बहुते कम निर्देशक ई कहे के जज़्बा राखेलें कि उनका फिलिम के एकहु फ्रेम कवनो दोसरा फिलिम के नकल ना मिली. बाकिर अइसन दावा करत बाड़ें निर्देशक रविकांत. ‘भारतेन्दु नाट्य अकेडमी’ से जुड़के अनेके नाटक मंचन आ साहित्य सेवा करे वाला रविकांत छोटका परदा पर ‘किटी पार्टी’, ‘अंखियों के झरोखे से’, ‘कहीं किसी रोज’ वगैरह धारावाहिक निर्देशित कइले बाड़न. उनुका निर्देशन में बने वाली पहिला भोजपुरी फिल्म ह ‘बिगुल’. नमन प्रोडक्शंस के बैनर तले बनत एह फिल्म में ‘रंगबाज’ हैदर काजमी आ अक्षरा सिंह के जोड़ी बा. पेश बा रविकांत से भइल बातचीत के कुछ खास अंश :

आखिर का खासियत बा ‘बिगुल’ के ?

दरअसल, ‘बिगुल’ उत्तर भारत के सामाजिक परिवेश पर बनल फिलिम ह जवना में एगो किसान-मजदूर के कहानी बा. अपना देश-प्रदेश के समस्या, ओकरा दुःख-दर्द के एह फिल्म में पिरोवल गइल बा. हमार दावा बा कि एह फिल्म में दुनिया के कवनो फिलिम के एकहु फ्रेम के नकल नइखे. ‘बिगुल’ पूरा तरह से मौलिक बावे. एकर भाषा जरूर भोजपुरी बा लेकिन एकर सब्जेक्ट, प्रस्तुतिकरण, फिल्मांकन, फोटोग्राफी, निर्देशन, पोस्ट-प्रोडक्शन वगैरह सगरी एकदम हटके बा. ई एगो बढ़िया दर्जा के पारिवारिक-मनोरंजक फिल्म ह, जवना में फूहड़पन के तड़का नइखे मारल. एकर कथा-पटकथा हमरे लिखल ह जबकि संवाद मनोज पाण्डे आ हमार लिखल. मुख्य कलाकार हउवें हैदर काजमी, अक्षरा सिंह, जितेंद्र यादव, श्रेया शर्मा, मनीष खन्ना, संजय कुलकर्णी, कृष्ण गोपाल अउर संगीता रमन वगैरह. गीतकार-संगीतकार नजाकत-सुजात हउवें. एहमें कुल 8 गो गीत बा, जवना में एगो आइटम गीत ह आ सगरी गीत सिच्युएशनल बाड़ी सँ.

एह फिल्म के अउरी का खासियत बा?

देखीं, पहिलही बतवनी कि सबले बड़ी खासियत बा एकर मौलिक सब्जेक्ट अउर प्रस्तुतिकरण. एकर हर पक्ष खास बा. कहीं कवनो कटौती नइखे कइल गइल फिल्मांकन में. इलाहाबाद में एकरा शूटिंग खातिर 10 लाख रुपिया के सेट लगावल गइल जवन कि पटकथा के डिमांड रहल. अभिनय क बात करीं त हैदर काजमी, अक्षरा सिंह, नवोदित जितेंद्र यादव समेत सगरी कलाकार बढ़िया काम कइले बाड़ें. एह फिल्म के बेहतरीन बनावे में कवनो कसर नइखीं छोड़ले हम. काहे कि हम समझौता में ना बलुक बढ़िया काम करे में विश्वास राखीलें. हम त इहो कहब कि ‘बिगुल’ भोजपुरी इंडस्ट्री में माइल स्टोन फिल्म साबित होखी आ दोसरो फिल्मकार अइसने बढ़िया फिलिम बनावे ला उत्साहित होखीहें.

मौजूदा फिलिमन क बारे में आपके नजरिया?

साँच कहीं त हम संतुष्ट नइखीं काहे कि आजु बनत ज़्यादातर फिलिम समाज के हिस्सा नइखे बनत, बमुश्किल दस फीसदी लोग खातिर बनत बा. हमनी का समाज के बाँट के राख दिहले बानी जा. जबकि फिल्मकारन के दायित्व पूरा समाज ला होखेला. आज समाज टूटत बा आ समाज के छोड़के हमनी का कला-सेवा ना कर सकीं. आजु बढ़िया मौलिक कहानी आ लेखकन के कमी बा. सस्ता लोकप्रियता बटोरल हमनी के मकसद ना होखे के चाहीं. कुछ फिल्मकार कहेलं कि ऊ उहे परोसेलें जवन दर्शक देखल चाहेलें, जबकि हमार कहना बा कि रउरा जवने परोसत बानी दर्शक ओकरे के देखे ला मजबूर बाड़ें. उनुका लगे विकल्प नइखे.

फिल्म के मथैला भा टाइटल ‘बिगुल’ एकरा कथानक में कवना तरह जस्टीफाई भइल बा?

जइसन कि पहिलही कहनी ई एगो किसान-मजदूर के कहानी ह. जब एगो भू-माफिया ओकरा पर अत्याचार करत बा त आखिरकार ऊ किसान ओह माफिया आ ओकरा अत्याचार का खिलाफ उठ खड़ा होके न्याय खातिर बिगुल बजा देता. ई टाइटल कथानक साथे पूरा तरह से जस्टीफाईड बा, फिलिम देखि के रउरो मान जाएब.

कुछ अपना बैकग्राउण्ड का बारे में?

मूल रूप से हम औरंगाबाद, बिहार के हईं. रंगमंच में शुरुए से दिलचस्पी रहल, लिहाजा लखनऊ में ‘भारतेन्दु नाट्य अकेडमी’ से जुड़ल रहनी आ अनेके नाटक मंचित कइनी. साहित्यो में दिलचस्पी बा, कविता लिखिलें. मुंबई साल 2000 में अइनी आ टीवी खातिर ‘अंखियों के झरोखे से’, ‘किटी पार्टी’, ‘कहीं किसी रोज’ वगैरह सीरियल निर्देशित कइनी. ‘बिगुल’ हमार पहिलका फिलिम ह. आ बढ़िया फिलिम बनावले हमार मकसद बा.


(शशिकांत सिंह रंजन सिन्हा के रपट)

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