आवऽ लवटि चलीं जा!

धारावाहिक उपन्यास -1

डा॰ अशोक द्विवेदी

आवऽ लवटि चलीं जा! (11)

अबले जवन पढ़ चुकल बानीं. अब आगा पढ़ीं......

सूरुज के ललाई धीरे-धीरे बदरन का धमाचौकड़ी में ओरात रहे. साँझ के धुंध धीरे धीरे जमीन पर उतरे शुरु क देले रहे. बीरा आपन खाकी कोट पहिन चुकल रहलन. पनवा चउकी पर थरिया धरत बोलल, "आराम से कुछ खा-पी के तब जइतऽ! दिन पर दिन शहरी बाबू भइल जात बाड़ऽ!" बीरा हँसि दिहलन, "भूखि रही तब न केहू खाई! पता ना एइजा हमरा के का हो गइल बा?"

"दूध-दही कुछऊ रहित त खाइल होइत. खाली रोटी आ आलूके तरकारी खात खात मन अँउजाइ गइल बा. एइजा गाँव लेखा लेहना पताई आ फरुहा कुदार त करे के नइखे. आदमी जब जाँगर चलावेला त भुखियो चाँप के लागेले." मुंह में हाली हाली कवर डालत बीरा सफाई दिहलन.

पनवा समझत रहे. असल बात त इ रहे कि सँझिये इनकर ड्यूटि चालू हो जाले. गेट पर ना रहसु आ कवनो बात हो जाव त नोकरियो जाई. तनी बेरा गिरा के इतमीनान से खइतन त एक दू रोटी बेसी खइतन, दूध दही कहाँ से आवे? दिन के ड्यूटी देबे वाला दरवान सँझही, माली का संगे संगे भागि जाला. जात जात बोलत जाई, "तनी देखिहऽ बीरा... हमरा बजारे जाए के बा." फुकवना इ कबो ना सोचे कि बीरो के पलिवार बा, इनहूँ के बजार हाट जाए के परेला. इनकर बजार त दुपहरिये में होला. अतना दिन में कब्बो जो इनका सगे बजार घूमे के मोका मिलल होखे. पनवा उनकर हाली हाली कवर उठावत देखत रहे आ मने मन खीझत रहे.

थरिया टारत बीरा उठि गइलन. अँचइ के लवटलन त गमछी से ताबरतोर मुँह हाथ पोंछलन आ कोना में खड़ा कइल भाला उठा के बहरिया गइलन.

अन्हार होते बीरा अपना ड्यूटी पर चउकस हो जासु. कारन कि ओबेरा ओह भारी हाता वाला मकान मेंखाली सेठ के लइकी मीनू आ बुढ़िया दाई रहसु. कबो कबो मीनुओ साँझि खा निकल जासु. गेट का बाँया अलंगे दिनरात परल रहे वाला काठ के कुरुसी उनका खातिर हाजिर रहे. बइठल बइठल उनका गाँव जवार के पुरान पुरान बात मन परे आ ऊ ओहिजा के खेयाल में हेराइ जासु.

रात के नौ साढ़े नौ बजल होई. बीरा अपना कुरुसी प बइठल बइठल झपकत रहलन.बहरा कार के हारन सुनाइल. "....." बुझला सेठ आ गइलन." बीरा सावधान, उठि के खड़ा हो गइलन. हारन के आवाज फेरु सुनाइल, बीरा उठिके गेट खोल दिहलन. गेट के पल्ला खोलत खोलत हारन दू बेर अउरी बाजल. "हुँह, तनिके में अगुता जाला लोग, मशीन थोरे हऽ, जे बटन दबावऽ आ चालू हो जाई..." भुनभुनात ऊ दुनो पल्ला खोलि दिहलन. चमचमात सफेद कार थोरिकी देर खातिर रुकल, "बीरा! गेट बन क के जल्दी आवऽ! ड्राइवर मूड़ी निकाल के बोललस. सेठजी के लइकी मीनू कार में पछिला सीट पर ओठंघल रहली.

कार जब सेठ का बरन्डा का आगा पोरच में जाके रुकल त पाछा हड़बड़ाइल धवरत, बीरा पहुँचि चुकल रहलन. मन में किसिम किसिम के सोच विचार चलत रहे. कहीं इनकर तबियत खराब ना हो गइल? बीरा जइसे कवनो निष्कर्ष पर पहुँचल चहलन. तले ड्राइवरउतरि के पछिला गेट खोललस, "मेम साहिब, उतरीं".

सेठ के लइकी डगमगात बहरा निकलली. राम राम, कइसन डरेस पहिनले रहली. देंहि पर ओढ़नी ले ना. दू डेग धरते ऊ लड़खड़ाइ के आपन बाँह हावा में एने ओने नचावे लगली, जइसे उड़त होखसु. गोड़ थरथरात रहे, बुझाव जइसे अब गिरली, तब गिरली.

"सम्हार के मीनू जी." बीरा सचेत कइलन.

"आज क्लब में तनी ढेर ले लेली हा. तूँ इनके अब कइसहूँ इनका कमरा ले पहुँचावऽ! हम त घरे चलनी.... अइसहूँ आज ढेर देरी हो गइल बा!" अधेड़ ड्राइवर धिरहीं से बीरा का पाछा कान का जरी फुसफुसाइल.

"सँबारी अपना के मीनू जी." बीरा लपकि के उनकर हाथ ध लिहलन, फेरु कुछ खेयाल आवते जल्दी से छोड़ि दिहलन.

"हम.. हिच्च.. ठीक बानी... तूँ रहे द! हमके अब केहू के जरुरत हुँह... नइखे!" ऊ आपन बांया हाथ उठवली आ बगल में खड़ा बीरा का कान्ह पर ध दिहली, जइसे गिरे के डरे सहारा लेत हखसु. बीरा सोचलन, "हे भगवान, ई इनका आज का होग इल? केहू देखी त का सोची?" बरन्डा के सीढी चढ़त चढ़त ऊ बीर का कान्ही पर पूरा ओलरि गइली. डेराइल सहमल बीरा धीरे से कहलन, "...राउर तबियत ठीक नइखे, जाके चुपचाप आराम करीं."

"हिच्च... तूहूँ डेरात बाड़ नऽ! हूँ हम खा जाएब तोहके, न ऽ ऽ??" मुँ के बफहरा बीरा के जीउ गनगना दिहलस. ऊ भीतरे भीतर ऊभ चुभ होत रहलन.

"अइसन मत सोंची जी... रउवा त सबकर दुलारी..."

"चुप रहऽ! जेयादा मस्का ना... सब के सब धोखेबाज.... . " मीनू के गर्दन बीरा के कान्ह पर पुढ़क गइल, बीरा दहिना हाथ से उनका ओलरत देंहि के सँभरलन. लहरन का बीच डगमगात नाइ लेखा उनका देंहि के सम्हरले कइसहूं कइसहूँ भीतर का हाल में पहुँचलन तले दाई आ गइली.

"का भइल बबुनी के? तबियत ठीक बा नऽ?" ऊ अँचरा से हाली हाली हाथ पोंछलत धउरली.

"ले जा दादी इनके, इनकर हालत ठीक नइखे."

"समंहारऽ तूँ!" बीरा किकुरी के आपन कान्ह पाथा खींचि लिहलन. ऊहिचकोला खात नाइ लेखा डगमगइली आ बुढ़िया दाई का कान्हा पर ओलरि गइली.

"तूँ जा बबुआ. ई सब समय के फेर हऽ, ना त हमार फूल नियर बछिया हेंतरे ना नु बेदीन होइती." कवनो गहिर पीरा से कुंहरत दाई के मुँह से बोल फूटल.

बाकि फेर बाद में.....