– गंगा प्रसाद अरुण

Arun-Jamshedpur
सम्मेलन पत्रिका के कार्यवाही विशेषांक, मार्च अप्रैल 2014, मिलल. एह अंक के प्रायोजक लोग के उदारता सराहे जोग बा. बाकिर संपादकीय में ‘विचार करे लायक कुछ बात’ सचहूँ विचारे जोग बा.

1973 में स्थापित ई संस्था सचहूँ एगो लमहर यात्रा तय कइले बा, बाकिर ‘एतना लमहर जीवन अबहीं ले दोसरा कवनो भोजपुरी संस्था के नइखे मिलल’ साँच नइखे. जमशेदेपुर में भोजपुरी साहित्य परिसद के स्थापना 1955 में भइल जवन कि पूरा सक्रिय बा. वय में वरीय अइसन अनेके संस्था मिल जइहें स. सम्मेलन के कार्यालय-व्यवस्था केहू के ‘दया’ आ ‘स्वेच्छा’ से ना, त्याग-समर्पण के भाव से होखे के चाहीं. स्वेच्छा से त स्वेच्छाचारिता का बढ़ावा मिलेला. सुविधानुसार एकर शाखा कार्यालय ‘नोएडा’ में खुलल, फिर सासाराम में. त काहे ना शफियाबाद आ सीवानो में ? संविधान का अनुसार त एकर कार्यालय पटने में रहे के चाहीं, काम केहू कतहूँ से करो.

कवनो संस्था के चलावे खातिर ओकर पदाधिकारी/पत्रिका संपादक मंडल के सदस्य लोग के आचरन-बानी-बचन शालीन होखे के चाहीं. शालीनता से लोग जुटी, अशालीनता से त टूटबे करी लोग. महामंत्री जी के कार्यवाही प्रतिवेदन नीमन बन परल बा. हर कार्यक्रम के विस्तृत बरनन बा, बाकिर कुछ तथ्यन के लागऽता जानबूझ के छोड़ दिहल गइल बा. प्रतिवेदन त तथ्यपरक होखे के चाहीं, ना कि दुराग्रही! आसिफ रोहतासवी प्रकरण के चरचा जरूरे चाहत रहे. ‘पुस्तक लोकार्पण’ के अस्तव्यस्तता के चर्चा चाहत रहे. कवि सम्मेलन में शामिल लोगन के नामावलियो देखे-विचारे जोग बा. 1975 से सम्मेलन से जुड़ल हम भाग्यशाली बानी कि ‘तीन डेगे त्रिलोक’ के लोकार्पण के साथे हमरो नाँव-चर्चा बा

अंक के विशेष आकर्षण त ‘हमरा हऊ चाहीं’ शीर्षक व्यंग्य रचना बा, जवन कि एगो अश्लील गायक-गायकी के इयाद दिलावत बा, जवना के हमनी धुर विरोधी रहल बानीं. अइसन हलुक बात-विचार-रचना से परहेज होखे के चाहीं. अगर ‘रोहतासवी’ के सम्मान कबूल ना रहे, त एह रचना में, जवना के रचना कहत नीक नइखे लागत, अइसन हल्कापन देखावल उचित ना रहे. ‘बेसी पइसा, केतना ?’ ‘दलित-बड़जतिया’ के चर्चा आपत्तिजनक बा. कुंडलिया छंद के पारखी-पक्षधर लोगन से अनुरोध बा कि जवन सवाल उठावल गइल बा, ओकरा अनुसार अलग से ‘दलित-अल्पसंख्यक’ भा जातीय आधार पर आरक्षित पुरस्कारो के व्यवस्था कइल जाय. अपना किताब पर आगे-पीछे आपने फोटो छपवावे पर अनका कपरबथी काहे ? अइसहीं ‘हमार अपमान होता’ के वाक्य – ‘रउवा ठाठ से रहतानी, हीक भर चाभतानी, माइक पकड़ लेतानी त छोड़ते नइखीं’ – के शालीन कहल जाई ? ‘साहित्य के अपमान’ में – ‘कोइलरी से आइल ‘बुज-बुज’ पत्रिका के संपादक के चर्चा नाँव के साथे कइल चाहत रहे. एकरा पहिलहूँ डा॰ जीतेन्द्र वर्मा जी के अइसन व्यंग्य सम्मेलन पत्रिका में आ चुकल बा. एकरा में साहित्यिकता कहाँ बा ? लोग अइसहीं सम्मेलन से जुड़ी ? खाली गुरुवई-चेलवई से सम्मेलन आ भोजपुरी के भलाई कहाँ ? माफ कइल जाई कवनो दुर्भावना से ना, बलुक संस्था आ भोजपुरी के हित में हमरा ई कुल्हि लिखे के परल.

तबो संतोष बा कि संतोष कुमार (आलेख : भूमंडलीकरण आ भोजपुरी), सुभाष राय (भोजपुरी सिनेमा के संघर्ष, विकास आ सशभावना), रविरंजन सिन्हा (वनवास में रजगद्दी), अजय कुमार (गइल आदिमी), डा॰ तैयब हुसैन पीड़ित (बाजार में फाँसी), सुधांशु कुमार सिंह ‘साधु’ (भोजपुरी उपन्यास के उद्भव आ विकास), आ दिलीप कुमार (वर्तमान सामाजिक दशा के अभिनयात्मक प्रस्तुति) जइसन कुछ नाँव जरूरे हाजिर बा, जिनका आलेख-कहानी-समीक्षा से भोजपुरी सम्मेलन पत्रिका के एह अंक के गौरव मिलत बा.


गंगा प्रसाद अरुण
21 बी, रोड -1, जोन -4,
जमशेदपुर – 831019
मोबाइल 09234872041

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