‍- सान्त्वना

दिल्ली सरकार के मैथिली भोजपुरी अकादमी ३ नवंबर से ६ नवंबर ले रवीन्द्र भवन, मंढी हाउस, के कौस्तुभ सभागार में चार दिन के संगोष्ठी आयोजित कइलस. एह स्तरीय आ सार्थक आयोजन में शामिल भोजपुरि मैथिली साहित्य प्रेमियन आ साहित्यकारन के उछाह देखि के लागल कि अकादमी अपना पिछला कार्यशैली से अलग हटि के, वाकई मातृभाषा में लिखल साहित्य का प्रति गंभीर आ जागरूक भइल बिया. एह सफल आयोजन पर आखिरी दिन डा॰ प्रमोद कुमार तिवारी अकादमी के सचिव आ उनुका स्टाफ के सराहना करत कहलन कि, “मैथिली भोजपुरी गीत प्रकृति आ लोक के तरल आत्मीय रिश्ता का सहारे लोकजीवन के जियत जागत साक्षात्कार करावे मे समर्थ बा. मैथिली आ भोजपुरी दुनु समर्थ भाषा हई सन , इन्हनी के उर्वर परंपरा हिन्दी के समृद्ध करत आइल बिया. एकरूपता के माँग करत रहे वाला एह बाजारवादी समय में एह लोकभषन के बचावल, अपना भाषाई विविधता आ अपनो के बचावल होई.”

पहिला दिन ३ नवंबर के “मैथिली साहित्य आ बाबा यात्री” विषय पर संगोष्ठी के अध्यक्षता प्रसिद्ध नाटककार महेन्द्र मंगेलिया कइलन. वीरेन्द्र मलिक आ डा॰ देवशंकर नवीन आपन विचार रखलन. कवि रमन सिंह कार्यक्रम के संचालन कंइलन.

दुसरा दिने “भोजपुरी साहित्य आ रघुवीर नारायण” विषय पर संगोष्ठी के शानदार संचालन करत वरिष्ठ पत्रकार ओंकारेश्वर पाण्डे डा॰ रघुवीर नारायण के जीवन से जुड़ल कई प्रसंगन के चरचा करत डा॰ प्रमोद कुमार तिवारी के आलेख पाठ खातिर आमंत्रित कइलन. तिवारी जी भोजपुरी समाज के ओह परिस्थितियन के विश्लेषण करत कहलन कि “बिदेसिया” आ “बटोहिया” गीतन का रचना का पाछे ओह समय के राष्ट्रीय संदर्भ रहे. “बटोहिया” गीत में भोजपुर के ना, बलुक भारत के वर्णन कइल गइल बा, जवन रचनाकार के व्यापक सोच के सूचक बा. भोजपुरी समाज खाली अपने ना, अपना देश का बारे में सोचत आइल बा. “बटोहिया” गीत भोजपुरी लोगन में “राष्ट्रगान” मानल जाला. दूसर वक्ता डा॰ रामनारायण तिवारी ठेठ भोजपुरी में बात करत, भोजपुरी के सांस्कृतिक पार्परिक संदर्भ आ काव्य प्रतिमानन का आधार पर डा॰ रघुवीर नारायण के “बटोहिया” गीत के समीक्षा करत, कहलन कि हर भाषा के आपन रंगतहोला, जवना के बचावे के चाहीं. डा॰ अशोक द्विवेदी “बटोहिया” गीत का संदर्भ में डा॰ रघुवीर नारायण के अमर कवि क संज्ञा देत ओकरा महत्व पर प्रकाश डललन. भोजपुरी समाज दिल्ली के अध्यक्ष अजीत दुबे दिल्ली में भोजपुरी के विकास आ अकादमी का भूमिका पर आपन विचार रखलन. रघुवीर नारायण के पौत्र श्रीप्रताप नारायण अध्यक्षीय भाषण देत, श्रोता वर्ग के पूछल कुछ सवालन के जवाब दिहलन. राजेश सचदेवा एह गोष्ठी के संकल्पना आ एकरा सफल आयोजन पर आपन विचार रखत आगन्तुक साहित्यकारन का सहयोग पर आभार जतवलन.

तिसरा दिने मैथिली में श्रीधरम के कहानी पाठ आ विभा रानी के काव्य पाठ रहे. श्रीधरम वर्तमान समाज के विसंगतियन पर रचल कहानी सुनवलन जवना में बेरोजगारी आ गरीबी से आजिज आदमी कइसे अमानवी आ स्वार्थी पशु बन के अपना बाप के एह खातिर हत्या कर देत बा कि अनुकंपा का आधार प, ओके नौकरी मिल जाय. विभा रानी मैथिली समाज के स्त्री के स्थितियन पर कुछ गीत सुनवली.

आखिरी दिने ६ नवंबर के डा॰ आशारानी लाल के कहानी पाठ भइल. सौतन क जरिए लगातार उपेक्षा सहे वाली आ अपना पूरा जिनिगी पति के सुख से वंचित स्त्री के शान्त भाव से सब कुछ सहत जाए वाली मार्मिक जिन्दगी के सूक्ष्म अंकन कइली. डा॰ रमाशंकर श्रीवास्तव का सुझाव पर कहानी पर चर्चा करत डा॰ प्रमोद तिवारी भोजपुरी समाज का ओह विसंगति पर सवाल उठवलन जवना में स्त्री के “वस्तु” का रूप में देखल जाला. डा॰ रमाशंकर श्रीवास्तव कहानी में विम्ब विधान पर प्रकाश डललन. साहित्य अकादमी के उपसचिव ब्रजेन्द्र त्रिपाठी भोजपुरी समाज के यथार्थ के चर्चा करत कहानी के विश्लेषण कइलन. युवा आलोचक सुशील कुमार तिवारी भोजपुरी समाज में स्त्री के स्थिति आ ओकरा जकड़न में बन्हाइल औरत के विद्रोह ना कइला पर सवाल उठावत कहानी के रेखाचित्र का कोटि में रखलन.

दुसरा सत्र में आधुनिक चेतना आ लोकजीवन के समेटले मधुर गीतन के सुना के डा॰ अशोक द्विवेदी एगो समाँ बान्ह दिहलन. बिल्कुल अछूता विम्ब आ नया संवेदना से लैस गीत, परंपरा का नाँव पर चलत जड़ता के तूरत, अनुभूति आ संवेदना के नया जमीन पर खड़ा क दिहलस. लोक जीवन में मौसम आ प्रकृति से सामान्य जन के संबंध आ विपरीत स्थितियन में ओकरा मानसिक उद्वेग, सोच आ सरोकार के परोसत अशोक द्विवेदी के मर्मस्पर्शी गीतन से श्रोता मंत्रमुग्ध हो उठलन.

अंत में सचिव राजेश सचदेवा एह सफल कार्यक्रम पर खुशी जतावत डा॰ प्रमोद तिवारी के बोलवलन. प्रमोद तिवारी आपन उद्गार प्रकट कइलन “जवना रस, आत्मीयता आ तरलता के अभाव एह शहरी जीवन में बा, ओकर मूल सोत जड़ से जुड़ले में बा. भोजपुरी भाषा मूल जड़ हवे. आज एह सरस काव्यपाठ से भोजपुरी भाषा के ऊ सामरथ आ ताकत समझ में आइल होई. एह लिहाज से ई आयोजन सफल आ सराहे लायक बा.”

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