हौसला बुलंद होखे त मंजिल क़दम तरे आइये जाले. लेखक -निर्देशक महमूद आलम पर ई कहावत एकदम फिट बइठेला. एगो टी वी चैनल के कैमरामैन से शुरू भइल उनुकर सफ़र आजु अपना बुलंदी पर बा. कैमरा का बैग आ त्रिपाड उठवले इवेंट दर इवेंट घूमे वाला शख्स आज करोड़ों के लागत से बनत फिलिमन के बोझ अपना कान्हे उठवले घूमऽता. आ उहो पूरा यकीन का साथ. भला कामयाबी दोसर का होला ?

महमूद तकनीक आ कल्पना के बेजोड़ फेंट अपना फिलिमन में पेश कइल चाहेलन. अमूमन ई होला कि जब कवनो कैमरामैन निर्देशक बनेला त फिल्म तकनीकी रूप से भलही सशक्त होखे, कहानी आ कल्पना के स्तर पर बेजान नज़र आवेले. इहाँ ले क़ि अशोक मेहता जइसन निर्देशको एह मिथक के ना तूड़ पवले. लेकिन महमूद आलम अपवाद साबित भइलन. महमूद के तकनीक का साथे साथ कंटेंटो के बढ़िया समुझ बा. उनुकर पहिलका फिल्म “प्यार के बंधन न टूटे मितवा” के रशेज जेही देखल उहे मानल कि फिल्म तकनीक मे त मजगर बड़ले बा, कंटेंटो में बेजोड़ बा. हालांकि महमूद के ई फिल्म अबही ले रिलीज नइखे भइल बाकिर तबहियो महमूद का लगे फिलिमन के लाइन लागल बा. “गवनवा के साड़ी” अउर “प्यार हो के रही” जल्दिये फ्लोर पर जाये वाली बाड़ी सँ. साथ ही “साजन बिन पार्टी” आ “आये हम बराती” ओ पर काम शुरू हो चुकल बा.

महमूद आलम के कहना बा कि फिल्ममेकिंग आर्ट से बेसी साइंस ह. अगर सही गणना आ इरादा से फिल्म बनावल जाव त ओकरा नाकामयाबी के सवाले नइखे. उमेद कइल जाव कि महमूद आलम भोजपुरी सिनेमा के अपना एह समुझ से जरूर फायदा चहुँपइहे.


(स्रोत – स्पेस क्रिएटीव मीडिया)

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