जे केहू से नाईं हारल ते हारि गइल अपने से
अपने से केहू आपन खुद नाश कै रहल बा.

– दयानंद पांडेय


‘तोहरे बर्फी ले मीठ मोर लबाही मितवा’ जयश्री यादव के एह गीत का तरहे कहीं त भोजपुरी गीतन में मिठास के इहे परंपरा ओकरा के बाकी लोकगीतन से ना सिर्फ़ अलग करेले बलुक इहे मिठास ओकरा के अनूठो बना देले. लेकिन आजु का तारीख में भोजपुरी के मसीहा बन के बइठल गायकी के ठेकेदार एकरा के बाजारि में बेच के भोजपुरी गायकी के बदनाम आ बरबाद कर दिहले बाड़े. भोजपुरी के लोकगीत अब बाज़ार के हवाले होके अश्लीलता, फूहड़पन अउर अभद्रता के छौंक में शेखी बघार रहल बा आ बाज़ार का रथ पर सवार एह व्यभिचार में कवनो एक दू जने ना बलुक समूचा गायक-गायिकायन के संसार जुटल पड़ल बा. इक्का-दुक्का अपवाद छोड़ के.

भोजपुरी गवनई के चलन वइसे त बहुते पहिले से बा तबहियो आधारबिंदु घूम फिर के भिखारीए ठाकुर बनेले. भिखारी ठाकुर आ उनुकर बिदेसिया शैली के गूंज अब एह सदी में मद्धिमे ना विलुप्त होखे का कगार पर खड़ा बिया. भोजपुरी गाना के बात बिना भिखारी ठाकुर के नाम लिहले आजुवो ना हो पावे. ‘एगो चुम्मा दिहले जइहऽ हो करेजऊ’, भा ‘अब त चली गडासा भाला, लोगवा नज़र लडावेला’, भा फेर ‘आरा हिले, बलिया हिले छपरा हिलेला, हमरी लचके जब कमरिया सारा ज़िला हिलेला’ जइसन भोजपुरी गाना खातिर लोग आजुवो भिखारी ठाकुर के दम भरेला लेकिन भिखारी ठाकुर ‘अपने लइकवा के भेजें स्कूलवा/हमरे लइकवा से भंइसिया चरवावें’ जइसनो गाना लिखले आ गवले से कमे लोग जानेला. ठीक वइसहीं जइसे “आरा हिले, बलिया हिले” गीत के मर्म बहुते कम लोग जानेला. अधिकतर लोग एह गीत के भोजपुरी गवनई में अश्लीलता के पहिलका सीढी मान बइठेला आ मन ही मन मज़ा लेला. अइसन लोग के अपना आँखि के मोतियाबिंद उतार के आ बुद्धि के पखार के जान लेबे के चाहीं कि भिखारी ठाकुर के ई गीत “आरा हिले, बलिया हिले” कवनो मामूली गीत ना होके व्यवस्था के चुनौती देबे वाला गीत ह जहवाँ मुंशी, दारोगा, कोतवाले ना सगरी जिले हिल जाला एगो कमर भर का हिलला से. सोचीं कि एगो कमर हिलला भर से जब सगरी व्यवस्था हिल जाव त आगा का होई ? अउर अब त हमनी का सोझा घोटालन के अंबार लाग गइल बा आ लोग खामोश पड़ल बा. अन्ना हज़ारे का हिलोर का बावजूद !

पता ना काहे लोग कुछ गाना के तासीर आ ओकर अर्थ विन्यास लोप कर कर के दोसर अर्थ पकड़ लेले. अइसने एगो गाना “पाकीज़ा” फ़िल्म के बा, ‘इन्हीं लोगों ने ले लीना दुपट्टा मेरा.’ एह में का सिपहिया, का रंगरेजवा, सबे दुपट्टा ले लेता. दरअसल ई दुपट्टा ओकर इज़्ज़त ह जवमा ले सभे बारी-बारी तार-तार करेले. एब एहू गाना के मर्म अधिकतर लोग भुला बईठेले आ एह गाना के असल तासीर डूब जाले. अइसनका कई गो गाना बाड़ी सँ. एगो अउरी गाना सुनीं आ याद करीं. अबही हालही में मशहूर भइल रहे ‘जब से सिपाही से भइलैं हवलदार हो, नथुनिए पे गोली मारें’. इहो पद का मद के ब्यौरा बाचे वाला गाना बाकिर अश्लीलता के इनार में उतर के अजबे सनसनी फइला गइल. ई असल गाना बालेश्वर के रहल बाद में मुन्ना सिंह एकरा के थाम लिहलें आ बाजार पर सवार करा दिहले, फ़ास्ट म्यूज़िक में गूंथ के. फेर रहल सहल कसर उतार दिहल गइल एगो हिन्दी फिल्म में गोविंदा रवीना पर फ़िल्मावल गाना ‘अंखियों से गोली मारे.’ में.

भोजपुरी के कई गो निर्गुनो गाना का साथे इहे बा. लोग औकर तासीर त समुझे ना, मर्म समुझे ना आ कौव्वा कान ले गइल का तर्ज पर गाना ले उड़ेले, भोजपुरी के बदनाम, बरबाद जवम कहीं कर बइठेले. त का करब ? ‘सुधि बिसरवले बा हमार पिया निर्मोहिया बनि के’ जइसन मादक आ मीठ गीत गावे वाला मुहम्मद खलीलो जइसन गायक भइले जिनका के आजु का दौर में कमे लोग जानेला काहे कि बाजार में ओह लोग के गाना के कैसेट कतही नइखे. बा त सिर्फ आकाशवाणी का कुछ केंद्रन का आर्काइब्स में. लेकिन जवन टिंच आ मिठास अपना भोजपुरी गीतन में मुहम्मद खलील परोस गइल बाड़न, जवन रस घोर गइल बाड़न ऊ मुश्किले ना दुर्लभो बा. ‘अंगुरी में डसले बिया नगिनिया हो, हे ननदो दियना जरा द. दियना जरा द, अपना भइया के जगा द. रसे-रसे चढतिया लहरिया हो, हे ननदो भइया के जगा द’. एह गीत में जवन मादकता, जवन मनुहार, जवन प्यार ऊ अपना गायकी के रस में डुबो के छलकावेले कि मन मुदित हो जाला, लहक जाला मन जब ऊ एह गीत में एगो कंट्रास्ट बोवत गावेले, ‘ एक त मरत बानी नागिन के डसला से, दूसरे सतावतिआ सेजरिया हे, हे ननदो भइया के जगा द’. भोजपुरी गीत के ई अदभुत संरचना बा.. ‘छलकल गगरिया मोर निर्मोहिया’ मुहम्मद खलील के गावल मशहूर गीतन में से एगो ह आ साँच इहे बा कि भोजपुरी के मिसरी जइसन मिठास मुहम्मद खलील का आवाज़ में घोरात उनुका गवनई में गूंजेले. भोलानाथ गहमरी के लिखल गीत, ‘कवने खोंतवा में लुकइलू आहि हो बालम चिरई’ में खलील ‘टीन-एज़’ के विरह को जवना ललक, सुरूर अउर सुकुमारता से बोवत लउकेले, जवन औचक सौंदर्य ऊ बना डारेले, ऊ एगो नया किसिम के नशा घोर देला. ‘मन में ढूंढलीं, तन में ढूंढलीं, ढूंढलीं बीच बज़ारे/हिया-हिया में पइठ के ढूंढलीं, ढूंढली विरह के मारे/ कवने सुगना पर लोभइलू, आहिहो बालम चिरई.’ गा के ऊ गहमरी जी के गीत के बहाने आकुलता का एगो नये रस परोस देले. एह रस के उनुका गावल, ‘खेतवा में नाचे अरहरिया संवरिया मोरे हो गइलैं गूलरी के फूल’ एगो दोसर गीतो में हेरल जा सकेला. ‘बलमा बहुते गवईया मैं का करूं/ झिर-झिर बहै पुरवइया मैं का करूं’ भा फेरु, ‘गंवई में लागल बा अगहन क मेला, खेतियै भइल भगवान, हो गोरी झुकि-झुकि काटेलीं धान’ जइसन दादरो में ऊ अलगे ध्वनि बो देले. पर लय उनुकर उहे मिठास वाली बा. मुहम्मद खलील के खूबी कहल जाव कि खामी, गायकी के त ऊ खूब सधले लेकिन बाज़ार साधल त दूर ओने झँकबो ना कइले आ दुनिया से कूच कर गइले. नतीजा सामने बा. मुहम्मद खलील के गावल गीत सुने खातिर तरसे के पड़ेला. भूले भटके, कबो-कभार कवनो आकाशवाणी केंद्र उनुका के बजा देला. पर अब आकाशवाणीओ भला के सुनत बा ?

सुनीले कि बहुत पहिले नौशाद मुहम्मद खलील के मुंबई ले गइल रहले, फ़िल्मन मे गवावे खातिर. लेकिन जल्दीये ऊ लवटि गइले काहे कि ऊ फिलिमन खातिर अपना गायकी में बदलाव खातिर तइयार ना भइले. कहले कि अइसे त भोजपुरी बरबाद हो जाई आ हमार गायकीओ. हम अपने बिला जायब बाकिर भोजपुरी के बरबाद ना करब. ठीक अपना गायकी का तरह, ‘प्रीत में न धोखा धडी, प्यार में न झांसा, प्रीत करीं अइसे जइसे कटहर क लासा !’ सचमुच अब ई कटहर क लासा जइसन प्रीत करे वाला गायक भोजपुरी का लगे नइखन रहि गइल. जइसे कुछ लोग अपना महतारिओ बहिन का कीमत पर तरक्की कबूल कर लेले, ठीक वइसही हमनी के भोजपुरी गायकों लोग अपना मातृभाषा के दाँव पर लगा दिहले बा बाजार का रथ पर सवार होखे खातिर. केहु कुछुवो कहो उनुका एह सब से कवनो सरोकार नइखे. उनकर सरोकार बस आ बस पइसा से बा. आपन महतारिओ बेच के उनुका सिर्फ पइसा आ शोहरत चाहीं. एकरा खातिर जवनो कुछ करे के पड़े ऊ त तइयार बाड़े. बाकिर मुहम्मद खलील अइसन ना कइले. हँ, अपवाद का तौर पर अबही एगो अउर गायक बाड़न – भरत शर्मा. एक से एक नायाब गीत उनुकरो खाता में दर्ज बा हालांकि मुहम्मद खलील वाला तासीर उनुका गायकी में नइखे बाकिर एगो चीज जे ऊ मुहम्मद खलील से सिखले बाड़न कि बाज़ार का रथ पर चढ़े खातिर अपना गायकी में समझौता करत अबहीं ले त नाहिए लउकत बाड़न. तारकेश्वर मिश्र के लिखल गीत,’हम के साडी चाही में” उनका गायकी के गमक में डूबल बहुते आसान बा, ‘चोरी करीहऽ, पपियो चाहे/ खींचऽ ठेला गाडी/ हम के साडी चाही’ भा फेर ‘गोरिया चांद के अंजोरिया नियर गोर बाडू हो/ तोहार जोर कौनो नइखै बेजोड बाडू हो’ मे उनका गायकी के अंजोर साफ पढल जा सकेला, निहारल जा सकेला आ अगर अबहियो कवनो सन्देह होखो त सुनीं, ‘धन गइल धनबाद कमाए/ कटलीं बडा कलेश/ अंगनवा लागेला परदेस.’ बाज़ार का घटाटोप धुंधो में भरत शर्मा अपना गायकी के बाज़ारूपन से बचवले बइठल बाड़न, एकरा ला उनुका के जतना सलाम कइल जाव, कम रही.

लेकिन बालेश्वर का साथे अइसन ना रहे. ऊ जब जियत रहले तबो आ अबहियो उनुका कैसेट आ सीडी से बाजार पटल पड़ल बा. बालेश्वर गायकीओ सधले आ बाज़ारो. आर्केस्ट्रा के बाज़ारो. नाहियो त डेढ सौ कैसेट बावे उनकर. ऊ हमेशा बुको रहत रहले. भोजपुरी के सरहद लाँघ के गावे वाला ऊ पहिलका भोजपुरी गायक रहले. भोजपुरी गायकी के अंतर्राष्ट्रीय पहिचान आ मंच बालेश्वरे दिअवले पहिले-पहिल. भोजपुरी में गावे वाला स्टारो हो सकेला ईहो बालेश्वरे बतवले. भोजपुरी गायकी के ऊ पहिला स्टार हउवन. गानो उनुका खाता में एक से एक नायाब बा. मुहम्मद खलील दोसरा के लिखल गावत रहले बाकिर बालेश्वर अपने लिखल गावसु जबकि ऊ कुछ खास पढल-लिखल ना रहले. बालेश्वर किहाँ प्रेमो बा, समाज आ राजनीतिओ. मतलब बाज़ार में रहे के सगरी टोटका. अउर हँ, ढेरहन समझौतो. नतीज़तन बालेश्वर त बहुते लोग के पाछा छोड़ट आपन सफलता के गाड़ी दउडा ले गइले पर भोजपुरी गायकी के समझौता एक्सप्रेस में बईठाइयो गइलन. अब ओकर जवन फसल सामने आ रहल बा ऊ भोजपुरी गायकी को लजवावत बा. बहरहाल एऋ बिना पर बालेश्वर को खारिज त नाहिये कइल जा सके. बालेश्वर के गायकी आ उनुकर आवाज के जादू आजुवो माथा चढ़ि के बोलेला. बालेश्वर असल में पहिले भिखारी ठाकुर आ कबीर के राह चलले. “बिकाई ए बाबू बी. ए. पास घोडा” जइसन गीत एकरे बुनियाद में बा. “दुशमन मिले सबेरे लेकिन मतलबी यार ना मिले/ मूरख मिले बलेस्सर पर पढा-लिखा गद्दार ना मिले” भा फेर “नाचे न नचावे केहू पैसा नचावेला” जइसन गीत उनका एही राह के आगे बढावत रहे. हँ, बालेश्वर किहाँ जवन प्रेम बा ओहमें मुहम्मद खलील वाला गहराई भा ‘ टिंच’ नदारद बा. ऊ ‘पन’ गायब बा. बल्कि कई बेर त ऊ प्रेम ‘शृंगार’ का आड में डबल मीनिगे डगर थाम लेत बा. जइसे उनुकर एगो गाना बा,’लागता जे फाटि जाई जवानी में झुल्ला/ आलू केला खइलीं त एतना मोटइलीं/ दिनवा में खा लेहलीं दू-दू रसगुल्ला!’ भा फेर ‘ खिलल कली से तू खेललऽ त लटकल अनरवा का होई/ कटहर क कोवा तू खइलू त हई मोटका मुअड़वा का होई.’ मुहम्मद खलील का गीतन में विरह वियोगो एगो सुख के अनुभूति देला लेकिन बालेश्वर किहाँ ऊ नइखे. उनुका लगे प्रेम में अनुभूति का जगह तंज आ तकरार बेसी बा. जइसे उनुकर कुछ युगल गीत बा, ‘हम कोइलरी चलि जाइब ए ललमुनिया क माई’ भा ‘अंखिया बता रही है लूटी कहीं गई है’ भा ‘ अपने त भइल पुजारी ए राजा, हमार कजरा के निहारी ए राजा’ भा फेर “आव चलीं ए धनिया ददरी क मेला.’ एक समय ददरी के मेला ले के ‘हमार बलिया बीचे बलमा हेराइल सजनी” गा के बालेश्वर ओह औरत के व्यथा बचले रहले जवन मेला में पति से बिछड जात बा. आ ओहू में जब ऊ टेक ले-ले के गावसु, ‘धई-धई रोईं चरनियां” त गाना के भाव दुगुना हो जात रहे. आ जब जोडसु, ‘लिख के कहें बलेस्सर देख नयन भरि आइल सजनी !’ त सचमुच सभकर नयन भर जात रहे. एगो गाना ऊ अउरी गावत रहले शादी में जयमाल का मौका पर, ‘केकरे गले में डारूं हार सिया बऊरहिया बनि के.’ कई बेर त हम देखनी कि कनिया सचमुच भरम में पड़ जा सँ, असमंजस में आ जा सँ. त ई बालेश्वर के गायकी के प्रताप रहल. लेकिन ऊ जल्दीये ‘नीक लागे टिकुलिया गोरखपुर क’ पर आ गइलन. आ फेर “जब से लइकी लोग साइकिल चलावे लगलीं तब से लइकन क रफ़्तार कम हो गइल’ भा ‘चुनरी में लागऽताटे हवा, बलम बेलबाटम सिया द’ जइसन गीतो उनुका खाता में दर्ज बा. ‘फगुनवा में रंग रसे-रसे बरसे’ ‘ सेज लगौला, सेजिया बिछौला हम के तकिया बिना तरसवला, बलमुआ तोंहरा से राजी ना/ बाग लगौला, बगैचा लगौला, हम के नेबुआ बिना तरसवला, बलमुआ तोंहरा से राजी ना !’ जइसन कोमल गीतो बालेश्वर गवले. लेकिन बाद में उनसे अइसन गीत बिसरे लागल आ कहरवा जइसन धुन के ऊ पंजाबी गानन का तर्ज़ पर फास्ट म्यूजिक में रंग दिहले. बाज़ार उनका पर हावी हो गइल. ‘बाबू क मुंह जैसे फ़ैज़ाबादी बंडा, दहेज में मा

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