Ram Raksha Mishra Vimal

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

एहमें कवनो संदेह नइखे कि लोकसाहित्य में लोकगीत के जगह सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण बाटे. जनजीवन में एकरा व्यापक प्रचार के स्वीकार करत राधावल्लभ शर्मा जी मानतानी कि ई गीत भावुक आ संवेदनशील जनता के हृदय के स्वाभाविक उद्गार होले सन. ईहे कारन बा कि भिन्न-भिन्न भषन के लोकगीतन में भावना के समानता पावल जाला. ए गीतन में छंद ना, बलुक लय के माधुर्य होला. जवन आनंद एह गीतन के सुनला से मिलेला, ऊ पढ़ला से ना. एहमें अभिव्यक्ति के भंगिमा, भावना आ विचारो के विलक्षणता पावल जाले. अतने ना बलुक एमें अपना क्षेत्र के सभ्यता, संस्कृति आ परंपरा के एकदम सही झाँकियो मिलेले. ई गीत जवना परिस्थिति में गावल जाले सन, ओकरा साथे मिल गइला पर त अइसन लागेला कि अतना मधुर आ प्रभावशाली गीत दोसरा जगह ना मिलिहें सन. इहनी में भारतीय जीवन के अंतरंग धारा के ज्ञान निहित बाटे. ई गीत अपना क्षेत्र विशेष खातिर वरदान स्वरूप बाड़े सन आ लोकजीवन के लगातार रससिक्त करत रहे के इहनी में अद्भुत क्षमता बाटे.1 कृष्णदेव उपाध्यायो जी मानींले कि जन संस्कृति के जइसन सही आ सजीव चित्रण लोक साहित्य में उपलब्ध होला, ओइसन कतहीं अउर ना. सरलता, स्वाभाविकता आ सरसता में त एकर कवनो जोड़े नइखे.2

लोकगीतन के भाषा आ सामग्री में आज के शिक्षित समाज अइसन कुछऊ ना खोज पावेला, जवना से ओकर मिथ्या स्तरीयता धराशायी ना हो जाउ भा श्रम, चिंतन आ बहस के रास्ता से ‘नो कमेंट’ के मुद्रा में चुपचाप निकल जाइल चाहेला आ नाहीं त साधारण लोगन के मुहबिचकाऊ भीड़ में खुद के शामिल कऽके सुरक्षित भइल चाहेला. बाकिर, डॉ. विद्यानिवास मिश्र एह लोकनिधि के गरिमा के खूब चिन्हले बानी. उहाँका मानींले कि लय आ ताल के परख जतना एह गीतन में बा, ओतना संस्कृत साहित्य के छंदन में साइते मिल सकेला.3 उहाँके अनुसार लोक साहित्य के भाषा शिष्ट आ साहित्यिक भाषा ना होके साधारण जन के भाषा हटे, ओकर वर्ण्य वस्तु लोक जीवन में रचल-बसल चरित्रन आ भाव-प्रभाव तक सीमित बा आ ओकरा रचना में व्यक्ति के ना बलुक समूचा समाज के समवेत योगदान बाटे. इहे कारन बा कि लोक साहित्य पर व्यक्ति के छाप ना होके समग्र व्यक्ति-लोक के छाप होखेला.4

परंपरा, बियाह आ बियाह गीत

भारतीय संस्कृति में बियाह सबसे प्रसिद्ध प्रधान संस्कार के रूप में जानल जाला. बियाह भारतीय परंपरा में खाली एगो मांगलिके काम ना हटे, बलुक ई भारतीय समाज में एगो जिम्मेवार जिनिगी के शुरुआत के लोकोत्सवो का रूप में स्थापित बा. बियाह के प्रथा अलग-अलग क्षेत्रन आ जातियन में भिन्न भिन्न होखेले. एही से एह अवसर पर गावे जाएवाला मंगलोगीतन में विविधता मिलेला.

बियाह के गीत बर आ कन्या दूनो के घर में गावल जाला. जहिया बर के तिलक चढ़ेला, ओही दिन से ए गीतन के गवाई शुरू हो जाला. जहाँ बर पक्ष के गीतन में खूबे उछाह आ उत्साह लउकेला, ओहिजे कन्या पक्ष के गीतन में उदासी साफ-साफ लउकेले. 5 हालॉकि आजु अब ऊ बात नइखे रहि गइल. आज स्थिति बदल गइल बिया. आज के दुख-तकलीफ के अनुभूति क्षणिक हो गइल बिया आउर उछाह आ उत्साह दूनो ओर लउके लागल बा. जवन संकोच आ लाज कबो हमनी के मर्यादा के प्रतीक होखत रहे, ओकरा के इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के ग्लोबल संस्कृति लगभग लील गइल बिया. हँ, अलग से तिलक-दहेज का सङही अभिमानो प्रदर्शन के तनाव लउके लागल बा. बियाह का अवसर पर कई प्रकार के बिधि-बिधान कइल जाला, जवना में गीतन के गावलो एगो जरूरी अंग मानल जाला. एह बिधि-बिधानन का अनुसार एह गीतन के विभाजन संक्षेप में अइसे कइल जा सकऽता –

कन्या का ओरि के गीत

  • 1.तिलक के गीत
  • 2. संझा के गीत
  • 3. माँड़ो के गीत
  • 4. माटी कोड़ाई के गीत
  • 5. कलसा धराई के गीत
  • 6. हरदी के गीत
  • 7. लावा भुँजाई के गीत
  • 8. मातृपूजा के गीत
  • 9. दुआरपूजा के गीत
  • 10. गुरहत्थी के गीत
  • 11. लावा मेराई के गीत
  • 12. बियाह के गीत
  • 13. भाँवर के गीत
  • 14. चूमे के गीत
  • 15. दुआर रोके के गीत
  • 16. कोहबर के गीत
  • 17. परिहास के गीत
  • 18. भात के गीत
  • 19. बर के अबटन लगावे के गीत
  • 20. माँड़ो खोलाई के गीत
  • 21. बरात के बिदाई के गीत
    22. कक्कन छोड़ाई के गीत
  • 23. चौथारी के गीत

बर का ओरि के गीत

  • 1. तिलक के गीत
  • 2. सगुन के गीत
  • 3. भतवानि के गीत
  • 4. माटी कोड़ाई के गीत
  • 5. लावा भुँजाई के गीत
  • 6. इमली घोटाई के गीत
  • 7. हरदी के गीत
  • 8. चूमे के गीत
  • 9. मातृपूजा के गीत
  • 10. जोड़ा जामा पहिनावे (वस्त्र धारण) के गीत
  • 11. मउरि के गीत
  • 12.परिछावन के गीत
  • 13. डोमकछ के गीत
  • 14. गोड़ भराई के गीत
  • 15. कोहबर के गीत
  • 16. कक्कन छोड़ाई के गीत
  • 17. चौथारी के गीत

भलहीं पंडित जी बियाह के मए रस्म विधिवत मंत्रोच्चार के साथ संपन्न करा दिहीं, बाकिर गाँव में मेहरारुन के तब ले संतोष ना होखे जब ले ऊ लोग ओ मंत्रन का सङही मंगलोगीत ना गा लिहें सन. वर्तमान पीढ़ी के ओ लोगन के लय-सुर भले नीक ना लागो, बाकिर ओ घरी बर भा कन्या- कवनो ओरि से मेहरारुन के गीत ना सुनला पर अतिथि पक्ष अपना के अपमानित अनुभव करेला. आ, ओह घरी त हदे हो जाला जब खात खा मेहरारु लोग गारी ना गावेलिन आ बरियाति रूसिके खाना छोड़िके ‘ठहर’ (भोजन-स्थान) पर से चल देले. एह तरह से ई मंगल गीत लोक संस्कृति के अनिवार्य अंग बन गइल बाड़े सन. मेहरारु लोग एह गीतन के बहुत तन्मय होके आ लय में गावेलिन. एह अवसर पर भोजपुरी क्षेत्रन में बियाह का अवसर पर गावल जाएवाला कुछ मंगल (संस्कार) गीतन के देखीं.

वर आ कन्या- दूनो ओरि एह मांगलिक उत्सव के शुरुआत ‘हरदी भेंवला’ से होला. एह अवसर पर शिवजी के प्रार्थना कइल जाला आ फेरु त हरदी लगावे के गीत गवाए शुरु हो जाला –

पुरइन पात पर सूतेली गउरा देइ
सपना देखेली अजगूत
पार परोसिन तूहू मोर गोतिन
सपना के करऽ ना बिचार,
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आजु हरदिया सरबे गुन आगर
सुरति बहुते मन लागि
एकलि धिया मोहे दिहितऽ बिधाता
मड़वा अइते भगवान.

एकरा बाद बर आ कन्या- दूनो का घर पर सगुन उठेला. ई सगुन बर किहाँ तिलक से पहले आ कन्या किहाँ तिलक के बाद उठेला.

निमिया के डाढ़ि मइया लावेली हिंडोलवा कि झूली-झूली
मइया मोरी गावेली गीतिया कि झूली-झूली
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कोरिन नदिया में दहिया त अमिरित जोरन
दहिया लेहु दहिया लेहु भोजइतिन रउरा घरे जगि हउवे

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बियाह के पहिल दृश्य तिलक के होला. एहमें कन्या पक्ष वर पक्ष किहाँ जाके वर के पूजा करत तिलक चढ़ावेला. दू अपरिचित पक्षन के पारस्परिक संबंध के शुरुआत एहिजे से होला. चउक पूरला से एह अवसर के गीतन के शुरुआत होला –

गाइ के गोबर अङना लिपाइल, गजमति चउक पुराइल भले हो
आवसु राम चउक चढ़ि बइठसु.
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कहँवा के तिलकहरू तिलक लेले ठाढ़ भइले
कहँवा के बाबू कुँअर तिलक ना चढ़ावे.
तिलक गिनले कवन बाबा अनकि-झनकि बोले
मोर बचवा पढ़ल पंडितवा तिलक बड़ा थोर बाड़े.
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ठगि लियो लइका हमारा रे समधी बइमाना………

बियाह का अवसर पर सभे बेटी बहिन नइहर बोला लिहल जाली सऽ. तिलक के बादे से बियाह तक कन्या पक्ष किहाँ रोज साँझी खा एगो निश्चित समय पर मेहरारुन के मंडली जमि जाले आ तरह-तरह के मंगल गीत गवाए लागेला. एह अवसर के गीतन के एगो नमूना-

केइ जइहें पुरुब चनवा केइ जइहें पछिम चनवा
आरे माई केइ जइहें बहिना लियावन चनवा
बहिनिया बीनू ना शोभे मड़वा
बाबा जइहें पुरुब चनवा चाचा जइहें पछिम चनवा
आरे माई भइया जइहें बहिना लियावन चनवा
बहिनिया बीनू ना शोभे मड़वा

माँड़ो (मंडपाच्छादन), मानर पूजन आ मटकोर के गीत बहुत महत्त्वपूर्ण होखेले सन.

आरे बाबा हो कवन बाबा मड़उआ छाइ मोहें देहु
भींजेले मोरे राजा के कुँअर चादर तानि देहु.
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ए पउवा हो खियवले कवन देव के गोतिया हँकरइति
ए मोती सारी झरि गइली कवन देइ के मानर परिछइति.
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कवना बने रहलू ए कोइलरि कवना बने जालू
केकरा दुअरवा हो कोइलरि उछहलि जालू.

बियाह से पहिले बर आ कन्या के अपना-अपना घर पर दूनो के उनकर सगा-संबंधी मेहरारू हरदी लगावेली सन. हरदी लगावत खा हरदी के गीतन के गावे के काम चलता रहेला-

लाल रंग हरदी पियर रंग बाची हो
हाली-हाली हरदी चढ़ाईं मोर चाची हो.
हरदी के झाँस-झूँस सहलो ना जाई हो
हमरो अनजान बेटी अति सुकवार हो.

एह अवसर पर चुमावनो के गीतन में मेहरारू लोग खूब रुचि लेलिन –

हरी-हरी दूबिया अँजुरि भरि चाउर शिवसागर हरी
चूमि चामि देली असीस जियसु वर लाख बरिस.
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घर में से निकलेली आपन अम्मा हो
डाल भरि अच्छत लेले.

बर पक्ष में बरात निकले से पहिले आ कन्या पक्ष में बरात के दुआरे लगला का बाद नहछू नहान के रस्म होला. एहमें ‘हरिस’5 धइके ओकरा पर पीसल हरदी लगावल जाला आ ओह पर बइठाके लइकी के नहवावल जाला.

केई जे पोखरा खनावेला घाट बनावेला
केकर परेला हँकार त सीता नहवावे के.

कन्या पक्ष के जब पता चल जाला कि बरात गाँव में आ गइल बिया त मेहरारू लोग एगो खास जगह पर आसन जमाके गीतन का माध्यम से स्वागत के तेआरी में जुट जालिन –

आपन खोरिया बहारऽ ए अनजान बाबा
आवतरे दुलहा दामाद हो
बइठे के माङे दुलहा पलङ गलइचा
लड़ने के माङे मएदान हो.

आ, जइसहीं बरात दुआरे लागलि कि साइते कवनो गारी होई, जवन उहाँ सभ मंगल गीतन का चासनी में ना परोसत होखबि –

हथिया-हथिया शोर कइले गदहो ना ले अइले रे
तोरा बहिन के……………..
नाँव हँसववले रे.

एह गीतन में बराती लोगन खातिर जहाँ अटपट आ अभद्र शब्दन के प्रयोग होला, ओहिजे दुलहा खातिर सम्मानजनक आ प्रिय शब्दन के. जब बरात दुआरे लागि जाले, तब ‘दुआरपूजा’ कइल जाला| एकरा बादे दुलहा के घर का भीतर जाए के अनुमति मिलेले.

लह ना कवन बाबा धोतिया हाथे पान के बीरा
करऽ ना बरतिया से मिनती हाथे पान के बीरा

एकरा बाद के महत्त्वपूर्ण रस्म गुरहत्थी (गृहस्थी) के होला, एकरा के कन्या निरीक्षणो कहल जाला. एह अवसर पर ससुराल से ले आइल जेवर जेठ (भसुर, दूल्हे के बड़े भाई) दुलहिन के चढ़ावेले –

अइसन भसुरवा के कइसे दीहीं गारी रे
धिया जोगे लवलन्हि रेसमी के सारी रे.
टिकवा ले अइले भसुर हँसुली हजारी रे
धिया जोगे लवलन्हि हार पँचलारी रे.
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काड़ा ले अइले भसुर छाड़ा ना ले अइले रे
काड़ा के शोभा भसुर पायल ना ले अइले रे
एक त खराब कइले मइया बेंचिके अइले रे
दोसरे खराब कइले आधी राति अइले रे.
**********************************
जइसन कुकुरा के पोंछि ओइसन भसुरा के मोंछि……….

गुरहत्थी के बाद दूलहा के फेरु मड़वा में ले आवल जाला आ ओकर परिछन (परीक्षण) कइल जाला –

अँखिया तोरी निरेखीं रे दुलहा कजरो ना रे
मइया तोरी बउराहिनि बर परिछहूँ ना जाने
रे दुलहा कजरो ना रे.

बियाह के सभसे महत्त्वपूर्ण रस्म होले- कन्यादान. एकरा पूरा भइला का बाद बेटी के अपना माई, बाप, भाई, बहिन- सभसे संबंध टूट चुकल होला. जवना बेटी के बाप अपना प्राणो से अधिका प्यार करेला आ ओकरा लालन-पालन में कवनो किसिम के कमी ना आवे देइ, ऊहे जब ओकराके केहूके दान के रूप में देत होई त ओह बाप के का हालत होत होई, एकर अनुमान सहजे कइल जा सकऽता. कन्यादान का अवसर पर गावेआला गीतन में एह दर्द के व्यंजना साफ-साफ देखल जा सकऽता.

धीरे बहे गंगा मधुरे बहे जमुना, सरजू बहेला मँझधार
ताही पइसी बाबा हो थर-थर काँपेले, कइसे करबि कन्यादान
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कवन गरहनवा बाबा साँझहि लागेला कवन गरहनवा भिनुसार
कवन गरहनवा बाबा तोहरा प लागेला कब होइहें उगरास

एकरा बाद सेनुर दानसात फेरा (सप्तपदी) होखेला आउर रात भर मेहरारू लोग के गावे के काम चालू रहेला.

बाबा बाबा पुकारींले बाबा ना बोलेले
बाबा के बलजोरी सेनुर बर डालेले
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बाबा बाबा गोहारींले , बाबा ना जागेले
देत सुनर एक सेनुर, भइलीं पराइ.
जनि छूअ ए दुलहा, जनि छूअ, अबहीं कुँआर
जब मोर बाबा सकलपिहें त होइबो तोहार.

एह मंगल गीतन के नायक बड़ा ढीठ (धृष्ट) होखेले सन. सासु जी इहनी के जवन सलाह देली, ओकरा ठीक उलटा ई करेले सन –

बाग जनि जइहऽ ए दुलहा बगइचा जनि हो जइहऽ
लागल टिकोरवा ए दुलहा छोड़वले जनि हो जइहऽ
बाग हम जइबो ए सासु बगइचा हम हो जइबो
लागल टिकोरवा ए सासु छोड़वले हम हो अइबो.

बियाह का दोसरा दिन मथढक्की होले. एह अवसर पर बर के बाप लइकी के माथ के नया कपड़ा से ढाँकेला, मंडप के बान्ह खोलेला आ फेरु दूनो समधी गले मिलेला लोग.

समधी समधी मिलन आए मीलत दूनो करजोरी जी
दान दहेज समधी एकहुँ ना दीजो लछमिन एकहुँ में दीजो जी.
अइसन बोली जनि बोलहुँ ए समधी, बोलइत देखि शरमायो जी
राउर धियवा कवल करेजवा, से हो लछमिन हमार हो.

एह घरी जब समधी अपना कुछ लोगन का सङे मंडप में भोजन करत रहेले त मेहरारू लोग मधुर-मधुर गारी गावेलिन –

तहरा माई के अतवार लागेला सोमार लागेला
छिनरझप लागेला तनी सुनि लऽ
तनी सुनि ल ए कवन भेंड़ुआ तब जइहऽ तनी सुनि लऽ.

एहमें कवनो संदेह नइखे कि ई गारी मेहरारू लोग के खीझ के प्रकट करेले, बाकिर बर पक्ष के लोग गारी सुनिके बहुत खुश होखेलन.

बियाह के अंतिम दृश्य कन्या के बिदाई के होला, जवन अपने-आप में बहुत मार्मिक होला. एह अवसर के गीत हृदय के तार-तार कइ देले सन.

सुरुज के जोतिया बाबा मोरा ना सहाला गोर बदन कुम्हिलाय
कहतू त ए बेटी तमुआ तनइतीं अउरू उठइतीं छत्र छाँह
होत भिनसहर बाबा बोलिहें चुचुहिया लगबो सुनर बर साथ
कटोरे कटोरे बेटी दुधवा पियवलीं पुतवो से अधिका दुलार
दुधवा के लीखि बेटी देबहूँ ना पवलू लगलू सुनर बर साथ.
जानते त रहलऽ बाबा धियवा पराया काहें के कइलऽ दुलार
दुधवा के लीखि दीहें भइया हो अनजान भइया जिन होइहें बंस तोहार

संस्कार गीतन के ई अनमोल धरोहर हमनी के भीरी त बा बाकिर हमार आज के पीढ़ी एकरा ओर देखे खातिर तइयार नइखे| परंपरा का नाम पर अब खाली औपचारिकता बाँचल बा, जवना में रुचि आ आस्था राखेवाली मेहरारू लोग के संख्या बहुत कम बा. आज के पीढ़ी जो उनकर साथ देतो बिया त फिल्मी भा चर्चित क्षेत्रीय गीतन के पैरोडी का शर्त पर. साइत आज के द्रुतगामी जीवन शैली के ई प्रभाव बा कि ऊ क्षणिक सोच आ चाक-चिक के दुनिया से बाहर नइखे आवल चाहति. ए तरह से, कंठ से कंठ तक पहुँचत सुरक्षित ई संस्कार गीत अब संस्कृति के सुरक्षा भूमि से बाहर होखे लागल बाड़े सन आ डर त ई बा कि काल्हु ई खाली शोध के सामग्री बनिके मत रहि जा सन.

संदर्भ :

  • 1. राधावल्लभ शर्मा, भोजपुरी संस्कार गीत, प्रथम संस्करण, 1977, पृ.सं.(ङ)
  • 2. कृष्णदेव उपाध्याय, लोक साहित्य की भूमिका, षष्ठ संस्करण, 1995, पृ.सं. VII
  • 3. डॉ. विद्यानिवास मिश्र,वाचिक कविता : भोजपुरी, दूसरा संस्करण,2003, पृ.सं.7/8
  • 4. डॉ. विद्यानिवास मिश्र,वाचिक कविता : भोजपुरी, दूसरा संस्करण,2003, पृ.सं.7/8
  • 5. कृष्णदेव उपाध्याय, लोक साहित्य की भूमिका, षष्ठ संस्करण, 1995, पृ.सं.70
  • 6. हरिस [सं० हलीषा]- हर के एगो लम्बा लट्ठा, जवना के एक छोर पर फालवाला लकड़ी आ दोसरा छोर पर जूआ अटकल रहेला.

  • (साभार‍ – परिछन)
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