– ओमप्रकाश अमृतांशु

BhojpuriNatakotsaw-2015रंगमंच पर किसिम-किसिम के रंग के भाव मंचित होखेला. ऊहे भाव दर्शक लोगन के मन आ दिल पे राज करेला. कुछ देर खातिर सभागार में बइठल लोग भुला जाला कि हम जवन देखत बानी तवन हकीकत ना, एगो काल्पनिक दृश्य हऊए. मंच अभिनेता लोगन से भरल बा. कहानी आ परिस्थितियन के साथे दर्शक लोग धीरे-धीरे जुड़े लागेलन. रंगमंच एगो विशेष कला ह जवन अभिनय कला के अलग-अलग तत्व पे अधारित होखेला. संगीत, नृत्य, अभिनय, शारीरिक भाव-भंगिमा आ पृष्ठभूमि से जुड़ल दृश्य के अनेके गतिविधि होखेला मंच प.

१४से १८ फरवरी २॰१५ का बीच भइल दुसरका भोजपुरी नाट्य उत्सव कवनो महोत्सव से कम ना रहे. महोत्सव के उद्घाटन माननीय सांसद आ फिलिम अभिनेता मनोज तिवारी आ सुविख्यात वरिष्ठ नाटककार दया प्रकाश सिन्हा के हाथे दिया जरवा के भइल. जेकर गवाह रहल ‘मुक्तधारा, बांग्ला सांस्कृतिक केन्द्र’, नई दिल्ली. सहयोग संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार आ स्टील अथॉरिटी ऑफ इण्डिया लिमिटेड के रहल. मनोज तिवारी सगरी कलाकारन के पाँच-पाँच हजार रुपिया बतौर सहयोग राशि देबे के घोषणा कइलन.

नाट्य उत्सव के पहिला दिने नाटक ‘बसमतिया चाउर’ के मंचन भइल. जेकर लेखक आ निर्देशक महेन्द्र प्रसाद सिंह रहलें. ‘बसमतिया चाउर’ के कहानी दू गो भाई के इर्द-गिर्द घूमल. एगो भाई महेशर शहर में रहके हवाई जहाज पे घुमस आ दूसरका भाई रमेसर का लगे साईकिल ले ना रहल. एके आंगन में एगो घर पक्का के आ एगो घर माटी के रहे. एगो परिवार बसमतिया चाउर के भात खा-खा के उजबुजाइल रहे त दुसरका परिवार के लड़िकी मालती बसमतिया चाउर रटत-रटत भूखले पेट सूत जात रहे. अभाव आ समृद्वि के एह द्वन्द्व से सराबोर ‘बसमतिया चाउर’ नाटक समाज पे जोरदार प्रहार करत नजर आइल. सभागार में केहू अइसन ना रहल जेकरा आंख से पानी ना छलकल. मुख्य कलाकार रहलें सौमित्र वर्मा, अखिलेश पाण्डेय, कल्पना मिश्रा, मीना राय, सुचित्रा सिंह आ प्रियंका.

नाटक ‘बथान’ के मंचन दुसरका दिने भइल. ‘बथान’ प्रेम के आपन नानी गाँव के बनत-बिगड़त स्मृति के कहानी ह. प्रेम के मामा रामस्वरूप जवन पशु-पक्षियन के बोली समझे वाला प्रकृति प्रेमी आदमी बाड़न. दलित के सहयोग करे के सजा रणवीर सेना के आदमी उनकर लगनवती बेटा के मार के देता. बाद मेें जब रामस्वरूप दलित ननकी से बियाह करत बाड़े, त इनकरो जान अखड़रे चलि जाता. बेचारी ननकी के पेट में रामस्वरूप के बच्चा पलऽता. उ प्रेम के लगे चिट्ठी लिखत बिया. प्रेम शहर के रंग-ढंग में अइसन रंगाइल बा कि ओकरो आँख के पानी मर गइल बा, आ चिट्ठी के अनदेखा कर देता. एह नाटक के निर्देशक हिमाचल प्रदेश के दिलिप गुप्ता रहलन जे मुख्य पात्र रामस्वरूप के भुमिको कइलन.

उत्सव के तिसरका दिने नाटक ‘लोहा सिंह’ के जोरदार मंचन भइल. नाटककार स्व॰ डा॰ रामेश्वर सिंह कश्यप के लिखल एह नाटक के निर्देशन महेन्द्र प्रसाद सिंह के रहे. उहे ‘लोहा सिंह’ नाटक जवन भोजपुरी जगत में १९६२ से १९९॰ के सबले लोकप्रिय रेडियो धारावाहिक रहे. लोहा सिंह के भूमिका सौमित्र वर्मा, फाटक बाबा के अखिलेश पाण्डेय, खदेरन के सूरज मेहरा, बुलाकी के दीपक कुमार, खदेरन के माई के शोभा सिंह आ भगजोगनी के किरदार निभवली महिमा.

चउथा दिने १७ फरवरी के स्व॰ भिखारी ठाकुर के नाटक ’गबरघिचोर’ के मंचन महोत्सव में जान डाल दिहलसि. परिकल्पना आ निर्देशन रहे राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व छा़त्र आ भारत सरकार से फेलोशिप पावेवाला प्रवीण कुमार गुजंन के. द फैक्ट आर्ट एण्ड कल्चरल सोसाइटी, बेगूसराय, बिहार के मंडली ‘गबरघिचोर’ के मंचन एगो नया तरीका से कइलसि. गलीजबो के खुशबू आ गबरघिचोर के अभिनय लालबाबू बड़ी सजगता से निभवलन. गलीज बनल रहलें चन्दन कुमार वत्स आ गड़बड़ी के अभिनय में संदीप कुमार रहलन. अवध कुमार पंच के भूमिका में नजर अइलें आ जल्लाद के भेष में शूलचन्द पण्डित ठिकहूं जल्लाद लागत रहलें.

महोत्सव के पांचवा आ आखिरी दिने १८ फरवरी के चार गो छोटहन-छोटहन हास्य नाटकन के मंचन भइल. आदमी आपन सोंच, आपन विचार आ करम से महान चाहे नीच होखेला. आज हमनी के देश में अंग्रेजी बोलल आ पढ़ल आवश्यकता से अधिका एगो मानसिकता के परिचायक बन गइल बा. आपन बोली, आपन भाषा के छोड़ के लोग अंग्रजी में खात-पियत, बोलत-बतिआवत बा. एही समाज पे प्रहार करत ‘माइडंसेट’ एकांकी से कुछ सीखहूं के मिलल. एकरा साथे-साथे ‘बरतुहारी’ आ ‘पोंगा पण्डित’ दर्शक लोगन के मन बहलावे में आगे रहल.

समापन समारोह के मुख्य अतिथि सुप्रसिद्व हिन्दी आलोचक प्रो॰ मैनेजर पाण्डेय आ विशिष्ट अतिथि मैथिली भोजपुरी अकादमी दिल्ली के उपाध्यक्ष अजित दुबे जी सभ कलाकार लोगन के फूल देके बधाई आ धन्यवाद दिहल लोग.

प्रो॰ मैनजर पाण्डेय कहलें कि आज हमनी सभे के बीच में भिखारी ठाकुर जी नइखीं, बाकिर भिखारी ठाकुर के परम्परा के रंगश्री आ महेन्द्र प्रसाद सिंह आगे बढ़ा रहल बानी. हमरा एह बात के बड़ी खुशी बा.

अजित दुबे संस्कृति मंत्रालय आ रंगश्री के बधाई देत कहलें कि भाषा भाषा के जोडेला. सरकार के इच्छा शक्ति के कमी का चलते आजु ले भोजपुरी के मान्यता ना मिल सकल. श्रमिक वर्ग से उठ के जबले भोजपुरी सभ्य समाज के जुबान पे ना आई हमहन के संघर्ष जारी रही. रंगाश्री के संस्थापक महेन्द्र सिंह के अजित दुबे आपन लिखल किताब ‘तलाश भोजपुरी भाषायी अस्मिता की’ उपहार स्वरूप दिहलें.

जहां ले भोजपुरी नाटक के बात बा, गिनले-चुनल संस्था भोजपुरी नाटक खातिर समर्पित बाड़ी सँ. एहमें रंगश्री के स्थान सबले ऊपर बा. रंगश्री के सराहनीय कदम के कवनो मोल नइखे, अनमोल बा.

जय भोजपुरी. जय भारत.

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