युवा लेखक अमित झा भोजपुरी फ़िल्म जगत में एगो जानल मानल नाम ह. अपना पहिलके फ़िल्म “मुंबई की लैला, छपरा की छैला” से चर्चा में आ गइले. अनेके फ़िल्मन के पटकथा आ संवाद लिखले . साल 2007 में उनका सर्वश्रेष्ठ भोजपुरी डायलॉग राइटर अवार्डो मिलल. “बिहारी माफ़िया” खातिर नौमिनेशन मिलल. भोजपुरी धारावाहिक ‘बाहुबली’ आ ‘सातो वचनवा निभाइब सजना’ के संवादो उहे लिखले. सिनेमा के आपन पैशन माने वाला 32 बरीस के अमित झा, आजु काल्हु कलर्स खातिर “भाग्यविधाता”, सहारा वन खातिर “बिट्टो” आ इमेजिन खातिर “काशी” लिखत बाड़े. दू-तीन साल के रिसर्च का बाद एगो हिन्दी फ़ीचर फ़िल्म के स्क्रिप्टो पर काम शुरु कइले बाड़न. एहिजा पेश बा उनकरे से भइल बातचीत के प्रमुख अंश :

Amit Jha, story and script writerअतना सब कुछ करत रहे के ताकत रउरा कहां से जुटाइले आ उहो लेखन का दुनिया में ? हम त कुछ नइखी करत. लिखला का साथ जवन चीज छूट गइल ओकरो त सोची. फोटोग्राफी छूटल, एक्टिंग छूटल. एहू खातिर समय निकालब. आपन फ़िल्म बनावे के बा बतौर निर्देशक. ओकरो तइयारी करत बानी.सोचलो त एगो बड़ काम ह. ओकरा से बहुते सारा नया विचार भा आईडिया सामने आवेला. स्पेनी फ़िल्मकार लुई बुनुएल कहत रहले कि एक आदमी के 24 घंटे में से 22 घंटे लिखे खातिर, सोचे खातिर, आ कल्पना करे खातिर मिले के चाहीं. मजदूरो त बिना थकले भा या रुकले लगातार काम करत रहेले.

भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्री से जुड़े के का कारण रहुवे?.
देखीं, हर कलाकार के एगो आपन ज़मीन होले. ओकर माटी, ओकर प्रदेश, ओकर एगो खास कल्चर ज मिट्टी, उसका प्रदेश, उसका एक खास कल्चर होला. ओकरे के संबोधित करत ऊ कुछ कहत भा करत रहेला आ जइसे- जइसे अपना काम में, अपना हुनर में रमत जाला वइसे वइसे ओकर काम कवनो खास इलाका के लिमिटेशन से आजाद होत जाला. ई हर क्रिएटिव आदमी का साथ होला आ लेखन त अपना स्वभावे से एगो क्रिएटिव काम ह. भोजपुरी सिनेमा से हमार जुड़ाव एही चलते भइल कि एह फ़िल्मन का माध्यम से अपना समाज, अपना भाषा, अपना कल्चर के सामने ले आवल जाव आ फेर ओकरा के टाईम आ स्पेस के लिमिटेशन से बाहर निकालल जाव. हमरा सगरी फ़िल्मन में… अगर रउरा गौर कइले होखब त ई रिफ़्लेक्शन रउरा मिल जाई.

रउरा टेलिविजनो सीरियलन खातिर लगातार लिखत बानी, हिन्दी फ़िल्मनो खातिर काम कइनी आ कर रहल बानी. जाहिर बा कि ई सब अलग अलग माध्यम आ भाषा के चीज हईं सँ. एकर तुलना रउरा कइसे करब?
राउर एह सवालन के जवाब खातिर त हमरा एगो किताबे लिख देबे के पड़ी.. भोजपुरी आ हिन्दी अपना भाषा आ काफी हद तक अपना कल्चर का वजह से अलगा अलगा त बाड़ी सं बाकिर एकर जे दर्शक बाड़े उनकर प्रोब्लम्स, उनकर समस्या त एके बा. भोजपुरी फ़िल्म इंडस्ट्री के समस्या ई बा कि ऊ अपना दर्शकन के सिर्फ गाहके समुझेला. ई गलत बा. ई कवनो इंडस्ट्री खातिर खतरनाक बा. दर्शक कवनो देश, समाज भा भाषा से आवे ऊ सबसे पहिले एगो नागरिक होला. ओकर कुछ कुछ समस्याएं होली सँ, ओकरा देश-प्रदेश के कुछ समस्याएं होली सँ. ऊ खाली कन्ज्यूमरे ना होला. हिन्दी सिनेमा अब एह सोच से मुक्त हो रहल बा बाकिर भोजपुरी? हम त कबो कबो इहे सोच के परेशान हो जानी कि भोजपुरी सिनेमा में एकहू फ़िल्म अइसन नइखे जवन राष्ट्रीय स्तर पर स्टैंड हो पावे. अइसन काहे बा? रउरा हैरानी होई ई जान के कि आजुओ बहुत कमे ऐक्टर्स होइहे जे फ़िल्म साईन करे से पहिले स्क्रिप्ट डिमांड करत होखीहन. सेट पर शूट के समय डायलौग में तब्दीली के कवनो मतलब रउरा समुझ में आवेला? बाकिर ई होला आ ई सब ओह दौर में हो रहल बा जब बिहारे यूपी में ना, बलुक सगरी भारत में “रंग दे बसंतीचोला’ आ ‘ब्लैक’ जइसन फिल्म पसंद कइल जा रहल बाड़ी सँ. “लगान” के जवन बैकड्रौप बा, ऊ भलही इतिहास रहे बाकिर जवन कल्चर बा, जवन बोली बा ऊ त गांव-गंवई के बा कि ना. बाकिर का बेजोड़ कहानी रहे. ओकर पटकथा बहुते बढ़िया बा.

त रउरा ई कहल चाहऽतानी कि भोजपुरी फ़िल्मन में बढ़िया पटकथा के अभाव बा?
बिल्कुल बा. हिन्दीओ में बा. 80 फ़ीसदी से बेसी फ़िल्म फ़्लौप हो रहल बाड़ी सँ. आ हिट- फ़्लौप के छोड़ियो दीं काहे कि रउरा अपना फ़िल्म के एगो बढ़िया फ़िल्म होखे कर दावा त कर सकीले बाकिर हिट- फ़्लौप के भविष्यवाणी ना. हम बात करत बानी स्क्रिप्ट ओरिएंटेड फ़िल्मन के. सिनेमा तकनीकी रुप से विकसित त हो रहल बा बाकिर दर्शक तकनीक देखे त थियेटर जाला ना. ऊ जाला एगो बढ़िया कहानी का खोज में. भोजपुरी में देखा दीं एकहू फ़िल्म, जवन स्क्रिप्ट ओरिएंटेड होखे. माफ़ी चाहब बाकिर भोजपुरी सिनेमा फ़ूहड़ता का चंगुल से निकलल नइखे. बहुत बड़हन बदलाव के ज़रुरत बा. एकाधे लोग एकर कोशिश करत लउकत बाड़े. अइसन नइखे कि एगो भाषा का रुप में भोजपुरी के बुनियाद कमजोर बा. भिखारी ठाकुर अगर रउरा याद ना आवस त अउर बात बा. त आखिर सिनेमा अपना जड़ से अतना उखड़ल काहे बा?

बाकिर दर्शको के पसंद नापसंद के सवालो त बा?
ई कहके कि दर्शक इहे पसंद करेले, पल्ला ना झाड़ल जा सके. दर्शक पेटे से पसंद नापसंद के बात सीखके पैदा ना होखे. इंटरेस्ट बनावे पड़ेला. एगो ईमानदार लेखक भा निर्देशक आपन जवन दर्शकवर्ग तैयार करेला ऊ दर्शक समाज के हिस्सा होला. ओकर आपन एगो समुझ होला भा हम ओकरा समझ के अउरी मजबूत बनावत चलीले. डालीं ना आइटम नंबर जतना डाले के बा बाकिर अतना त खयाल राखीं कि फ़िल्म के गाना कहानी के आगा बढ़ावत बा कि ना. ऊ कहानी के नैरेटिव का हिस्सा बा कि ना. “गंगाजल” के आईटम डांस अगर गौर से देखीं त सब पता चल जाई. हम त टीवी सीरियल्स के गानो लिखले बानी. एकता कपूर खातिर “सर्व गुण संपन्न” के गाना हाल ही में लिखनी. “भाग्यविधाता” के गाना हम लिखनी. हम हिट भा फ्लौप सोच के ना लिखीं. साहित्य में त कहल जाला कि जब अभिव्यक्ति ईमानदार होले त देश-दुनिया के कवनो ना कवनो कोना में पाठक मिलिये जाले.

कही ई सब एह चलते त नइखीं कहत अब रउरा मेनस्ट्रीम टीवी इडंस्ट्री में ढेर काम मिले लागल बा, हिन्दीओ फिल्म शुरु करे वाला बानी?
ना, बिल्कुल ना. हिन्दी के बड़- बड़ स्टार्स आ मशहूर हस्ती भोजपुरी इंडस्ट्री में आके काम करत बाड़े. मामला कुछ अउर बा. हम अगर रउरा शर्त पर काम करे के तइयार बानी त रउरा काहे ना? भोजपुरी सिनेमा के हम विकसित होत देखल चाहऽतानी. “ए वेडनसडे” फ़िल्म के एगो डायलौग ह कि जब घर में तेलचट्टा हो जाव त झाड़ू लगावही पड़ी. भोजपुरी सिनेमा इंडस्ट्री हमरा घर लेखा बा एहसे एकर साफो सफाई के जिम्मेदारियो हमरे बा.

टीवी का काम में कवनो चैलेंज लउकेला. हमरा त ना लउके कि कवनो चैलेंजिग काम हो रहल बा छोटका परदा पर?
बहुते सारा चैलेंज बाड़ी स भाई जी. रउरा जइसन सोचत बानी वइसनका बिल्कुल नइखे. रोज-रोज अलगा-अलगा चुनौती बा. टीआरपी के चुनौती त जानते होखब, ओकरा अलावा सिरियल के अधिका से अधिका रियल बनावल आ लिखलो एगो बड़हन चुनौती होला. अब कुछओ ना लिखल जा सके. अगर लिखबऽ त ओकरा के रिअलिटी के करीब राखे पड़ी.अलगा अलगा इलाका के कहानी बा त ओहिजा के बोली, ओकर अन्दाजा, उनकर रहन-सहन, खान-पान सब पकड़े पड़ेला. फेर एकरो खयाल राखे के होला कि कहानी अगर मोतिहारी, बिहार के तरफ़ के बा तबो ओहमें अतना ईमोशन आ ड्रामा ले आइल जाव कि दोसरो राज्यन में लोग ओकरा के पसंद करस आ देखस. एगो अउरी बात बा. “भाग्यविधाता” लिखल जब ने शुरु कइले रही जा त हमनी के 7 बजे के टाईम-स्लौट मिलल रहे जवन एकदमे खाली जाला. एको दर्शक ना भेंटास. हमनी का अपना काम से, अपना टीम-वर्क से, 7 बजे वाले टाईम-स्लौट के एक तरह से प्राइम-टाईम में बदल दिहनी जा. ई बहुते चुनौती भरल काम रहे. टीवी में त रोजे नया-नया चुनौती मिलेला.


(स्रोत : उदय भगत)

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