आजु से पचास साल पहिले जब १६ फरवरी १९६१ पटना के शहीद स्मारक पर भोजपुरी के पहिलका फिलिम “गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो” के मुहुर्त भइल रहे आ अगिला दिने १७ फरवरी के एह फिल्म के शूटिंग शुरु भइल रहे तब केहू के अंदाज ना रहे कि भोजपुरी सिनेमा कहाँ से कहाँ के सफर पूरा कर ली. तब ओह फिलिम के बनावे वाला लोग का सोझा पइसा कमाये के सपना ना हो के भोजपुरी भाषा, संस्कृति, आ समाज के सेवा करे के रहे. भोजपुरी सिनेमा बनावे के सुझाव भारत के पहिलका राष्ट्रपति राजेन्द्र बाबू मुंबई के एगो समारोह में गाजीपुर के नासिर हुसेन के दिहले रहले. ओही समय का आसपास कबो आरा के विश्वनाथ शाहाबादीओ के ऊ भोजपुरी के प्रचार खातिर सिनेमा के सबले सशक्त माध्यम बतवले रहले जवना का बाद ऊ भोजपुरी फिल्म बनावे के तय कर लिहले रहले. नासिर हुसेन आ विश्वनाथ शाहाबादी मिलले त नासिर हुसेन के लिखल स्क्रिप्ट पर फिल्म बनावल तय भइल आ बनल भोजपुरी के पहिलका फिल्म “गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो”.

तब जवन नाम जुड़ल एह सिनेमा से ओहमें निर्देशक रहले कुंदन कुमार, गीत लिखले शैलेन्द्र, संगीत दिहले चित्रगुप्त, आ गायक गायिका में नाम रहे मोहम्मद रफी आ लता मंगेशकर जइसन नाम. अब एकर तुलना आजु के बने वाला कवनो फिलिम से जुड़ल नाम से कर लीं फरक अपने आप सामने आ जाई. भोजपुरी के उन्मुक्त भाषा आ संस्कृति माने वालन में शामिल होखला का बावजूद भोजपुरी के हर गीत आ फिलिम, भा कहीं त अधिकतर फिल्म भा गवनई, के हम समर्थन ना कर सकीं. हद त तब होला जब कवनो एगारह बारह साल के लड़िका से कुछ लोग, गीतकार संगीतकार निर्माता निर्देशक सभे शामिल बाड़े एहमें, अइसन अइसन गीत गवा देला जवना के सुन के हर आदमी के मूड़ी लाज से झूक जाई. वइसनके कुछ मानसिक बीमार लोगन का वजह से भोजपुरी के अच्छाई ओकर कैंसर बना दिहल गइल बा. भोजपुरी विरोधियन के हाथ में लाठी थमा दिहल गइल बा कि लऽ भोजपुरी कला, संस्कृति, सिनेमा पर जतना हमला करि सक करऽ. कबो कबो जाने अनजाने, चाहे अनचाहे एह भीड़ में भोजपुरी प्रेमिओ शामिल हो जालें आ अपने पर हमला करे लागेलन.

आजु जब हमनी का भोजपुरी सिनेमा के स्वर्ण जयन्ती मना रहल बानी जा, पता ना कतहीं, कवनो मंच पर एकर चर्चा होखी कि ना कि पइसा कमाये वालन से भोजपुरी के कइसे बचावल जाव आ भोजपुरी से पागलपन का हद तक लगाव राखे वाला, पैशनवाला, लोगन के कइसे बढ़ावल जाव ? हमरो लगे कुछ लेख आलेख चहुँपल बा जवन आत्मप्रशंसा बेसी बा भोजपुरी प्रशंसा कम. सब इहे बतावे में लागल बा कि हम भोजपुरी खातिर का कइनी, केहू ई नइखे बोलत कि ऊ भोजपुरी से कतना बनवलसि, अपने भाषा संस्कृति के बाजार में चढ़ा के कतना सुख उठवलसि. अधिकतर हम चुप रहीलें काहे कि सोचीले हर आदमी अपना तईं भोजपुरी के प्रचार प्रसार में लागल बा, देर सबेर जब भोजपुरी आगे बढ़ल शुरु करी त ई गंदा कचरा धीरे धीरे अपने पेनी में बइठ जाई. हर संस्था, हर आदमी, हर प्रयास के एहसे बड़ाई करत आइल बानी कि अबहीं भोजपुरी के संक्रान्ति काल चलत बा आ देर सबेर भोजपुरी आपन स्वाभाविक गरिमा पा के रही. बाकिर आज हमरा गोपाल दास नीरज के ऊ कविता याद आ रहल बा, “बदतमीजी कर रहे हैं आज फिर भँवरे चमन में, तुम नहीं अब भी उठे तो फिर जमाना क्या कहेगा ?”

भोजपुरी सिनेमा आ संगीत का दुनिया में अइसनके लोग बढ़ चलल बाड़े जिनका चलते ई उद्योग ना रहि के खोभाड़ हो गइल बा. कबो कबो टीवी पर भोजपुरी फिल्म देखे के मौका मिलियो जाले त ओकर भाषा, संवाद, गीत गवनई सुन के तुरते चैनल बदल दिहिले. कई साल से कवनो अइसन भोजपुरी फिलिम ना मिलल जवना के देख सुन के संतोष होखो कि चलऽ ई फिलिम भोजपुरी के सही तरीका से पेश कर रहल बा. बाकिर पेश करो त कइसे? निर्माता दोसरा भाषा के, निर्देशक दोसरा भाषा के, संवाद लिखे वाला शायद अपना गाँव जवार से बरीसन पहिले नाता तूड़ चुकल लागेले काहे कि उनुका ना त भोजपुरी लिखे आवेला, ना बोले. अइसनका में भोजपुरी सामने आवे त कइसे ? लाजे भवे बोलसु ना सवादे भसुर छोड़स ना. भोजपुरी वाले बोलत नइखन आ भोजपुरी से कमाई करे वाला निर्माता, निर्देशक, गीतकार, कहानीकार, संवादलेखक लोग ओकरा के छोड़े के तइयार नइखन. रउरा कहब कि हम अभिनेता, अभिनेत्री, गायक, गायिका के एह सूची में काहे नइखीं शामिल कइले त हमार जवाब ईहे बा कि ओह लोग का हाथ मे कुछ नइखे. ओह लोग के त उहे करे के बा जवन कहल जात बा, बतावल जात बा. फूहड़ गीत गावे वाला ओह बारह बरीस के लड़िका के का गरियाईं, गरियावे के त ओकरा के चाहीं जवन वइसन गीत लिखलस, जवन ओह गीत के निर्देशित कइलसि, आ जवन ओह गीत के अलबम रिलीज कइलसि.

आईं आजु तय कइल जाव कि भोजपुरी के चेहरा बनल एह फिलिमन आ म्यूजिक अलबम का पाछा छिपल चेहरा के उजागर कइल जाव. भोजपुरी के बाजारू माल बनावे वालन के विरोध कइल जाव. सावधानी अतने रहे कि एह क्रम में भोजपुरी के नुकसान मत हो जाव. कैंसर हटावे का चक्कर में मरीज के जान मति चलि जाव. रोग अचके में नइखे बढ़ल, ओकरा के अचके में खतमो ना कइल जा सके. आजु जब भोजपुरी सिनेमा के स्वर्ण जयन्ती का अवसर पर भोजपुरी के पहिलका फिल्म के गीतन के वीडियो अँजोरिया खातिर चुने बइठनी त देखनी कि भोजपुरी सिनेमा में आयटम सांग त पहिलके फिल्म से शुरु हो गइल रहे. आजु त ऊ अउरी वीभत्स भर हो गइल बा. अँजोरिया आ परिवार के दोसरा वेबसाइटन पर फिल्म आ संगीत के जानकारी देत घरी एही कारण शुरुवे से एगो सावधानी बरतल गइल. हर सामग्री का साथ ओकरा के भेजे वाला के नाम दिहल गइल आ एगो इशारा रहे प्रबुद्ध पाठकन के कि ई अँजोरिया के संपादकीय सामग्री ना हऽ एगो लेखक के विचार ह, फिल्म भा संगीत के प्रचार हऽ. दोसर इहो कि हम भोजपुरी सिनेमा के के कहो, कवनो फिल्म देखे के समय ना निकाल पाईं. मौका मिलेला त “थ्री इडियट्स” जइसन फिल्म जरुर देखे के कोशिश करीलें. थ्री इडियट का नाम पर एगो बात सामने आइल कि कतना लोग के मालूम बा कि आमिर खान नासिर हुसेन से जुड़ल परिवार के हउवन ! ताहिर हुसेन नासिर हुसेन के भाई रहले आ आमिर खान के पिता. अब आमिर खान जइसन लोग भोजपुरी सिनेमा में काहे नइखे ई सवाल ओह लोग से ना पूछ के अपने से पूछे के पड़ी. याद आवत बा डा॰ अशोक द्विवेदी के कविता के एगो अंश,

नीमन नीमन चीझु लेखा
नीमन लड़िकवो शहर चलि गइलन स
रहि गइलन स बुड़बक, भकोल
ना त टेढ़ुवा तिरछोल
बनि गइलन सऽ चट्टी के चंडाल
पोसुआ ठीकेदार, ना त गँवई मोख्तार.
केहू के केहू से बझा के,
उल्लू सीधा हो जाय, बस
सझुरावल त दूर, अउरी अझुरइहन स
बात सुनऽ एक लाख क
लज्जत दूइयो पइसा के ना !

– संपादक, अँजोरिया

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