आवऽ लवटि चलीं जा!
दसवाँ कड़ी
सूरुज के ललाई धीरे-धीरे बदरन का धमाचौकड़ी में ओरात रहे. साँझ के धुंध धीरे धीरे जमीन पर उतरे शुरु क देले रहे. बीरा आपन खाकी कोट पहिन चुकल रहलन. पनवा चउकी पर थरिया धरत बोलल, "आराम से कुछ खा-पी के तब जइतऽ! दिन पर दिन शहरी बाबू भइल जात बाड़ऽ!" बीरा हँसि दिहलन, "भूखि रही तब न केहू खाई! पता ना एइजा हमरा के का हो गइल बा?"
"दूध-दही कुछऊ रहित त खाइल होइत. खाली रोटी आ आलू के तरकारी खात खात मन अँउजाइ गइल बा. एइजा गाँव लेखा लेहना पताई आ फरुहा कुदार त करे के नइखे. आदमी जब जाँगर चलावेला त भुखियो चाँप के लागेले." मुंह में हाली हाली कवर डालत बीरा सफाई दिहलन.
पनवा समझत रहे. असल बात त इ रहे कि सँझिये इनकर ड्यूटि चालू हो जाले. गेट पर ना रहसु आ कवनो बात हो जाव त नोकरियो जाई. तनी बेरा गिरा के इतमीनान से खइतन त एक दू रोटी बेसी खइतन, दूध दही कहाँ से आवे? दिन के ड्यूटी देबे वाला दरवान सँझही, माली का संगे संगे भागि जाला. जात जात बोलत जाई, "तनी देखिहऽ बीरा... हमरा बजारे जाए के बा." फुकवना इ कबो ना सोचे कि बीरो के पलिवार बा, इनहूँ के बजार हाट जाए के परेला. इनकर बजार त दुपहरिये में होला. अतना दिन में कब्बो जो इनका संगे बजार घूमे के मोका मिलल होखे. पनवा उनकर हाली हाली कवर उठावत देखत रहे आ मने मन खीझत रहे.
थरिया टारत बीरा उठि गइलन. अँचइ के लवटलन त गमछी से ताबरतोर मुँह हाथ पोंछलन आ कोना में खड़ा कइल भाला उठा के बहरिया गइलन.
अन्हार होते बीरा अपना ड्यूटी पर चउकस हो जासु. कारन कि ओबेरा ओह भारी हाता वाला मकान में खाली सेठ के लइकी मीनू आ बुढ़िया दाई रहसु. कबो कबो मीनुओ साँझि खा निकल जासु. गेट का बाँया अलंगे दिनरात परल रहे वाला काठ के कुरुसी उनका खातिर हाजिर रहे. बइठल बइठल उनका गाँव जवार के पुरान पुरान बात मन परे आ ऊ ओहिजा के खेयाल में हेराइ जासु.
रात के नौ साढ़े नौ बजल होई. बीरा अपना कुरुसी प बइठल बइठल झपकत रहलन.बहरा कार के हारन सुनाइल. "....." बुझला सेठ आ गइलन." बीरा सावधान, उठि के खड़ा हो गइलन. हारन के आवाज फेरु सुनाइल, बीरा उठिके गेट खोल दिहलन. गेट के पल्ला खोलत खोलत हारन दू बेर अउरी बाजल. "हुँह, तनिके में अगुता जाला लोग, मशीन थोरे हऽ, जे बटन दबावऽ आ चालू हो जाई..." भुनभुनात ऊ दुनो पल्ला खोलि दिहलन. चमचमात सफेद कार थोरिकी देर खातिर रुकल, "बीरा! गेट बन क के जल्दी आवऽ! ड्राइवर मूड़ी निकाल के बोललस. सेठजी के लइकी मीनू कार में पछिला सीट पर ओठंघल रहली.
कार जब सेठ का बरन्डा का आगा पोरच में जाके रुकल त पाछा हड़बड़ाइल धवरत, बीरा पहुँचि चुकल रहलन. मन में किसिम किसिम के सोच विचार चलत रहे. कहीं इनकर तबियत खराब ना हो गइल? बीरा जइसे कवनो निष्कर्ष पर पहुँचल चहलन. तले ड्राइवर उतरि के पछिला गेट खोललस, "मेम साहिब, उतरीं".
सेठ के लइकी डगमगात बहरा निकलली. राम राम, कइसन डरेस पहिनले रहली. देंहि पर ओढ़नी ले ना. दू डेग धरते ऊ लड़खड़ाइ के आपन बाँह हावा में एने ओने नचावे लगली, जइसे उड़त होखसु. गोड़ थरथरात रहे, बुझाव जइसे अब गिरली, तब गिरली.
"सम्हार के मीनू जी." बीरा सचेत कइलन.
"आज क्लब में तनी ढेर ले लेली हा. तूँ इनके अब कइसहूँ इनका कमरा ले पहुँचावऽ! हम त घरे चलनी.... अइसहूँ आज ढेर देरी हो गइल बा!" अधेड़ ड्राइवर धिरहीं से बीरा का पाछा कान का जरी फुसफुसाइल.
"सम्हारी अपना के मीनू जी." बीरा लपकि के उनकर हाथ ध लिहलन, फेरु कुछ खेयाल आवते जल्दी से छोड़ि दिहलन.
"हम.. हिच्च.. ठीक बानी... तूँ रहे द! हमके अब केहू के जरुरत हुँह... नइखे!" ऊ आपन बांया हाथ उठवली आ बगल में खड़ा बीरा का कान्ह पर ध दिहली, जइसे गिरे के डरे सहारा लेत हखसु. बीरा सोचलन, "हे भगवान, ई इनका आज का हो गइल? केहू देखी त का सोची?" बरन्डा के सीढी चढ़त चढ़त ऊ बीर का कान्ही पर पूरा ओलरि गइली. डेराइल सहमल बीरा धीरे से कहलन, "...राउर तबियत ठीक नइखे, जाके चुपचाप आराम करीं."
"हिच्च... तूहूँ डेरात बाड़ नऽ! हूँ हम खा जाएब तोहके, न ऽ ऽ??" मुँ के बफहरा बीरा के जीउ गनगना दिहलस. ऊ भीतरे भीतर ऊभ चुभ होत रहलन.
"अइसन मत सोंची जी... रउवा त सबकर दुलारी..."
"चुप रहऽ! जेयादा मस्का ना... सब के सब धोखेबाज.... . " मीनू के गर्दन बीरा के कान्ह पर लुढ़क गइल, बीरा दहिना हाथ से उनका ओलरत देंहि के सँभरलन. लहरन का बीच डगमगात नाइ लेखा उनका देंहि के सम्हरले कइसहूं कइसहूँ भीतर का हाल में पहुँचलन तले दाई आ गइली.
"का भइल बबुनी के? तबियत ठीक बा नऽ?" ऊ अँचरा से हाली हाली हाथ पोंछलत धउरली.
"ले जा दादी इनके, इनकर हालत ठीक नइखे."
"सम्हारऽ तूँ!" बीरा किकुरी के आपन कान्ह पाथा खींचि लिहलन. ऊ हिचकोला खात नाइ लेखा डगमगइली आ बुढ़िया दाई का कान्हा पर ओलरि गइली.
"तूँ जा बबुआ. ई सब समय के फेर हऽ, ना त हमार फूल नियर बछिया हेंतरे ना नु बेदीन होइती." कवनो गहिर पीरा से कुंहरत दाई के मुँह से बोल फूटल.
बीरा चुपचाप चल दिहलन. हाल से बाहर निकलत खा ऊ एक हालि पाछा घूमि के देखलन, दाई उनके अपना अँकवारी में धइले, कोठरी में ले जात रहली. भगवानो के अजब लीला बा. अतना धन-दउलत, सुख-एश्वर्य भरल बा एह घर में तब्बो एह लोग का शांति नइखे, ना केहु का केहूसे हिरऊ लगाव बा. मीनू अइसन त ना लागेली.... फेर काहें, आपन ई हाल कइले बाड़ी... राम जानसु उनका भीतर के हाल...
बीरा गेट प खड़ा खड़ा जब सिहराइ गइलन त कुरुसी प बइठि गइलन. उनका दिमाग में सेठजी का बारे में किसिम-किसिम के बात आवत रहे. कुल पलिवार अछइत सेठ अपना लइकी मीनू का संगे अकेलहीं एइजा रहेलन. सेठानी अपना पतोहि का संगे कलकत्ता रहेली. लइका कहीं बिदेस में रहेला. साल में एक दू बेर आवेला. ड्राइवर रामरतन बतावेलन कि ऊ ओनिए कवनो रंगरेज लइकि से बियाह कइले बा. जब आवेला सेठ से रुपया खातिर कहासुनी करेला आ कुछ ना कुछ लेइये के जाला.
रामरतन सेठो के बारे में पता ना का-का कहेलन. कहेलन कि उनकर सेक्रेटरी उनका पर मोहिनी मंतर डलले बिया. बीरा के खूब नीक से मन परत बा. ऊ कइ बेर एइजा सेठ जी के संगे आइल बिया. कबो-कबो इहाँ रात खा रुकियो जाले. सबका संगे खाले-पियेले आ घर का इंतजाम का बारे में बतियावेले. बीरा के त ओकरा में कवनो अइसन बात ना लउके. हँ तनी ज्यादा बनल-सँवरल रहेले. कबो सलवार सूट त कबो सिलिक के साड़ी. सेठ के लइकी मीनू से कुच्छे बरिस बड़ लागेले. सेठ जी का संगे अइला-गइला आ घूमला के मतलब इ थोरे भइल कि .... राम राम, लोगो कइसन-कइसन बात कढ़ाइ देला. बीरा मूड़ी झटकि के खड़ा हो गइलन आ गेट का एहर-ओहर टहले लगलन. बाकि मन के का कहल जाव? ऊ घूम फिर के ओही जा जात रहे. मीनू निसा में जवन कुछ बरबरात रहली हा ओकर का अरथ हो सकेला? बी॰ए॰ पास पढ़ल लिखल समझदार लइकी आ अतना रात खा पता ना कहाँ से आवेले आ दारू पी के .. छिः छिः.. इहो एक तरे से मति के फेरे न कहाई. शहरी लोगन के बाते निराली आ उटपटांग बा. बाप के चिन्ते नइखे, बेटी बेटा के परवाहे नइखे आ मतारी से कवनो छुवे छूत नइखे.
भगवान के अजब लीला. कहीं सब कुछ बा त चएने-सुख गायब. कहीं सब कुछ खातिर परेसानी बा तब्बो लोग साफ सोझ आ निफिक्किर रहि लेता. गाँव में त साफ सोझ साफ हिसाब बा. प्रेम महब्बत होखे भा झगरा. अइसन नइखे कि उहाँ छल, फरेब, ऊँच, नीच नइखे होत, बाकि पलिवार आ समाज के खयाल क के, डेरा लुका के. एइजा शहर में त सब कुछ खुलम्मखुल्ला बा. गाँव घर आ समाजे से डेरा के न उनका पनवा का संगे भागे के परल. एइजा अइला पर बुझाता कि कतना दुर्दशा आ फजिहत बा. जिनिगी एकदम बान्हल-छानल. केहू का फुर्सते नइखे. ऊ त नोकरी करत बाड़न. नोकर माने नोकर. ओकर कइसन आजादी? ऊ हाड़ मांस के बनल. कुछ रुपया प बन्हाइल एगो गुलामे न बा. धिरिक जिनिगी बा ओकर! पलखत नइखे मिलत पनवां का लगे बइठे-बतियावे के. ई रात भर जागल आ दिन में सूतल ओह बेचारी के त हमरो ले बुरा हाल बा! ना दिन के फुर्सत ना रात के चैन. बोललो बतियावल मोहाल.
गाड़ी के हारन बाजल आ गेट पर गाड़ी के घरघराहट सुनाइल. बीरा गेट में बनावल मुक्की से झाँक के देखलन. सेठ के गाड़ी रहे. हारन फेरू बाजल. बीरा हाबुर ताबुर धवरि के फाटक के कुंडी हटवलन आ गेटि खोल दिहलन. गाड़ी धीरे धीरे सरसरात अंदर घुसि गइल. गेट बन क के जब बीरा पाछा तकलन त पोरच में रुकल गाड़ी से सेठ जी के उतरत देखलन. उनका पाछा ले एगो मेहरारूओ उतरल. सीढ़ी चढ़त खा बरन्डा का अँजोरा में ओह मेहरारु के पूरा पूरा देखलन त चीन्हत देरी ना लागल. एह बेरा ओकर फैसन देखे जोग रहे. हाथ में बैग आ एगो कागज के फाइल. चिरई लेखा फुदकत सेठ का पाछा पाछा ऊ अंदर चलि गइल. बीरा पाछा लागल जब बरन्डा का लगे चहुँपलन त सेठ जी के बोली सुनाइल, 'दाई, बाहर के दरवाजा बन्न क आवऽ! आज बड़ी देर हो गइल हा आफिस में. हमहन के खाना-ओना नइखे खाए के! ओहरे होटल में खाइ-पी लेले बानी. हमके अभी बहुत काम करे के बा. तूँ खाइ-पी के सुति रहऽ!'
दाई जब बरन्डा के जरत बलब बुतावे चलली त बीरा के खड़ा देखि के पूछ भइली, 'तूँ खइले-पियले बाड़ऽ न! आज त ना सेठे खइलन ना मीनूए खइली. खाना बेकारे हो जाई. बड़ा मन से खीर बनवले रहलीं आज मीनू बिटिया खातिर..., बाकि... खैर आवऽ तूँही कुछ खा लऽ! एहीजा रुकऽ हम ले आवऽ तानी.' दाई जइसे आइल रहली, वइसहीं लवटि गइली.
थोरिके देर देर में जब लवटली त उनका हाथ में एगो बड़ पलेट रहे. ओम्मे रोटि, तरकारी, चटनी, आ एगो कटोरी में खीर धइल रहे. 'ल, बचवा, तूँ त कम से कम खा लऽ! समुझब कि हमार बनावल सवारथ हो गइल!'
बीरा दाई के मुँह ताकत रहलन. ओह निर्मल ममता भरल चेहरा प उनका प्रेम के सिवाय कुछ ना लउकल.ममता के मन राखे खातिर कोना में धइल स्टूल खींचि के बइठि गइलन आ दाई का हाथ से पलेट लेके धीरे धीरे खाए लगलन. खाना खात खा उनकर नजर दाई के चेहरा प टँगाइल रहे. उनकर मीठ चितवन उनका के सनेहि के घीउ में सानि के कवर खियावत रहे.
- 'तूँ एइजा कइसे रुकल बाड़ू दाई? इहाँ त केहू का केहू से लगावे छुआव नइखे.'
- 'दस-बारह बरिस हो गइल ए बचवा. हमार सवाँग त आज से तेरह बरिस पहिले हमरा के छोड़ि के चल गइलन. मजबूर होके एइजा अइनी आ एही जा रहि गइनी.'
- 'तोहरा अपना घर में आउर के के बा?'
- 'खाली एगो लइकी रहे. आज से तीन बरिस पहिले ऊहो संग छोड़ दिहलस. ओकर शादी-बियाह आ नाती-पोता देखे के सुखो बुझला हमरा भाग में ना रहे... ', बूढ़ी के आँख ढबढबा गइल. ऊ भुइँया बइठि गइली.
- 'का भइल रहे ओकरा?', बीरा खीर के कटोरी मुँह से लगावत पुछलन.
- 'का जाने का भइल, अचके पेट में खूब दरद उठल. एगो दूगो उल्टी भइल आ आधी रात होत-होत चलि गइलि हमार धिया!', आँचर से आँख के टपकत लोर सुखावत दाई कहली.
- 'डकदर के ना देखवलू?'
- 'देखावे के मोके ना मिलल. राती के बारह बजे खुद सेठे ओकरा के गाड़ी में अस्पताल ले गइलन. हमहूँ ओकरा संगही रहनी, बाकि अस्पताल पहुँचला का पहिलहीं हमरा बछिया के आँखि मुना गइल.' , दाई सुसुके लगली.
बीरा के आँख छलछला आइल रहे, दाई के ढारस बन्हावत अतने कहलन, 'जाए द! भगवान के ईहे मंजूर रहे.'
- 'का बताई ए भईया? ऊ अतना सुघ्घर आ मयार रहे कि ..', दाई के आँखि फेरु ढबढबा आइल, 'लामी लामी केसि, आम के फाँकि अस बड़ी बड़ी आँखि. हँसे त गाल में गड़हा परि जाव. तितली अस घर भर उड़ल फिरे. खाना त अतना नीक बनावे कि लोग अँगुरी चाटत रहि जाव. सेठ जी के लइकी हर घरी ओकरे संगे लागल रहस. पढ़लो लिखल रहे बबुआ... ', दाई के आँखि छत पर जा के अटकि गइल. जइसे ऊ फेरु ओही समय में लवटि गइल होखसु आ उनकर लइकी उनका आंखि के सोझा ओइसहीं तितली अस उड़त होखे. उनका आपन सुध बुध ना रहे ओ घरी.
बीरा खाना खा चुकल रहलन. दाई के ओही हाल में छोड़ि, पलेट उठवलन आ नल पर धोवे आ पानी पीए बरंडा से नीचे उतरि गइलन. नल पोरच का आगा छरदेवारी का जरी, बाँया अलंगे रहे. सेठ के गाड़ी ओही जा धोआव. ओही अलंगे सेठ जी के कमरा के खिड़िकी खुलँ स. ओ बेरा उनका कमरा में जरत लाइट के अँजोर छन के बहरा ले आवत रहे. एसे उनका नल का ओरी जाए मे कवनो दिक्कत ना भइल.
पलेट खँगारत खा उनके कवनो मेहरारू के खनखनात हँसी सुनाइल. उनकर नजरि सेठ जी का खिड़िकी कावर घुमल आ जइसे उनका देंहि चीरले लोहू ना. एक दम हकबक रहि गइलन. सेठ जी सोफा पर ढहल रहलन आ सेकरेटरी उनका कोरा में बइठि के हँसत रहे, ओघरी ओकरा देंहि प बेलाउजो ना रहे. ओकर हाथ सेठ जी का गर्दन में लपटाइल रहे आ सेठ जी ओकरा उघार देंहि पर धीरे-धीरे आपन हाथ घुमावत मुस्कियात रहलन. कुछ देर ले बीरा लकवा मरला अस खड़ा रहलन, फेरु होस अवते ऊ निहुरि के लुका गइलन. उनकर करेजा धुकधुकात रहे, जइसे कवनो चोरी पकड़ा गइल होखे. ऊ निहुरले निहुरल उहाँ से खसकि अइलन.
बुढ़िया दाई अभिन ले ओइसहीं बइठल रहली. उनकर नजर छत से उतरि के देवाल पर लगावल एगो बड़हन फरेम वाला फोटो पर गड़ल रहे. अइसन ना कि ऊ ओह फोटो के देखत रहली, ऊ त उनका नजरि के खाली अलम भर रहे, उनकर दिमाग त कहीं अउर रहे. कवनो दोसरा दुनियाँ में.
- 'जा तुहूँ अब सूतऽ दादी. ढेर रात हो गइल बा.', बीरा पलेट आ कटोरी उनका लगे धरत कहलन.
- 'हूँ... सहिये कहत बाड़ऽ. ढेर रात हो गइल बा. बाकि अब नीन कहाँ लागी?'
- 'अच्छा दादी, सेठ जी के लड़िका कहाँ रहेलन?', बीरा खड़े-खड़े बात के मोड़े के कोसिस कइलन.
- 'नाँव मति लऽ ओह मलेच्छ के. लड़िका हऽ कि दुश्मन हऽ. बहुत बाउर सोभाव के हउवे ऊ. एक बेर त पियला में हमरा लइकिए का संगे जोर जबरदस्ती करे लागल, ई कहऽ कि ओह दिन मीनू पहुँचि गइली. बहुत बोलली तब छोड़लस. सेठो जी सुनलन त बहुत डँटलन-फटकरलन. बाकिर ओकरा कवनो लाज हया होखे तब नऽ. हमार बछिया ओह दिन डरन हमरा लगे से कहीं हटली ना. ओकर बात पुछले बाड़ऽ ओकर रहन चाल देखि के सेठ जी ओकर बियाहो कइलन बाकि कुछ दिन का बाद ओकर फेरु उहे हाल. एने-ओने फालतू घूमल आ लड़कियन संगे छेड़खानी आ जोर-जबर्दस्ती. अब त कहीं कवनो रंगरेज मेहरारू राख लेले बा.'
- 'जाए द ए दादी! बुझा गइल कूल्हि .. जा अब तुहूँ सूतऽ!'
- 'अब का नीन परी हमरा? अब त रात भर पुरान-पुरान बात इयाद परी आ रात भर बेचैन करी! तूँ जा, तहरा नीन लागत होखे त घूमि फिरी आवऽ.'
- 'अच्छा दादी, सेठ जी के मेहरारु काहें ना रहसु एइजा?', बीरा अब दाई का बगल में भुइंया बइठि गइलन.
- 'पटबे ना करे ला एको दिन एह लोग में. ऊ अपना मन के आ ई अपना मन के. एगो लइकी मीनू बाड़ी. उनहूँ से ना पटे. अपने साज-सवख आ घुमला-फिरला में रहेली. कलकत्ता में बहुत बड़ मकान, गाड़ी कूल्हि बा.'
- 'अकेलहीं रहेली ?'
- 'ना पतोहियो रहेले. उहो नोकरानिए लेखा. कम पढ़ल लिखल आ सिधवा हियऽ. ऊ फारवड औरत ठहरली. खाली एने ओने घूमिहें आ हुकुम चलइहें. छोड़ऽ उनकर बात.. ', दाई के मूड एकदम खराब हो गइल.
बीरा सकपकाइल बात बदललन, 'तुहूँ दादी, सोझिया औरत, कहाँ फँसि गइलू एह शहरि लोगन का जंजाल में?'
- 'तुहूँ त फँसले बाड़ऽ! ई अधम पेट आ मजबूरी कूल्ही बरदास करावेला. ना त एह शहरी लोगन के बात मत पूछऽ. इहाँ सबे साढ़े बावने हाथ के बा. हमके खाली सेठ जी के लइकि के मोह बा, ना त हमहूं चलिए गइल रहितीं. बेचारी एह लोगन का दुखे ऊ अपना के बरबाद कर रहल बिया. बियाह शादी हो जाइत त छुट्टी होइत.' - दाई फेरु चुप हो गइली.
बीरा टुकुर टुकुर उनका चेहरा पर के चढ़ाव उतार आ दुख के लकीरन के पढ़त रहलन. मुँह से बकार ना निकलल.
- 'तहार मेहरारू बड़ी सुघ्घर बिया ए बाबू! गुनी, गिहिथिन, सील आ मरउवत वाली. अकेले डहुरत रहेले बेचारी एह पिंजड़ा में. ओकर उदास मुँह हमसे ना देखि जाला. एघरी ओकर गोड़ भारी बा. तनी ओकर खेयाल करऽ बचवा. तूँही न ओकर एगो आपन बाड़ऽ एइजा. आ साँच पूछऽ त एह हालत में ओके एइजा राखल ठीक नइखे.' दाई अपनाइत से बीरा के समझवली आ उठि के खड़ा हो गइली.
- 'जा अब, हमहूं बलब बुता के केंवाड़ी बन करीं, ना त सेठ जी कहीं जागि जइहें त एहू खातिर उल्टा सीधा बोलिहें.'
बीरा के जइसे केहू छिउँकी काटि देले होखे. सेठ के कमरा के हालि देखि के अजीब मन हो गइल रहे उनकर. चलत चलत दाई पनवा के बारे में जवन कहि दिहली कि उनका अउर हुड़ुक हो गइल. ऊ बहुत कुछ से अनजाने बाड़न. कतना गम्हीर बात कतना हलुकाहे कहि दिहली आजु दाई?
बीरा देवाल पर खड़ा कइल भाला उठवलन आ बेचैन मन लेले गेट कावर चल दिहलन. दाई बत्ती बुता के दरवाजा बन क दिहली. गेट का एहर ओहर चहलकदमी करत बीरा सेठ का आलीशान बँगला का ओर तकलन. पोरच के दहिना ओर सेठ का कमरा वाला खिरकी से अबहियों अँजोर छन के बहरा पसरत रहे. अँजोर देखते उनके सेठ का कोठरी क कूल्ही हलचल फेरु से उनका आँखी का सोझा आ गइल.... ' गजब बेसरम औरत बिया ई सेक्रेटरी! आ सेठ जी कवन दूध के धोवल बाड़न.' ऊ बुदबुदइलन, लोग झूठे कानाफूसी थोड़े करेला. जवान बेटी के चिन्ता नइखे बेसरम के आ अपना भोग बिलास में मस्त बा. बीरा आपन मूरि झटकि के कुर्सी प बइठि गइलन.
आज सँझही से अइसन अइसन तमाशा होत बा कि बीरा अस देहाती गँवई आदिमियो के एह शहरी जीवन के असलियत बुझा गइल बा. ऊ सोचलन बूढ़िया दाई आज अतना सलतंत से उनका से बइठि के काहे बतियवली हा. का उनका सेठ जी का एह हरकत केपता नइखे? कूल्हि मालूम बा उनका... जान बूझ के अनजान बनल बाड़ी. एक बात उनका ना समझ में आइल. ऊ अपना बेटी का बारे में बतावत खा जेंतरे रुकि रुकि सोचेलागत रहुवी, ओसे लागत रहुवे जइसे कुछ चिपावत होखस. सेठजी का लड़िका के जिकिर आवते ऊ कतना उफन गउवी. आँखी में से नफरत आ क्रोध के जइसे चिनिगी छटकत रहुवे. बीरा अनाप सनाप सोचत सोचत उँघाए शुरु क देले रहलन.
रात के दू भा अढ़ाई होत होई. सड़क प आन्ही अस जात कवनो ट्रक के घरघराहट से हड़बड़ाइके बीरा के झपकि खुलल. ऊ चारो ओर देखत, हाता के कोना अपना कोठारी का ओर तकलन. बलब ओइजो जरत रहे. 'त का पनवाँ अभी जगले बिया!' ..... 'अकेले डहुरत रहेले बेचारी पिंजड़ा में.' बुढ़िया दाई के कहल बात उनका इयाद आइल आ ऊ हड़बड़इले उठि के अपना कोठारी का ओरि चल दिहलन.
पनवा चउकी पर बइठि के कवनो छोट कुरता सिए में लीन रहे. 'का हो अबहीं जगले बाड़ू?' खिरिकी पर से झाँकत बीरा पुछलन.
पनवा झट से कुरता हटाके एकोरा क दिहलस आ मुस्कियात बोलल, - 'ए बेरा भला, तोहके कइसे मन पर गइल हा हमार?'
- 'खोलऽ, बताईं!' बीरा घूमि के दुआरी पर जा के खड़ा हो गइलन.
दरवाजा खुलते बीरा फेरु पुछलन, 'का सियत पूरत रहलू हा हो?'
पनवाका उदास चेहरा पर थोरकी देर खातिर ललाई आइल, 'तूहूँ खूब बाड़ऽ... तहरा नइखे पता?' बीरा ओकरा के अपना अँकवारी में भरि लिहलन, 'पता त बटले बा, बाकि अब्बे से अतना तइयारी के का जरुरत? अपन सरीर के त कुछ खेयाल करे के चाहीं. अजुए से रात रात भर जगरम काहें?'
- 'बेईं, छोड़ऽ! बड़ा हमार खेयाल करत बाड़ऽ.' पनवा उनका कड़ेर बान्हन में बन्हाइल, कसमसाइल.
बीरा छोड़ दिहलन. फेरु मूड़ी नीचे कइले कहलन, 'साँचे कहत बाड़ू. हम तहरा संगे बड़ा अन्याय कइलीं. कबो तहरा भीतर के पीरा आ कसक के ना समझनीं.' बीरा चउकि पर चित्ते परि गइलन आ छत के घूइरे लगलन.
- 'छोड़ऽ ना... तूहूँ का ले के बइठि गइलऽ. थाकल बाड़ऽ तनी आराम क लऽ. उठऽ हम एपर बिछवना बिछा दीं. निखहरे सूतल ठीक नइखे.' बीरा ना उठलन. पनवा उनका लगे बइठि के उनकर कपार सुहुरावे लागल. बीरा के आँखि मुना गइल.
पनवा कुछ देर ले नीन में परल बीरा का चेहरा के एकटक देखत रहे, फेरु ओकरा सूखल ओठ से कुछ शब्द फूटल, 'हमरे पाछे तहार कइसन हाल हो गइल? ना दिन चैन ना रात. हाय रे बिधना, हमहन के कवना पाप के सजाय मिलऽता.' भारी मन लेले ऊ उठल, कवाँड़ी बन क के बलब बुतवलस आ बीरा का बगल में ओठँगि गइल.


