– डा. सुभाष राय

ब्रज के छाँह में भोजपुरी क दू दिन क विश्व सम्मेलन इहां प्यार की नगरी आगरा में संपन्न भइल. तनी विचार-विमर्श, तनी कविता पाठ अउर तनी नाच-गाना, बड़ा नीक मिक्स रहल. बाकिर आप समझीं की गीत-गवनई अउर नाच-गाना में जइसन भीड़ जुटल, वइसन ओ मौका प ना जुटल, जब साहित्य चर्चा होत रहल भा भोजपुरी के हित क बात. भोजपुरियन क एगो दिक्कति बा कि ऊ खूब मेहनत करेलन, खूब स्वाभिमान से रहेलन बाकिर जब बाति टिकुली, साड़ी, साज-सिंगार अउर नाच-नचउअल क होखे लागि त ओहि में खुद के भुला जालन. हम ई कइसे कहीं कि इहवों अइसने भइल बाकिर अगरा में 30-35 हजार से जियादा भोजपुरिया रहेलें, ओमे से का दसो हजार ई सुनि के घर से ना निकलि सकत रहलन कि उनकी नगरी में उनहीं के भाई-बंधु अतिथि बन के आइल बाड़े, उहो मारीशस, सिंगापुर, सूरीनाम अउर मलेशिया तक से.
A view of the podium of Agra Bhojpuri Sammelan
चलीं छोड़ीं ई बात. पूरबी यूपी अउर बिहार से हमार कई ठो साहित्यकार मित्र भी सम्मेलन में आइल रहलन. इतवार के जब ऊ लोग अपना देस की ओर रवाना होत रहलन त मुलाकात भइल. हम पूछलीं कि रउवा सभै के एहि सम्मेलन के सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि का लागति बा? भोजपुरी क जानल-मानल साहित्यकार आ पाती पत्रिका के संपादक अशोक द्विवेदी अउर भोजपुरी गीत क बड़ हस्ताक्षर डा. कमलेश राय बिना झिझकले बोललन कि पांडेय कपिल जी के सेतु सम्मान एह सम्मेलन क सबसे बरियार उपलब्धि बा. एह सम्मान से ऊ लोगन के साहस अउर बढ़ी, जे भोजपुरी के मान-प्रतिष्ठा बढ़ावे खातिर जूझत बा, जे भोजपुरियन के उनकर अधिकार दियावे खातिर लड़त बा. कपिलजी आपन पूरी जिनगी भोजपुरी माई के सेवा में होम क दिहलन. ऊ खाली एगो रचनाकारे ना रहलन, उनके हिरदय में अपनी मातृभाषा के लेके अइसन हुलास रहल कि देस-विदेस में बहुत लोगन के भोजपुरी आंदोलन में जोड़ले में उनके कामयाबी मिलल. ई सेतु सम्मान उनकी जिनगी भर के संघर्ष क सम्मान बा. एहसे सबके खुशी बा बाकिर कुछ भोजपुरियन के ई बात के कष्ट देखाइल कि जेकर सम्मान भइल, ओकरे बारे में कुछ बतावे खातिन मंच प केहू जानकार अदिमी ना रहल. ई समझदारी क बात त ना भइल. चलीं हमहीं बता देईं, कम से कम ई रपटिया पढ़े वाला लोग त जानि लिहें कि पांडेय कपिल क का उपलब्धि बा. ऊ भोजपुरी क एक ठो बड़ रचनाकार आ अपनी भासा अउर संस्कृति के लड़ाई क प्रतीक-पुरुष हवें. उनकर फुलसुंघी उपन्यास क काफी चर्चा भइल. काफी समय तक ऊ उरेह पत्रिका क संपादक रहलन. भोजपुरी साहित्य सम्मेलन पत्रिका क भी ऊ संपादन कइल. उनकर नाम एक ठो गजल संग्रह भी बा – अचको कहा गइल.

संगठन क बारे में सम्मेलन में का खास बाति भइल, ई केहू कुछ बुझल ना. काहे से कि ई कुल बन कमरा में भइल. हं, भाषण-भीषण सब सुनल. केहू ए सम्मेलन के सूर अउर कबीर क मिलन बतवलस त केहू हरिदास आ कबीर के. एक जना कहलन कि ई गंगा-जमुना क मिलन बा. ई कुल बाति क कवनो अरथ लगावल जाय त ई बुझाता कि भोजपुरी के दूसरकन बोलियन के विकास आ समृद्धि में आपन हित देखाता. ई नीक सोच बा. अगर राजनीति क नजरिया अलगाइ के सोचीं त बात सोलहो आना खरी बा कि हिंदी आ ओकरी बोलियन क भलाई साथे-साथे चलले में बा ना कि एक-दूसरा क टांग खींचला में. 1976 के भोजपुरी सम्मेलन में हिंदी के शलाका-पुरुष हजारी प्रसाद द्विवेदी कहले रहलन कि भोजपुरी क सोगहग प्रेम अगर निम्मन चित्त से आपन काम करे त हिंदी क राष्ट्रभाषा के रूप में मान-सम्मान बनल रही अउर एकरी कुल बोलियन क भी रस्ता केहू रोकि ना पाई. ई सोगहग क उत्पत्ति हजारी प्रसाद जी के अनुसार संस्कृत के सयुगभाग से भइल बा जवने क मतलब बा दूनो भाग यानी संपूर्ण. उनक मतलब ई रहल कि हिंदी आ भोजपुरी, दूनो साथे-साथे आगे बढें. अब ई सोगहग में ब्रज, अवधी, बुंदेली, मैथिलि सबके रखे के चाही. भाषणन से त लागल कि भोजपुरिया लोग द्विवेदीजी क रस्ता धरे के तइयार बा.
Cultural programme at Agra Bhojpuri Sammelan
रउरा के थोड़ा अचरज होई जब हम कहब कि भोजपुरी खातिन सबसे नीक बात सुझवलन एक ठो अवधीभासी विद्वान. ऊहो साइंस क अदिमी, जेके साहित्य आ भासा से दूर-दूर तक किछु लेवे-देवे के ना बा. अगरा यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर बाड़न प्रोफेसर के एन त्रिपाठी जी. उनकर विचार रहल कि सबसे जरूरी बाति बा भोजपुरी के साहित्य संग्रह आ ओमे जियादा से जियादा लेखन क, जवनी से ओकर समृद्धि बढ़े. भोजपुरी के जवन समरथ लोग बाड़े, ऊ अपना बोली क अपने घर आ दफतर में उपयोग करें. उनके एमे कवनो संकोच ना होखे के चाही. तुलसीदास कहले बान कि समरथ के नहिं दोस गुसाई. अइसन लोग जब भोजपुरी बोलिहें त लोग उनकर नकल करिहें. हिंदी आ देस की दूसरकी भासन से अच्छा साहित्य क अनुवाद भोजपुरी में कइल जाय, भोजपुरी क साहित्यिक पत्रिका निकालल जाय. एसे हमरी लइकन के अपनिये बोली में ऊ कुल पढ़े के मिलि जाई, जवनी खातिन ऊ अंगरेजी की ओर भागत बाड़न. ई बड़ बाति बा बाकिर का हमनी के ई कुल करे कै तइयार बानी?

ई नीक भइल कि एह सम्मेलन में राजनीतिक बाति ना भइल. किछु लोग भोजपुरी के संविधान की आठवीं अनुसूची में डारे खातिन सरकार पर दबाव डाले क बाति कइलन बाकिर ओके कवनो समर्थन हासिल ना भइल. भोजपुरी क आंदोलन अपने परंपरा क, संस्कृति क, अपने रीति-रिवाज आ अपने संस्कार क आंदोलन बा. एकर बागडोर अइसन हाथे में रहे के चाही, जवन संस्कृति आ भासा-साहित्य क मतलब जानत होखे. अगर अइसन ना होई त कुछ लोग जनता के एकजुटता क फायदा उठा के उनुहीं के ठेंगा देखा दिहें आ आंदोलन के हवा निकारि दिहें. जवने आंदोलन से महापंडित राहुल सांकृत्यायन जुड़ल रहलन, जवने से विख्यात साहित्यकार हजारी प्रसाद द्विवेदी जुड़ल रहलन, वोके संभारे के ओइसने व्यक्तित्व होखे के चाही.
मारीशस से आइल रहलीं डा॰सरिता बुधू. उनका मन में भोजपुरी के लेके बड़ जोश देखात रहे. ऊ भोजपुरी खातिन बहुत कामो कइले बानी. उनकर बाति सुनिके सबकी आंखि में नमी आ गइल. ऊ यादि कइलीं वो दिन क जब यूपी आ बिहार के गिरमिटिया मजूर लेके कलकत्ता से पहिलका जहाज रवाना भइल रहल. कलकतवा से चलल बा जहजिया, बयरिया धीरे बहो. ऊ जहाज खाली गिनती के भोजपुरिया मजूर लेके ना जात रहे, ओमे गीता, रामायन भी जात रहे, पूरी भोजपुरिया भासा आ संस्कृति जहजिया प सवार होके जाति रहे. तबे त ऊ मजूर ऊहां विदेस की माटी प जाके मजूर से हुजूर बनि गइलें, गिरमिटिया से गोरमेंट हो गइलें. ई भोजपुरियन के मेहनत, लगन, ईमानदारी अउर स्वाभिमान क परिणाम ह.

एह सम्मेलन में आइल विदेसी भोजपुरियन से हमहन के बहुत कुछ सीखे के बा. उनकर भोजपुरी अब ऊ भोजपुरी ना रहि गइल, जवन ले के ऊ मारीशस, सूरीनाम, ट्रीनीडीड गइल रहलन. ऊ लोग ऊहां के स्थानीय लोगन से एतना घुलि-मिलि गइलन कि उनकी भासा क तमाम शब्द भोजपुरी में आ गइल. एहि तरे भोजपुरी के तमाम शब्द स्थानीय लोगन की भासा में समा गइल. हिंदुस्तानी भोजपुरी क दरवाजा भी हमनी के खुलल रखे के चाही जवने से कि हमहन के संस्कार ताजा बतास के झोंका से वंचित ना रहि जाय. अगर हम सभे वोतने क सकीं, जेतना एहि विश्व भोजपुरी सम्मेलन के मंच से सुझावल गइल बा त भोजपुरी क बहुत भला होई.


ए-158, एम आई जी, शास्त्रीपुरम, बोदला रोड, आगरा
फोन 09927500541


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