– जयन्ती पाण्डे

बाबा लस्टमानंद से राम चेला पूछलें कि बाबा हो, लक्ष्मी के भंडार, माने जे सरकार के खजाना कहल जाला ऊ असल में कहाँ रहेला? महँगाई में सबसिडी देबे के होला त सरकार अंगूठा देखा के कह देले कि खजाना खाली बा, कहाँ से दिआई?

बाबा कहलें, खजाना सरकार का लगे ना रहे जी. होखे के असहीं चाहीं बाकिर होला ना. गलतफहमी रहेला कि खजाना सरकार का लगे रहेला. एहिसे लोग तरह तरह के माँग करेला कि स्कूल चाही, अस्पताल, सड़क, बिजली, पानी, अउर ना जाने का का चाहीं. अब जनता के का मालूम कि खजाना सरकार का लगे ना रहेला. तब लोग सोचेला कि सरकार का लगे नइखे त नेतवन का लगे होखे के चाहीं. नेता जे मधुकोड़ा टाइप होखौ त विश्वासो हो जाला कि हँ, खजाना नेतवने का लगे होला. जब से नेता लोग करोड़पति होखे लागल तब से ई विश्वास अउरी पक्का हो गइल कि खजाना सांचो नेतवन के लगे होला. हो सकेला ई देश मे न होत होई त हो सकेला कि स्विस बैंक में होखो.

ई तय बा कि खजाना सरकार का लगे ना होला, एने पता चलल कि खजाना नेतवन का लगे भले मत होखो, सरकारी अफसरनन का लगे जरुर होला. लोग ऊ लोगन के सरकार के नौकर समुझेला. जनता के सेवक समुझत रहेला आ ऊ लोग खजाना के आपन करत रहेला, सरकार खोजत रह जाले कि खजाना रहे त जरूर बाकिर गइल कहाँ? ना मिलेला त घोषणा हो जाला कि खजाना खाली बा. खुद सरकार अइसन घोषणा ना करे काहे कि आखिर लाजो त एगो चीज होला. अपना मुँह से कइसे कहे कि खजाना खाली बा. लोग का कही कि देखऽ खजाना खाली क दिहलसि. जनता बिया कि आपन पेट काट के खजाना भरत रहेले आ सरकार बिया कि खजाना खाली क देतिया. चाहे खुद बदहजमी काहे ना हो जाव. एहसे सरकार खुद त अइसन घोषणा ना करे बाकिर बाद में आवे वाली सरकार जरुर कह देले कि खजाना खाली बा. ई बात से सरकार इहो बता देले है कि भाई, पछिलकी सरकार आप सभे गलत चुनले रहीं. ऊ बड़ा पेटू रहे. देखीं खजाना खाली क गइल. ई दोष हमार ना हऽ आप सबके हऽ. अब जे गलती आप सभे के रहे त आपही भरीं. टैक्स दीं सभे. खजाना भरीं.

बाकिर जरूरी ना कि सब सरकार अइसने मुँहफट होखो. कई सरकार अइसनो होले जे शालीनता से कह देले कि देखीं सभे, सरकार का लगे पइसा नइखे. एहसे विदेशी निवेश नेवते के पड़ी. सरकारी कंपनियन के विनिवेश करे के होई. पब्लिक प्राइवेट भागीदारी चलावे के होई. ओकरा बिना ना हम स्कूल खोल सकीलें, ना अस्पताल. ना रेल चला सकीं ना बस. ना बिजली दे सकीं ना पानी. सड़क त बिल्कुले ना बनवा सकीं. ई हमनी के मजबूरी हऽ. हम खूशी से अइसन नइखीं करत. पर ई ना करब त जनकल्याण ना होई. आ चूंकि जनकल्याण जरुरी बा, एही से ई कइलो जरुरी बा.

एहसे कई लोगन के कल्याण हो जाला. सरकार के, नेता सब के, अफसरान के, सेठन के, ठीकेदारन के, इहां तक ले कि विदेशी कंपनियो तक के कल्याण हो जाला. जनता सोचते रह जाले कि भाई कल्याण त हमार होखे के रहे, बाकिर हमरा अलावे सबके हो गइल.


लस्टम पस्टम के पुरान रचना

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