– मुकेश यादव

‘ये बीबीसी लंदन है’ के आवाज जब साझ के साढे सात बजे रेडियो पर गुजेला, त लगभग 2 करोङ हिन्दुस्तानी रेडियो से चिपक के बइठ जालन, काहे से कि समय होला कार्यक्रम “दिनभर के”. बाकिर अब रेडियो पर ई आवाज हमेशा हमेशा खातिर बन्द होखे जा रहल बा. अपना खास भाषा शैली का चलते दुनिया भर में लोकप्रिय बीबीसी हिन्दी सेवा के पहिला प्रसारण 11 मई 1940 के शुरु भईल रहे जवना दिने विस्टन चर्चिल ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बनल रहले,

ओह समय बीबीसी हिन्दुस्तानी सर्विस के नाम से शुरु भइल एह प्रसारण के खास मकसद रहे दुसरका विश्वयुद्ध का समय भारतीय उपमहाद्वीप के ब्रितानी सैनिकन के समाचार पहुँचावल. भारत के बँटवारा का बाद बीबीसी हिन्दूस्तानी सर्विसो के विभाजन हो गइल, हिन्दी आ उर्दू सेवा में. 60 साल के लमहर इतिहास मे बीबीसी से जुड़े वाला खास नाम में जुल्फिकार बुखारी, बलराज साहनी, जार्ज आँरवेल, पुरुषोत्तम लाल पहवा, आले हसन, हरीश चन्द्र खन्ना, अउरी रत्नाकार भारतीय प्रसारकन के नाम शामिल बा. 1950 का दशक मे बीबीसी हिन्दी सेवा से जुड़ल इंदर कुमार गुजराल बाद में देश के प्रधानमंत्री बनलन.

बीबीसी हिन्दी सेवा के विश्वसनियता आ अलग भाषा शैली एकरा के दुसरका चैनलन से अलग बनावेले. जवन खबर एक बार बीबीसी पर प्रसारित हो जाले ओपर सत्यता के जइसे कि मोहर लग जाले. लोग खबर पर आंख मूद के विश्वास कर लेले. बाकिर जब ई खबर आइल कि बीबीसी वर्ल्ड सर्विस पइसा ना होखला का चलते बन्द कइल जा रहल बा त सभे श्रोता ठकुआ गइल बाड़े. बुझाते नइखे कि एह बात पर कइसे विश्वास कइल जाव.

बीबीसी हिन्दी के चलावे खातिर पइसा दिहल अब ब्रितानी सरकार बन्द कर दिहले बिया. बीबीसी वर्ल्ड सर्विस के प्रमुख पीटर हाँराँक्स कहले बाङे कि सरकारी फ़ंडिँग मे 16 फ़ीसदी के कटौती के कारण भारी मन से ई फैसला लिहल जा रहल बा.

वइसे बीबीसी हिन्दी सेवा कवनो परिचय के मोहताज नइखे. एक बेर लालू प्रसाद यादव ब्रिटेन के यात्रा से वापस अइले त अपना सर्मथकन से कहले कि ऊ बीबीसी लंदन के कार्यालयो गइल रहले ह. फेर का रहे, सर्मथकन के खुशी दुगुना हो गइल. केहू ना पूछल कि ई बीबीसी का ह ? बीबीसी के लोकप्रियता के अंदाज एही वाकया से लगावल जा सकेला कि चाहे ऊ इंदिरा गांधी के हत्या के समाचार होखे भा कवनो बड़ खबर. अगर कबर बीबीसी से आइल बा त साँचे होई. बीबीसी विश्वसनियता के एह कसौटी पर हमेशा खरा उतरल बा. इतिहास बने जा रहल बीबीसी हिन्दी सेवा के कबो भुलाइल ना जा सके. बीबीसी हिन्दी के प्रमुख के रुप मे काम कर चुकल अचला शर्मा के एगो प्रतिक्रिया ध्यान खींचे वाला रहे कि, “ई खाली एगो संस्था के मौत ना ह. अगर भारत शहर मे बसेला त एह सेवा के बन्द भइला से केहु के दुख ना होईत. लेकिन भारत त गाँवन मे बसेला जहवाँ आजुवो लोग बीबीसी सुनेला.”

बीबीसी हिन्दी सेवा के बन्द होखल एगो संकेत बा कि भाषायी पत्रकारिता के तरह गँवे गँवे दम तोड़ रहल बा. अगर कहीं कि बड़ बड़ जने दहाइल जासु गदहा पुछस कतना पानी त उहे हालत बा भोजपुरी पत्रकारिता के जवन अबही ठीक से जनमलो नइखे. पता ना आवे वाला दिन में भोजपुरी पत्रकारिता के सोगहग रुप देखे के मिली कि ना. हम त बीबीसी के हिन्दी सेवा के बन्द होखला के गम मनावत बानी बाकिर खुशी एह बात के बा कि बीबीसी हिन्दी के मोबाइल आ वेब पर मौजूदगी बनल रही.


मुकेश यादव रुङकी से सिवील इंजिनीयरिँग मे प्रथम वर्ष पाँलिटेक्निक के छात्र हउवे आ भोजपुरी खोज नाम के एगो वेबसेवा चलावेले. उम्र-19 वर्ष

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