– दयानंद पांडेय

स्वर्गीय बालेश्वर: स्मृति-शेष : सुधि बिसरवले बा हमार पिया निरमोहिया बनि के : अवधी का धरती पर भोजपुरी में झंडा गाड़ गइल ई लोक गायक : जइसे जाड़ा चुभत बा देह में वइसहीं मन में चुभत बा आजु बालेश्वर के गइल. एहूसे कि ऊ बिलकुल हमरा आँखिन का सोझे आँखि मूंद लिहले. बताईं का कि हम उनुका के जियत रहीं, जियत बानी, आ शायद जियतो रहब.

सूतत जागत हमनी के बात होते रहत रहे. हँसी मजाक होत रहे. गाना बजान होत रहे. ऊ त हमरा देह में, हमरा मन में गावते बाड़न. पता ना कतना लोग के भावना के ऊ आवाज दिहले, तेवर आ ताव दिहले. हम अमूमन सबेरे देर ले सूतेनी. फेर आजु त अतवार रहे. सूतले रहीं कि बालेश्वर जी के सबसे छोटका बेटा मिथिलेश के फोन आइल. आवाज में घबराहट रहे. ऊ बतवलसि कि बाबूजी के अस्पताल ले आइल बानी जा. हम पूछनी कि, भइल का बा ? कहलसि , बोन नइखन पावत. हम अपनहु घबरा गइनी. अस्पताल जाये के तइयारे होत रहीं कि उनका दुसरका बेटा अवधेशो के फोन आ गइल. हम कहनी कि, बस चहुँपते बानी. जल्दी से चहुँपबो कइनी.

जइसहीं उनका लगे गइनी चिन्ह लिहलन. हम हाथ जोड़नी आ भरोसा दिहनी, घबराईं जन, ठीक हो जायब. ऊ जइसे हमेशा धधा के मिलत रहले, आँखिन में चमक आ जात रहे, रोआं-रोआं फड़क उठत रहे, आजुवो भइल बाकिर लेटले लेटल. आँखे आँख में. ऊ जइसे हुटुक के रह गइलन. निःशब्द हो गइलन. बाकिर बहुत कुछ कहत.उनका आंखिन में अबइहों एगो आस रहुवे, जीवन जिये के. उनुकर ई तकलिफ हमरा से देखल ना गइल आ हम रो पड़नी. ऊ आँखेआँख से हमरा के सन्तोख दिहलन. हमरा लागल अबहि जीवन चली.

उनकर लरिका हमरा के इशारा कइलसि कि डॉक्टरन का तरफ ध्यान दीं. तुरते फुरत डाक्टर के इन्तजाम करवनी, छूट्टी का बावजूद सीनियर डाक्टर आइयो गइलन. खून के जांच भइल. ब्लड शुगर 314 रहे. बाकिर ई.सी.जी. आ बी.पी. ठीक रहे. निमन लागल. बाकिर ढेर देर ले अइसन ना रहल. थोड़ देर बाद खून के जाँच फेर भइल. शुगर अउरी बढ़ गइल रहे. दू-तीन डॉक्टर अउरी अइलें. बालेश्वर के नामे बहुत रहे. सभ डॉक्टर उनका मिजाजपुर्सी में लाग गइलन. बाकिर पल्स गुम होखे लागल रहे. आक्सीजन लागल. इंजेक्शन पर इंजेक्शन. ई.सी. जी. फेर भइल.

पल्स त गायब होते रहे, दिलो डरावे लागल. सीना पर कार्डियक मसाज शुरु हो गइल. जाने कवन कवन दवाई. तिबारा जांच में शुगर 650 हो गइल. फेर 700 आ डॉक्टरन का साथ-साथ हमनियो के चेहरा एह सर्दी में अउरी सुन्न होखे लागल. सभका चेहरा पर हवाई उड़त रहे. एक दोसरा के संतोख देत. भीड़ बढ़ल जात रहे. अचानक एगो डॉक्टर आपन हाथ उपर खड़ा कर दिहलसि आ हाथ जोड़ के बालेश्वर जी के प्रणाम करत वार्ड से निकल गइल. दिन के साढ़े ग्यारह बजत रहे. घरवालन के रोवल-धोवलो शुरु हो गइल. भोजपुरी के आन-मान आ शान हमनी से विदा ले लिहगलसि. हम सभ अवश रहनी जा समय का सोझा. काल के क्रूर पंजा अवधी का धरती पर भोजपुरी के झंडा गाड़ेवाला के, दुनिया भर में भोजपुरी के झंडा फहरावे वाला के दबोच चुकल रहुवे.

करीब पचीस साल से हमार आ बालेश्वर के दोस्ती रहल. हमनी का एक दोसरा के दोस्तो रहीं जा आ दुश्मनो. ठीक उनकरे गाना में कहीं त, ‘दुश्मन मिले सबेरे लेकिन मतलबी यार न मिले’. हम दुनु का बीचे साचहू कवनो मतलब ना रहुवे. एगो पुल रहुवे जवना पर भोजपुरी के संधि होत रहे. हमनी दुनु भोजपुरी के जियत रहीं. अगर कवनो स्वार्थ रहलो रहे त सिर्फ भोजपुरी के. एक समय रहे जब हमहू दारूलशफा में रहत रहीं आ बालेश्वरो. तब हमनी के सबेरे साँझ के मुलाक़ात रहुवे. सबेरे लड़िकन के स्कूल छोड़ के आईं त बालेश्वर के गरम जलेबी खा के घरे लवटीं. साँझ के दफ्तर से लवटीं त बालेश्वर के संगीत महफिल में बइठ जाईं. कलाकारन का साथे उनकर रिहर्सल देख आ बतकही में सगरी थकान डूब जात रहे.

हाल-फिलहाल त भोजपुरी बाजार में हाहाकार मचवले बा. बाकिर एक समय हम भोजपुरी के समस्या उकेरे ला कि कइसे त भोजपुरी मरत जात बिया आ सतही होत जा रहल बिया, उनका स्वर्गीय बालेश्वरजीवन के आधार बना के एगो उपन्यास लिखले रहीं, ‘लोक कवि अब गाते नहीं’, जवना में उनुका जीवन के कुछ स्याह-सफेद प्रसंगो रहे. कुछ ‘शुभचिंतकों’ कान भर दिहले. उनकरो आ हमरो. बालेश्वर के कुछ बेसिये ऐतराज हो गइल बाकिर हमरा खिलाफ कबो कुछ कहलन ना. केहु कुछ कहबो करे त कहसु, ‘जाये दीं दोस्त हउवें’. बावजूद एह सबके हमनी का बीच कुछ दिन ले संवादहीनता बनल रहल. एक दिन अचानके ऊ सबेरे सबेरे हमरा घरे अइलन आ कहे लगलन, ‘माफ करीं पांडेय जी, गलती हो गइल. अपने तो हमरा के अमर कर दिहनी.’ ठठा के हंसले आ अँकवारी बान्ह लिहले. फेर त जाने कतना ताना आइल, गाना आइल बाकिर हमनी का एने से ओने ना भइनी.

बालेश्वर वास्तव में कवि रहलन. हालांकि ऊ अपना गाना के लिखल ना, बनावल कहत रहलें. आपन गावल सगरी गाना उहे लिखले. चाहे ऊ जवना मूड के रहो. एक बेर हम उनका से पूछबो कइनी, ‘आप कवि सम्मेलनन में काहे ना जाईं ?’ उनकर जवाब एकदम सपाट रहे, ‘फ्लाप हो जायब’ आ हंस पड़ले. हम पूछनी, ‘अगर आप गायक न होखतीं त का होखतीं ?’ कहले, ‘कहीं मजूरी करतीं’. आ जइसे जोड़लम, ‘अउर जे थोड़ पढ़ लिख गइल होतीं त उच्च कोटि के साहित्यकार होखतीं.’ कह के ऊ फेर फिस्स से हंस पड़लन. दरअसल बालेश्वर के अपना बारे में कवनो गुमान रहले ना रहे. ऊ अतना बड़ गायक रहलें, भोजपुरी दुनिया उनका के पूजत रहे बाकिर ऊ अपना के मजूरे मानत रहलें. कहसु, ‘लोग ईंट गारा के मजूरी करेला, हम गाना के मजूरी करीलें’. शायद इहे सच रहे.

‘तोहरे बरफी ले मीठ मोर लबाही मितवा’ गावत-गावत ऊ लखनऊ आ गइलें. अवधी का धरती पर भोजपुरी गावे. बहुत संघर्ष कइलन, बहुत दुत्कारल गइलन, अपमान सहलन आ फेर मानो सम्मान चिखलन कि आज लखनऊ में अवधी नाहीं भोजपुरी के बात होखे लागल बा. ऊ खुदे कहसु कि बताईं, ‘अवधी में जो तुलसी दास, रसखान, अउर जायसी न होखते त अवधी के का होखित !’

दरअसल भिखारी ठाकुर का बाद अगर भोजपुरी के केहू आधारबिंदु दिहल, जमीन अउर बाजार दिहल त ऊ बालेशवरे हउवन दोसर केहू ना. एक समय रहे कि बालेश्वर के कैसेटन से बाज़ार भरल पड़ल रहत रहे. काहे कि ऊ गायकीओ के साधत रहलें आ बाजारो के. कैसेट आ आरकेस्ट्रा दुनु में उनकर धूम रहे. ई अस्सी आ नब्बे के दशक के बात ह. ऊ भोजपुरी के सरहदें लांघ मुंबई, बंगाल, आसाम, आ नागालैंड जाये लगलन. हालैंड, सूरीनाम, त्रिनिडाड, फिजी, थाईलैंड, मारीशस आ जाने कहां-कहां जाये लगले. बालेश्वर का लगे प्रेमो बा, समाजो बा, आ राजनीतिओ. माने कि कामयाबी के सारा गुन! बालेश्वर कई बेर कवनो समस्या उठा के अपना गीतन से प्रहार करेलें आ बहुते सरलता से त लोग वाह वाह कर बइठेला. उनुका कहला में जवन सादगी होत रहे आ गायकी में जवन मिठास होत रहे, उहे लोग के बान्ह देव.

‘हम कोइलरी चलि जाइब ए ललमुनिया क माई!’ गीत में बेरोजगारी आ प्रेम के जवन द्वंद्व बा, ऊ अदभुत बा. ‘बिकाई ए बाबू बी. ए. पास घोड़ा’ आ ‘बाबू क मुंह जैसे फैजाबादी बंडा / दहेज में मांगै लैं हीरोहोंडा’ भा ‘जबसे लइकी लोग साइकिल चलावे लगलीं तब से लइकन क रफ्तार कम हो गइल’ जइसन गीत उनका के लोकप्रियो बनावत रहे आ सुने वाला के मोहियो लेत रहे. ‘नीक लागे टिकुलिया गोरखपुर क’ आ ‘मेला बीच बलमा बिलाइल सजनी’ जइसन रिकार्ड जब एच. एम. वी. साल 1979 में जारी कइलसि त बालेश्वर की धूम मच गइल. फेर त ‘चुनरी में लागता हवा, बलम बेलबाटम सिया द’ जइसन गीत का साथ ऊ समय का साथ हो लिहलन. ऊ रहले, बाजार रहे, सफलता रहे, शोहरत रहे. बाकिर बाद का दिन में जब लोग हाईटेक भइल, बालेश्वर ना हो पवले. ऊ बाजार से बिछला गइले.

ई उनका बेसी पढ़ल लिखल ना होखे के दंश रहे. बाजार के ऊ लाख साधे के कोशिश करसु, बाजार उनका से फिसलते जाव. यश भारती ऊ पा चुकल रहलें आ एकरा जुनून में ऊ गा चुकल रहले, ‘शाहजहां ने मोहब्बत की तो ताजमहल बनवा दिया / कांशीराम ने मोहब्बत की तो मायावती को मुख्यमंत्री बनवा दिया!’ राजनीतिक स्थिति बदल गइल रहे. एकरा खातिर उनका अपमानो झेले के पड़ल आ सरकारी आयोजनन से बहर हो गइलन. तबहियो ऊ भूलइले ना, ‘दुश्मन मिलै सबेरे लेकिन मतलबी यार न मिले / हिटलरशाही मिले मगर मिली-जुली सरकार न मिले / मरदा एक ही मिलै हिजड़ा कई हजार न मिलै’. ऊ त गावत रहले, ‘लागता जे फाटि जाई जवानी में झूल्ला’, ‘अंखिया बता रही हैं लूटी कहीं गई है’, ‘अपने त भइल पुजारी ए राजा, हमार कजरा के निहारी ए राजा’. ऊ गावत रहले, ‘आवा चलीं ए धनिया ददरी क मेला’ आ कि ‘फगुनवां में रंग रसे-रसे बरसै /उहो भींजि गइलीं जे निकरै न घर से’. शादी-ब्याह में जयमाल में अकसर ऊ एगो गीत गावसु, ‘केकरे गले में डारूं हार, सिया बउरहिया बनि के’ त लोग त झूम जाव बाकिर दुलहिनिया अचकचा जा सन कि, किसके गले में हार डालूं. त ई देखले बनत रहे.

जइसे कवनो नरम आ मीठि ऊंख होखो. एक गुल्ला छीलीं त पोर-पोर खुल जाव. कुछ वइसने मीठ, नरम आ फोफर आवाज रहे बालेश्वर के. आपन गमक, माटी के महक, आ एगो खास ठसक लिहले. भोजपुरी गायकी में एक समय शिखर पर आसीन रहल बालेश्वर के गायकी-यात्रा बहुत सुविचारित ना रहल. उनकर केहू गुरूओ ना रहे. एक बेर पूछले रही, ‘राउर गुरू के ?’ छूटते ऊ बोललें, ‘केहू ना.’

‘तो सिखनी कइसे ?’

‘बस गावते-गावत.’

‘आ चेला ?’

‘चेला केहू के मानबे ना करीं. फेर हमार गाना बहुते लोग गावेला.’

‘फिरकापरस्ती वाली बस्ती बसाई न जाएगी / मंदिर बनी लेकिन मस्जिद गिराई न जाएगी / आडवानी वाली भाषा पढ़ाई न जाएगीं’ जइसन तल्ख गीत लिखे आ गावेवाला बालेश्वर गायकी के सफर शुरु कइलन नकल कर-कर के. ऊ कहसु, ‘गांव में शादी-ब्याह में, रामलीला, नौटंकी में गाना सुन के हमहू गावल शुरू कर दिहनी.’

‘कवना कलाकारन के ?’

‘भोजपुरी लोकगायकन के. जइसे वलीवुल्लाह रहले, जयश्री यादव रहले. हम ना सिर्फ इनकर नकल कइनी, बलुक कोशिशो कइनी कि इनका टीम में आ जाईं. बाकिर ई लोग हमरा के अपना टीम में लिहल ना. हमहू हिम्मत ना हरली. गांव जवार के मंचन पर चंग बजा-बजा के अकेलही गावल शुरू कइनी. पइसा किछुओ ना मिलत रहे. खाली वाह-वाही भेंटाव.’ ऊ बतावसु कि गांवे का घटना पर गाना बनाईं आ गाईं त लोग खिसिया जाव, पिटाइओ हो जात रहे.’ फेर जइसे जोड़सु, ‘बाकिर हम गाना बनावल आ गावल छोड़नी ना. पैदाइशी गांव बदनपुर भले छोड़ दिहनी आ चचाईपार में आ के बस गइनी.’ 1962 के चुनाव में पूर्व विधायक आ स्वतंत्रता सेनानी विष्णु देव गुप्ता सोशलिस्ट पार्टी के चुनाव प्रचार खातिर दोहरी घाट भेज दिहलन. ओहिजे गाना बना-बना के गावे लगलन. कम्युनिस्ट पार्टी के झारखंडे राय के नजर उनका पर पड़ल त अपना साथे घोसी ले गइलन अपना चुनाव प्रचार में. झारखंडे राय जब जीत गइलन त बालेश्वरो के लखनऊ ले अइलन. अब लखनउ रहे आ बालेश्वर आ उनकर भोजपुरी गाना. केहू सुने के तइयार ना. भटकाव सामने रहे. मिट्टी-गारा के मजदूरी शुरू कइलें. 1965 में आकाशवाणी लखनऊ में गावे के आडिशन दिहले. फेल हो गइले. लगातार फेल होत गइलन. परेशानी बढ़त गइल.

सूचना विभाग में एगो के. बी. चंद्रा रहले. ऊ आकाशवाणी के इम्तहान पास करे के गुन बतवले. दस साल बाद 1975 में बालेश्वर आकाशवाणी के इम्तहान पास कर गइलन. आकाशवाणी पर उनकर बुलंद आवाज जब छा गइल त बहुते लोग मौका देबे खातिर तइयार हो गइल. हरवंश जायसवाल मिलले. चार साल तक सरकारी कार्यक्रमन में उनका से गवइले. एच. एम. वी. के मैनेजर जहीर अहमद मिलले 1978 में. 1979 में एच. एम. वी. बालेश्वर के दू गो रिकार्ड जारी कइलसि, ‘नीक लागे टिकुलिया गोरखपुर क’ आ ‘बलिया बीचे बलमा हेराई सजनी’. 1982 आवत-आवत बालेश्वर छा गइले आ फेर कबो पाछा मुड़ के ना देखलें. बहुते लोग फिल्मी गाना के पैरोडी गावेला बाकिर बालेश्वर वइसन गायकन में शुमार बाड़े जिनका गाना के पैरोडी फिल्मन में चलेला. । सबसे पहले सुजीत कुमार अपना फिल्मन में उनकर गाना लिहले. एके ना तीन-तीन. आ बालेश्वर के क्रेडिटो ना दिहलन. बाकिर बालेश्वर उनुका से नाराज ना भइले, ना उनका से कुछ कहले.

भोजपुरी के ‘विकासे’ से ऊ खुश रहले. फेर त उनकर बीसियो गाना फिल्मन में चल गइल. हम कबो टोकीं कि, ‘कुछ ऐतराज करीं ना!’ ऊ कहसु, ‘जाये दीं.भोजपुरी के विकास हो रहल बा, लोग खा कमा रहल बा.’ कई बेर ऊ बुदबुदासु, ‘समय बड़ा बलवान होला. हमरो ले निमन निमन गावे वाला पड़ल बाड़े. बाकिर उनुका के केहु जाने ना. हमरा के त लोग जान गइल बा.’ ऊ अपना मकान के पक्का फर्श देखावसु. बोलसु, ‘पक्का में रहत बानी अउरी का चाहीं?’ आ गावे लागसु, ‘कजरवा हे धनिया!’ फेरु जइसे जोड़सु, ‘नाचे न नचावे केहू, पैसा नचावेला!’ गावे लागसु, ‘मोर पिया एम.पी., एम. एल. ए. से बड़का / दिल्ली लखनउवा में ओही क डंका / अरे वोट में बदलि देला वोटर क बक्सा!’ अचानके ऊ जोश में आ जासु त ‘रई-रई-रई-रई-रई’ कर के गावे लागसु, ‘समधिनिया क पेट जैसे इंडिया क गेट…. / समधिनिया क बेलना झूठ बोलेला.’

एक समय उनकर एगो कैसेट आइल रहे, ‘बलेसरा काहे बिकाला.’ अब के बिकाई आ के बेची ! के गायकी के रस के ऊ नशा, उनकर कहरवा धुन में पगल उनकर गीत, उनकर गायकी के ऊ मिठास, ऊंख जइसन मिठास, ऊ फोफर आवाज. आकाश में धरती पर गांवन का मेड़न पर मद्धिम रोशनी वाला मटियारा घरन में, मेहनतकश आ मजूरन के घरन में के गाई!

फिलहाल त हम उनुका के उनुकरे एगो भोजपुरी निरगुने में हेरत बानी, ‘सुधि बिसरवले बा हमार पिया निरमोहिया बनि के!’ आ ‘तोहरे बरफी ले मीठ मोर लबाही मितवा!’ में जोहत बानी. हेरते-जोहत उनुका के शत-शत प्रणाम कहत बानी.



दयानंद पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार, लखनऊ

संपर्क सूत्र
5/7, डाली बाग, आफिसर्स कॉलोनी, लखनऊ.
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टिप्पणी

बालेश्वर उर्फ बलेसर जी के निधन के समाचार ना सिर्फ बहुते दुखद आ असहनीय बा, हैरानो करे वाला बा. दयानंद के धन्यवाद कि उनका निधन के समाचार मिल सकल. मीडिया में एह राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के लोक गायक के निधन के समाचार के महत्व ना मिल पावल दुर्भाग्यपूर्ण बा. बाकिर आजु के मीडिया के प्राथमिकता देखत अचरज तनिको नइखे. बालेश्वर जी के हवाले भाई दयानंद ने पिताजी, स्वतंत्रता सेनानी अउर पूर्व विधायक स्व. विष्णुदेव का जिक्रो कइले बाड़न.

बालेश्वर जी को हम पिछले साढ़े तीन दशक भा कहीं कि बचपने से जानत बानी. ऊ सिर्फ लोक गायके ना, बलुक एगो जागरूक सामाजिक आ राजनीतिक कार्यकर्तो रहले. हमरा १९६२ के चुनाव के त याद नइखे बाकिर १९६७ आ ओकरा बाद के विधानसभाई आ लोकसभाई चुनावन के याद बा. १९८० तकले पूर्वी उत्तर प्रदेश सोशलिस्ट (माफ करीं, आजु के समाजवादी ना) आ कम्युनिस्ट आंदोलन के गढ रहुवे. बालेश्वर जी के आ हमार जिला (तब आजमगढ अब मऊ), विधानसभा (नत्थूपुर) आ लोकसभा (घोसी) क्षेत्र एके रहुवे. एक दू गो अपवाद छोड दीं त नत्थूपुर से सोशलिस्ट भा प्रजा सोशलिस्ट पार्टीए के उम्मीदवार चुनाव जीतस, से घोसी लोकसभा आ विधानसभा क्षेत्रन के लेनिनग्राद कहल जात रहे जवना के प्रतिनिधित्व लमहर दिन ले जयबहादुर सिंह-झारखंडे राय करत रहले.

१९६७ के चुनाव में नत्थूपुर के अनुसूचित जाति ला आरक्षित कर दिहल गइल. नतीजतन पिताजी के सोशलिस्ट पार्टी के नेतृत्व का निर्देश पर कम्युनिस्टन के गढ घोसी से विधानसभा के चुनाव लडे पडल. लोकसभा ला कल्पनाथ राय सोपा के उम्मीदवार रहले. ओह घरी ले बालेश्वर ना सिर्फ एगो बढ़िया लोक गायक (बिरहा) बलुक कम्युनिस्ट कार्यकर्तो बन चुकल रहले. एक तरह से देखीं त हमनी का एक दूसरा के विरोधी खेमा में रहनी जा. सोपा खातिर एगो दोसर आ बहुते लोकप्रिय लोकगायक रक्षा यादव आ गोमती यादव राजनीतिक गीत गावसु. सिर्फ चुनावे का समय ना बलुक दोसरो मौका-सभा प्रदर्शनो में बालेश्वर कम्युनिस्ट पार्टी आ गोमती सोशलिस्ट पार्टी के मंच पर चंग बजावत राजनीतिक गीत गावत भेंटास. एही तरह चौधरी चरण सिंह के भारतीय क्रांति दल, बाद में लोकदल खातिर जयश्री यादव आ श्रवण कुमार राजनीतिक गीत गावत रहले. ऊ समय कारपोरेट राजनीति के ना रहे. चंग अउर खंझडी बजाके गावे वाला समर्पित राजनीतिक कार्यकर्तन के तब बड महत्वपूर्ण भूमिका होत रहुवे. आज जब लोकसभा-विधानसभा के बात त छोडिये दीं ग्रामसभा का चुनाव तक में लाखों रुपिया खर्च हो रहल बा, केहू यकीन कर सकेला का कि गोरखपुर के बांसगांव से सोशलिस्ट पार्टी के मोलहू प्रसाद जइसन लोग खंझडी बजाके गावत बजावत लोकसभा में पहुंच गइल रहले. हमार पितोजी २५-३० हजार रु. खर्च करके साल १९८५ में विधानसभा चुनाव जीत गइल रहलें. इहे बाति बाबू जयबहादुर सिंह, झारखंडे राय, अउर सरजू पांडे जइसन कम्युनिस्ट नेतो लोग का बारे में कहल जा सकेला. इनकरा जीत में बालेश्वर आ गोमती यादव जइसन लोकगायकन के भूमिका बेहद खास होत रहुवे. १९६७ के चुनाव में भा ई कहीं कि ओकरा से कुछ पहिलही से ही बालेश्वर जी आ हमनी का, जे अलग अलग राजनीतिक खेमा में बंटइनी जा त फेरु १९८० में एक साथे हो पइनी जा आ उहो लोकसभा के चुनाव में जब (जनता पार्टी एस) लोकदल आ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का बीचे चुनावी तालमेल रहे. बाकिर ऊ तालमेल क्षणिक रहल. भाकपा के लोग विधानसभा चुनाव में तालमेल तोड दिहल. एह सबके बावजूद बालेश्वर जी का साथे हमार पारिवारिक संबंध लगातार बनल रहल. बाद के बरिसन में बालेश्वर जी के भाकपा से मोहभंग भइल आ ऊ कल्पनाथ राय का साथे कांग्रेसीओ मंच पर लउके लागल रहले. लेकिन तबले उनकर लोक गीत आकाशवाणी, दूरदर्शन अउर देश विदेश के कार्यक्रम समारोहनो में धूम मचावल शुरू कर दिहले रहुवे. उनका गानों के कैसेटो बाजार में आवे आ धूम मचावे लागल रहे. उहाँ का बदनपुरा के आपन पुश्तैनी घर छोड मधुबन-मझवारा रोड पर चचाईपार का पास आपन मकान “बिरहा भवन” बनवा लिहले रहले. हालांकि उनकर अधिकतर समय लखनऊवे में बीतता रहे. सही मायने में तबहिये से बलेसर के बजाय बालेश्वर कहलाए लगलन. हालांकि ओह दौर में बाजारो उनका के प्रभावित कइलसि आ अपना सामाजिक-राजनीतिक प्रतिबद्धता से इतर ऊ भोजपुरी के बाजारू आ कई बेर तो “वल्गर” तक कहल जाये वाला गीत गावे लागल रहले. लेकिन जइसन कि दयानंद ठीके लिखले बाड़न कि बालेश्वर बाजार के आधुनिकता आ अनिवार्यता का दौड में बहुत आगे तक ना दौड सकले. लेकिन जवना तरह के मौत उनका मिलल ओकरो हकदार ऊ कतई ना रहले. अइसन समय में जब भोजपुरी के बहुते विकास हो रहल बा, देश-विदेश में एकर मांगो बढ रहल बा, राज्यन में एकरा विकास के नाम पर अकादमी बने लागल बाड़ी सँ, सिनेमो जगत में भोजपुरी फिल्म अब महज घाटा के सौदा नइखे रहि गइल, अइसना समय में मीडिया जवना तरह बालेश्वर के निधन के समाचार के अनदेखी कइलसि ऊ बालेश्वरे के ना पूरा भोजपुरी समाज के अनदेखी अउर अवमानना बा. अपना नायक आ कवि गायकन के कवना तरह याद कइल जाव, ई तय करे के जिम्मेदारी संबद्ध समाजों के बा. एही शब्दना का साथे भाई बालेश्वर के अश्रुपूरित श्रद्धांजलि एह उम्मीद का साथ कि उनका शुरुआती दिनन के संघर्ष गाथा आ गायकी

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