भोजपुरी के कहाँ ले जात बा महुआ ?

Prabhakar Pandey

– प्रभाकर पाण्डेय “गोपालपुरिया”

रमेसर काका हँसुआ उठवले भिनसहरे गोहूँ काटे जात रहुअन. ओही बेरा हमहुँ महुआ बीने खातिर दउरी अउर डलिया उठवले निकलल रहुवीं. रमेसर काका के देखते हमरी मुहें से निकलि गउवे, “पाँव लागी काका, चउरी के खेत काटे जा तारS का ?”
“नीमने रहु बाबु, चउरी में के ना, महुआनी के खेत काटे जा तानी.”
रमेसर काका क एतना कहते हमहुँ झट से कहि देहुवीं, “ई त अच्छा बा. हमहुँ महुआ बीने महुआनिए में जातानी.”
रमेसर काका आगे-आगे अउर हम उनका पीछे-पीछे चलत-चलत महुआनी में पहुँचि गइनी जा. महुआनी में पहुँचि के हम लगनी महुआ बीने अउर रमेसर काका अपनी खेते में जा के लगने गोहूँ काटे. रमेसर काका के खेत महुआनी क एकदम बगलिए में सटल बा.
पहिला बेर के चुवल कुल्हि महुआ बीनले क बाद हम सोंचनी कि कोनहवा महुअवा अबहिन एक-आध गो टिप-टाप चुवता तवलेक हम काँहे ना जा के रमेसर काका से एक बीरा सुर्ती ले-ले आईं. एकरी बाद हम डलिया-दउरी कोन्हवा पेड़े की नीचे छोड़ि के रमेसर काका क लगे उनकरी खेते में पहुँचि गइनीं. अबहिन हम कुछ कहहीं के रहनी तबलेकहीं रमेसर काका हमके देखते बोलि पड़ने, “बाबू! दड़वा पर कुरता धइले बानी. तनि ओमें से चुनौटी निकालि के सुरती ना बनावS.”
हम कहनी, “ठीक बा काका. दरअसल हम सुरतिए खातिर त अइनी हँ.” एकरी बाद हम रमेसर काका की कुरता में से चुनौटी निकालि के लगनी सुरती बनावे.
सुरती बनवले की बाद हम तनियेसा उहवें चढ़ा (गिरा) देहनी अउर ओकरी बाद रमेसर काका के देहनी अउर खुदे खइनी. सुरती खाते हम कहनी, “ए काका, इ सुरतिया त बहुते तेज बा.”
ए पर काका कहने, “अरे बाबू. इ सुरती हम देउरियाँ की सुरतीहट्टा से मँगवले रहनी हँ.”
एकरी बाद हम रमेसर काका से कहनी, “आजु महुआ बिनहुंवाला केहू ना आइल ह. कुल्हि महुआ हमरा अकेले बीने के परल ह अउर एतने ना अबहिन कोनहवा महुअवा चुवते बा.”
हमरी एतना कहते रमेसर काका कहने, “बाबू, महुओ के लीला अपरम्पार बा. पहिले क जबाना में महुए हम गरीबन के आहार रहे. महुआ कूटि के लट्टा बनावल जाव अउर गरीबी में ओही के खाइल जाव. एतने ना जब केहू रिस्तेदार आ जा, त हमरा इयादि बा, माई का करे की महुअरि बनावे अउर ओ रिस्तेदार के खिआवे. कबो-कबो एक-आध किलो महुआ बेंची के हम बाजारे से कुछ सामानो खरीदि के ले आईं. धीरे-धीरे जुग-जबाना बदलि गइल, आजु न केहू लट्टा खाता न महुअरि.”
काका की एतना कहते हम कहि बइठनि, “का हो काका, त का ओहू जबाना में लोग महुआ से सराबो बनावे? देखS न. चिल्लर भाई त रोजो मूँजहनिया में महुआ के सराब चुआवताने अउर गाँव-जवार के लोग सराब खातिर उनकी लगे चलि आवता.”
हमरी एतना कहले की बाद काका एगो लंबा साँस लेहने अउर कहने, “बाबू, ओहू जबाना में लोग महुआ के सराब चुआवे. हमरा इयादि बा कि कई गो चरवाह ई सराब पी के आपसे में गारी-गलउज, लाठी-लठउअल क लें सन. कई जाने के कपार फुटि जाव. पर कहल गइल बा कि हर चीज के बुरा अउर अच्छा दुनु पहलु होला. ई हमनीजान क ऊपर निर्भर बा कि ओके कवने रूप में ले तानीजाँ.”
काका के इ बाति सुनि के हम कहनी, “काका, हम तोहार बाति समझनी नाँ?”
ए पर काका कहने, “बाबू, हम तोहके बता दीं कि ए महुआ के सराब बहुत कामो के होला. घाव-ओव पर लगबले पर बहुत फायदा करेला. केतनो भीतर घाव होखो पर अगर तूँ महुआ के सराब ओह पर मलि द त घाव एकदम ठीक हो जाला.”
काका के इ बाति सुनला की बाद हम कहनी, “काका, तूँ महुआ देखे ल कि ना? अरे हम महुआ चैनल के बात करतानी.”
हमरी एतना कहते काका कहि पड़ने, “बाबू, महुआ देखल त आपन मजबूरी बा. अरे जब भोजपुरी क नाव पर इहे एगो चैनलवे बा त चाहें गलती देखावे चाहें सही, देखहीं के परी. पर ए चैनलवाला कुल के चाहीं कि जवने कुछ देखावें उ दवाईवाला महुआ होखे के चाहीं. मतलब भोजपुरिया संस्कार, संस्कृति, समाज से जुड़ल न कि टीआरपी बढ़वले क चक्कर में सराबियन वाला महुआ. अश्लीलता से सराबोर. अरे भाई ए महुआ के हिंदी चाहें अन्य भाषा क चैनलन के नकल कइले के ताक नइखे. अगर करबो करे त अपनी समाज, संस्कृति के धेयान में रखि के करे. भोजपुरी समाज, संस्कृति एतना समृद्ध अउर विविधता से सराबोर बा कि एपर लाखोंगो कार्यक्रम देखावल जा सकेला. अगर ए सब क ऊपर कवनो कार्यक्रम देखावल जाई त सबके ई अच्छो लागि अउर सब लोगन क नजर में भोजपुरी अउर भोजपुरिया के वास्तविक अउर सही संदेसो जाई. भोजपुरी अउरो समृद्ध होई.”
काका के इ बाति हमरो अच्छा लागल. हम सोंचनी कि महुआ के कईगो रूप बा. पर हमनी के महुआ क ओही रूप के अख्तियार करे के बा जवने से समाज, संस्कृति के हित होखे, अहित ना. महुआ के लट्टा, महुअरि की रूप में इस्तेमाल होखे के चाहीं न कि सराब बनवले क रूप में. खैर अगर सराबो बनता त उहो कम मात्रा में बने के चाहीं अउर ओकर उपयोग पी के केहू के गरिअवले में ना बलुक दवाई के रूप में दुख-दर्द दूर करे खातिर होखे के चाहीं.
भाई महुआ टीबी के कर्णधार लोग. इहाँ महुआ से महुआ के तुलना कइल गइल बा. अब रउआँ सब क ऊपर बा कि रउआँ सब अपनी महुआ के कवन रूप दे तानी जाँ अउर देकनिहारन क आगे कवन महुआ परोसऽतानी जाँ. उहे महुआँ परोसीं जवने से भोजपुरी, भोजपुरिया समाज, संस्कृति के भला होखो अउर हम इहो गारंटी दे तानी कि ए से महुआ के टीआरपी घटी ना बलुक अउर बढ़ि जाई.

-प्रभाकर पाण्डेय “गोपालपुरिया”


हिंदी अधिकारी
सीडैक, पुणे
ई-पत्र- prabhakargopalpuriya@gmail.com
मोबाइल- 09022127182/09892448922

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5 Comments

  1. DINESH CHANDRA GUPTA s/o SHRI BHRIGU PRASAD GUPTA , A/P- VIDYA BHAWAN NARAINPUR DIST- BALLIA UP - 277213
    May 13, 2011 at 7:06 pm

    ”bhojpuri JAN KE KALEJA H ”

  2. mahua t ago bhojipuria chainal ba bhojipuria samaj kaage bade k javan log bhojipuria janato rahele h aur jagah badalle se bollo bhulail jat rahale u ho lo bolle me na sankochat bane. kuldeepakpathak Deoria VALE BABA

  3. रतनलाल भाई,
    नमस्कार,
    बहुत खुशी भइल इ जानि की तूँ आई.आई.टी. में बाड़S…तूँ कवने डिपार्टमेंट में बाड़S…हम हर सनिवार के आई.आई.टी. बांबे में ही दिन में 10 से 4 ले रहेनी…कंप्यूटर साइंस डिपार्टमेंट में…एक्टेंसन ह..4706…..

    हम तोहरी फोन के इंतजार करबि….सादर आभार।।

  4. पाण्डेय जी उ महुआ ई महुआ ना ह .जवना में माट्टी के नशा होखे .भोजपुरी महुआ हिंदी के बोतल में पैक करके परोसल जाता .उ गंध ,उ महक सब गमकउआ सेंट में बदल गईल बा . बस !
    धन्यवाद!
    ओ.पी.अमृतांशु

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