एगो अरसा से अपना खास किरदारन का चलते भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री में दबंग का रूप में चर्चित सुशील सिंह वाराणसी के अकोढ़ा के एगो जमींदार परिवार से आवेले. उनुकर पिता डा. गुलाब सिंह जानल-मानल चिकित्सक हउवें आ हर पिता का तरह उनुकरो तमन्ना रहल कि बेटा डाक्टर बने. लेकिन आज जब ऊ सुशील के सफलता अपना चश्मा से देखसु त उनुका तनिको निराशा ना होखी आ ऊ फख्र से कह सकेले कि परदा पर जे आपन एगो अलगे छाप छोड़त कलाकार लउकत बा ऊ हमरे बेटा ह.

बड़का भइया अखिलेश
भोजपुरी फिलिमन में खलनायक के किरदार करत एगो खास परिचय बन गइल सुशील जब टीवी धारावाहिक भाग्यविधाता में पहिले निगेटिव आ फेर फिर पाजीटिव रोल कइलन त घर-घर में लोग उनुका के बड़का भइया अखिलेश का नाम से पहिचाने लागल. उनुका चेहरा के भाव-भंगिमा मे कवनो बनावट ना झलके. लागेला कि सामनेवाला इंसान एह किरदार के जिये लागल बा. धारावाहिक के मुख्य कलाकार से बेसी चरचा एह कलाकार के होखे लागल. कैरियर के एह मुकाम पर सुशील के शायद अब पीछे देखला के जरूरत नइखे इ ऊ अब अपना ला फिलिमन के चुने में आ सोच में बदलाव का बारे में सोचे लागल बाड़े. तकरीबन 50 फिलिम में तरह तरह के भूमिका निभा चुकल ई कलाकार अब पाजीटिव रोल कइल शुरु कर दिहले बा आ एहिजो ओकरा सफलता मिले लागल बा. भोजपुरीए फिलिमन में ना, बलुक हिन्दीओ सिनेमा में उनुका काम मिलल बा आ लगातार नया प्रस्तावो आ रहल बा. सुशील सिंह निर्माणाधीन हिन्दी फिल्म मुंबभाई में ओमपुरी का साथे काम करत बाड़े.

कन्यादान से शुरू भइल सफऱ
बनारस के शीलनगर कालोनी (महमूरगंज) में रहत सुशील के स्कूल रहल केंद्रीय
विद्यालय – डीएलडब्ल्यू आ यूपी कॉलेज से उच्च शिक्षा हासिल कइलन. अभिनय के कवनो प्रशिक्षण ना लिहला का बावजूद सुशील के मन मुंबईया मनोरंजन जगत का ओर खींचात रहल. परिवार मुंबई से व्यावसायिक कारण से जुड़ल रहल से आइल गइल होत रहल. जब जासु त फिल्म सिटी ले गोड़ अपने बढ़ जाव. हालांकि कबो सोचले ना रहले कि फिल्म सिटी उनुका के अपना ली आ जल्दिये लोग का जुबान पर उनुकर नाम रहे लागी. साल २००३ में कन्यादान फिलिम से उनुकर फिल्मी सफर शुरू भइल. एक दर्जन फिलिमन में निगेटिव रोल कइलन लेकिन लोग के वाहवाही खूब मिलल.

आहट से मिलल कला संपन्नता
साल २००१ के बात हवे. मुंबई फिल्म सिटी में अइसही शूटिंग देखे चहुँपल रहले. एगो धारावाहिक आहट के शूटिंग चलत रहे. उत्सुकतावश ओहिजे रुक गइलन. एह दौरान एगो शॉट बार-बार कट होत रहल. एगो कलाकार निर्देशक के सोच पर खरा ना उतर पावत रहे. सुशील के लागल कि ऊ ई सीन आराम से कर सकेले से ऊ परेशान निर्देशक से भेंट कइलन आ पूरा भरोसे से कहलन कि ई रोल ऊ कर सकेले. झुंझुआइल निर्देशक पता ना का सोच के सुशील के ऊ किरदार दे दिहलसि आ लऽ ! पहिलेक शॉट ओके हो गइल ! तब साढ़े चार सौ रुपिया मिलल रहे ओहहलसि. आ आहट से उनुका कला
संपन्नता के आहट मिल गइल.

मंडल का दंश से विचलित स्नातक मन
सुशील के साथ के लोग बतावेला कि मंडल आयोग के सिफारिशें लागू होखला का बाद सुशील बहुत विचलित हो गइल रहले. एही दौर में उनुकरा स्नातक के पढ़ाई पूरा भइल आ ऊ तय कर लिहले कि अब नौकरी ना करीहें. बाकिर करीहे का ? इहो तय ना कर पइले रहले सुशील. आ एही ऊहापोह में मुंबई अइलन आ एकरे के आपन कर्मस्थली बना लिहलन. परदे पर आवे का स्ट्रगल का दौर में कई बेर पारिवारिक ताना सुने के मिलल. उनुकर दादाजी ठेठ बनारसी अंदाज में कहसु, का रे भड़ैती करबे ?

परिवार के उमेद रहल कि एक ना एक दिन फिलिम के भूत उतरी आ ऊ घरे लवटी अइहन. गोपालदास नीरज के कहल एगो बात सुशील अकसरहा दोहरावेले कि – मनुष्य का जीवन भाग्य है और कलाकार का सौभाग्य. दरअसल एगो कलाकार अपना कला यात्रा में ना जाने कतना भूमिका जी लेला.

नेचुरल एक्टिंग
सुशील सिंह का बारे में उनुकर साथी कलाकार कहेले कि ऊ नेचुरल एक्टर हउवन आ हर किरदार के बखूबी जी लेल. कबो कवनो शॉट खातिर सुशील का चेहरा पर परेशानी ना झलके. जइसन ऊ अपना सामान्य जीवन में बाड़े वइसने ऊ अपना फिल्मी करियर में लउकेले.

बचपने से दबंग
स्कूल आ कालेजो में सुशील के छवि दबंगे वाला रहे. ऊ जतने शैतान रहले ओतने न्यायप्रियो. शैतानी बालसुलभ रहे आ न्यायप्रियता शायद पारिवारिक संस्कार का चलते. सुशील के करीबी दोस्त अंजनी कुमार झा हँसत हँसत बतावेले कि कई बार सुशील का चलते ऊ पिटात पिटात बाचल बाड़े. क्लास रूम में ऊ आगे बइठत रहे. एक बेर टीचर के घुसते सीटी बजा के नव गइल. सामने हम लउकनी आ टीचर कान पकड़ के हमरा के क्लास रूम से बाहर कर दिहली. हालांकि सुशील पढ़े में हमरा से तेज ना रहल बाकिर नंबर बेसी ले आवे. हमरा बार-बार लागे कि ऊ जरूर कुछ गणित करेला. लेकिन जब
हाईस्कूल आ फेर इंटर में कई विषय में ओकरा डिस्टिंकशन मिलल त हमार भ्रम दूर हो गइल. सुशील जतनी देर पढ़ेला मगन हो के पढ़ेला. याददाश्त का मामिला में त आजुओ ओकर जबाब नइखे. यूपी कालेज में ऊ क्रिकेट टीम के कप्तान रहल आ रंगमंचो पर हिस्सा लिहल करे. एक बेर स्कूल के वार्षिकोत्सव में ओकर हड़प्पा हाउस नाटक बहुते चर्चित भइल रहे.

अजीब अजीब आदत
अंजनी बतावेले कि सुशील के हरकत अजीब रहत रहे. हमरा घरे ओकर बेसी आना-जाना रहल. एक बेर घर से निकलल आ अकोढ़ा अपना गांवे चल गइल. बिना केहू के बतवले. सभे बहुत परेशान भइल. पूरा शहर में खोजाइल आ बाद में पता चलल कि ऊ गांवे गइल बा. कहलसि कि अचानके मन भइल कि खेत देख आईं. एही तरह एक बेर अचानके याद आइल कि गांव में क्रिकेट मैच बा, से बगैर जानकारी दिहले निकल गइल. ओह घरी सुशील के हेयर कटींग करवावे के शौक बन गइल रहे था आ हर आठ-दस दिन पर वह महमूरगंज में मोहम्मद चाचा का सैलून में पहुंच जाव. कहे कि जब चाचा के कैंची माथ पर कचकच करेले त बड़ा मजा आवेला.

जब पिटाई भइल
संपन्न पारिवारिक पृष्ठभूमि का चलते सुशील के आदत शाहखर्ची वाला हो गइल रहे. एक बेर स्कूल फीस के कुछ हिस्सा आइसक्रीम खाए में उड़ा दिहलसि. फेर सोचलसि कि बाकी पइसा के का करीं, फीस त पूरा होई ना. से बाचल पइसा घर का सीढिय़न पर फेंक दिहलसि. बाद में बात खुलल आ ओकर जम के पिटाई भइल. सुशील के माई आजुओ एह बात के कहत मुस्कुरा उठेली.

संवेदनशीलता अउर सादगी
सुशील में संवेदनशीलता बचपन से रहल. अंजनी बतावेले कि उनुका घर में अंजनी का गैर मौजूदगी में हर बतावल काम बेझिझक कर देसु. नौकर-चाकर से भरल घर का बावजूद खुदे साइकिल पर लाद के आटा पिसवा ले आवसु. केहू के मदद के जरूरत होखे त कतई देर ना करसु. बोलसु कम हाथ चलावसु बेसी. अकसरहा कवनो ना कवनो शोहदा के पीट दिहल करसु.

सोचत रहनी जा कि आईएएस बनी
दोस्त अंजनी के अबहियो लागेला कि सुशील के नेतृत्व क्षमता आ तेज दिमाग उनुका के आईएएस बनवा दी. खैर, आजु ऊ कलाकार का रूप में सफलता के ऊंचाइयां छूवले बाड़े, इहो संतोष के बात बा.

परदा पर विलेन लेकिन घर में हीरो
सुशील सिंह के पत्नी माधवी के कहना बा कि संजय अपना पारिवारिक जीवन में वास्तविक हीरो हउवें, परदा पर चाहे जतना विलेन के रोल करसु. माधवी फैजाबाद (उत्तर प्रदेश) के रहे वाली हई आ एह लोग के अरेंज मैरिज साल २००३ में भइल रहे. व्यावसायिक व्यस्तता का बावजूद सुशील परिवार के प्रति अपना दायित्व में कवनो कोताही ना बरतसु. कबो टेंशन भइबो कइल त ओकरा के बेहतर तालमेल से सझुराइयो लिहल गइल. माधवी कहेली कि ऊ हमरा पसंदीदा चीझन से मना लेले आ तब कवनो तरह के ईगो के सवाले ना उठे. सुशील की सबले बड़का खासियत ह उनुकर जमीन से जुड़ल होखल. फिलिमन के स्क्रिप्ट जब भावेला तबहिये हँ करेले. पब्लिसिटी खातिर कबो कवनो गलत हथकंडा ना अपनवले. ई उनुकर सच्चाई ह.


(स्रोत : शशिकान्त सिंह)

Advertisements