा. हम बहुते भकुआ गइल बानी. हमरा लागत बा माँ कि हमहीं दोषी बानीं जे अतना पइसा ना कमा सकल कि पुलिस वालन के तोहरा लगे चहुँपे से पहिले खरीद लेतीं. अतना बड़ नौकरी ना खोज पवनी कि पुलिस वाले तोहरा लगे पहुँचे के सोचिये के थर्राये लागस. अइसन दोस्त ना बना पवनी जे अतना प्रभावशाली होखतन कि एगो फोने पर गाजीपुर के कप्तान यस सर, यस सर कहत आदेश के पालन में जुट जाइत. एहसे माँ हम अपने के दोषी मानत वादा करत बानी कि हम प्रायश्चित करब आ तोहरा जइसन हजारो लाखो महतारियन के सामने आवत रहे वाला अइसनका मजबूर दिन में ओह लोग का साथे खड़ा रहनी. ओह लोग खातिर लड़ पवनी त अपना के धन्य समुझब.

हो सके त माफ कर दीहे, बावजूद एकरा कि तू हमरा के दोषी नइखू मानत.

बाकिर हम अपना के कबो माफ ना कर पायब.

तोहार,
यशवंत
एह लेख के मूल


संपूर्णानन्द दूबे के ई-पाती

बर्बाद गुलिस्ताँ करे खातिर बस एगो ऊल्लुए काफी बा हर डाल पर उल्लू बैठल बा अब आगे अंजाम का होई. अब राउवीं ई सोच के बता सकीले की आज भड़ास मीडिया के यशवंत जी की माता के साथे जवन कृत्य भइल बा ऊ पूरे भारतीय पत्रकारिता का साथे लागल एक कलंक बा. प्रशाशन जेकर काम आम जनता के सुरक्षा कइल बा ऊहे एगो कलम के सिपाही. के अपना कर्तब्य कइले से रोकत बा. का होखी यह देश के जहाँ भारत माता के विश्व गुरु होखे के परिकल्पना के साथे भारत माता के सपूत दिल्ली में अपना कलम के साथे लागल बा. आ घरे ओही के माता सुरक्षित नइखे. ई ता भारतीय लोकतंत्र का साथे हो रहल अन्याय बा. ई अन्याय का साथे हम सभी के हाथ में हाथ. डाल के अपना कलम के साथे न्याय कर के काम करे के चाही. तबे जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि वरीयसी के सपना साकार होखी.

धन्यवाद.

ई लेख यशवंत जी के माता के नइखे हम सबहीं के माता के बा. एकरा के हम आपके माध्यम से पूरे जनता में प्रदर्शित करल चाहत बनी यह में आपके सहयोग के जरूरत बा.

– सम्पूर्णा नन्द दुबे

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