‘ हिन्दी में सम्पादकीय की परम्परा खत्म हो रही है. साहित्य और पत्रकारिता एक दूसरे से विछिन्न हो रहे हैं, वहीं अखबार दैनिक साहित्य है जो जितना कालातीत होता है उतना ही तात्कालिक भी होता है. अखबार तात्कालिकता का आईना है.’ ई कहना रहे सन्मार्ग से प्रकाशित सम्पादकीय संकलन “कही – अनकही” अउर भोजपुरी उपन्यास “जुगेसर” के लोकार्पण समारोह में आइल हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह के, जे एह दुनु किताबन के सरहलन. कहलन कि कही-अनकही पुस्तक के अनेके टिप्पणियन में साहित्य मौजूद बा. केदारनाथ सिंह सुझाव दिहनी कि दोसरा भाषा के साहित्य के भोजपुरी में अनुवाद होखे के चाहीं.

सन्मार्ग से प्रकाशित एह दुनु किताबन के लोकार्पण केदारनाथ सिंह, महाश्वेता देवी अउर सुब्रत लाहिड़ी संयुक्त रूप से कइलन. वरिष्ठ लेखिका महाश्वेता देवी कहली कि अनुवाद भारतीय भाषन के एक दोसरा के नजदीक ले आवे के बेहतर माध्यम हवे. कहली कि भोजपुरी के लोक साहित्य बहुते समृद्ध बा आ ओकरा के अनूदित करे के चाहीं.

सुब्रत लाहिड़ी के कहना रहे कि बढ़िया सम्पादकीय सोचे पर मजबूर कर देला आ साथही जनता के जागरूको बनावेला. हरेन्द्र पाण्डेय के लिखल उपन्यास “जुगेसर” के चरचा करत कहलन कि भाषा के अस्तित्व बचावे खातिर भोजपुरी के संघर्ष अबहियो जारी बा.

एह लोकार्पण समारोह के संचालन विश्वविद्यालय के कोलकाता प्रभारी कृपाशंकर चौबे कइलन. समारोह में कही-अनकही के लेखक आ जानल मानल वरिष्ठ पत्रकार हरिराम पाण्डेय अउर जुगेसर के लेखक हरेन्द्र पाण्डेय का अलावे पत्र सूचना कार्यालय के वरिष्ठ पदाधिकारी अजय महमिया समेत कई दोसर लोग आपन विचार राखल.

भोजपुरी में पहिलका वेबसाइट “अँजोरिया” के माथ ई बतावत ऊँच होखत बा कि एह दुनु लेखक के रचना अँजोरिया पर पहिले से प्रकाशित रहल बा आ होत रहेला. अँजोरिया के तरफ से हरिराम पाण्डेय जी के आ हरेन्द्र पाण्डेय जी जे बहुते बधाई.


(फोटो में बायें से हरेन्द्र पान्डेय, डा॰ केदारनाथ सिंह, महाश्वेता देवी, प्रो॰ सुब्रत लाहिड़ी आ हरिराम पाण्डेय)

कुछ त कहीं...

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