Gayatri-Thakur-2भोजपुरी संगीत के एगो बहुत बड़ पुरोधा चलि गइल, बिसवास नइखे होत बाकिर ई साँच बा. रामायन शैली के अपना समय के सबसे बड़ आ स्थापित गायक ब्यास गायत्री ठाकुर अब नइखन.

ठाकुरजी खाली गायके ना रहीं बलुक आसु गीतकारो रहीं. रामायन,महाभारत आ पुरानन के कहानी त रउँवा जहें से पूछि लीं,जिभिए प रही,किताब देखला के जरूरत ना परी.जइसे उहाँका साधि लेले होखीं. उहाँ का गइला से खाली संगीते के ना बलुक साहित्य आ संस्कृतियो के एगो कोना अधूरा रहि गइल. शैली लोकगीत के, बाकिर सामग्री भारतीय संस्कृति के. आजु कतने लोग अश्लीलता का खिलाफ झंडा लेके चल रहल बा आ मीडिया में बनल रहे खातिर ओकरा के एगो नीमन मुद्दा बना लेले बा, बाकिर गायत्री ठाकुर जी अंत तक अपना संस्कृति के रक्षा खातिर उतजोग करत रहि गइलीं आ भोजपुरी संगीत के प्रचार-प्रसार का सङही ओकर सुरक्षो करत रहलीं.

केहू जब ठाकुरजी के परिचय दिहल चाही त मुहाबरा बनि गइल उहाँ के एगो सबसे पुरान आ सबसे प्रसिद्ध भजन के जिक्र जरूर करी आ तब अपने आप उहाँ के स्मरन हो आई-
गावेले दास गइतिरी, खींच के तीन गो चिचिरी
करुनानिधान रउँआ,जगत के दाता हईं.
के बा समान रउँआ,जगत के दाता हईं.

गायकी से उहाँ के कतना लगाव रहे, अतने से जानल जा सकता कि फेफड़ा के आपरेशन भइला का बादो जब उहाँ पर संगीत के रंग चढ़ि जाई त केहू के रोकले रुकेवाला ना रहीं.बिहार के बक्सर (पुरनका आरा) जिला में जनमल भोजपुरी के ई सपूत सत्तर बरिस का उमिरि में चार मार्च के हमनी से बिदा हो गइल हमेशा हमेशा खातिर. हम लोर भरल अँखियन से श्रद्धांजलि देत ईहे कहबि कि कुछ दिन अउर ठहर गइल रहितीं.अतना जल्दी काहें कइलीं, हम कई बरिस से रउरा ले मिलेके चाहत रहलीं.

-रामरक्षा मिश्र विमल

 

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