(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 13वी प्रस्तुति)

– कृपाशंकर प्रसाद

प्रकाश आ हम कइ बेरि होटल में संगे संगे होटलियवले रहनी जा। जब मांसाहार करे के होखे तबे होटलियाईं जा – ‘ई खस बात रहे।’ शुरुए से हम मार्क करत रहली कि जब मछरी भत खईं जा त ऊ संगे दोसरा टेबुल प खये चलि जांव। आ अपनाखतिर मछरी चाहे अण्डाकरी मंगा के बड़ा बेमन से ख के जल्दिये उठि जाय। प्रकाश हमार दोस्त रहे आ दूनों अदिमी एके टेबुल प काम करत रहनी जा। बड़ा मस्त जीव ! लेकिन ई बात हमरा के बड़ा अचरज में डालि देव कि ऊ मछरी भ अण्डा त बड़ा चहकि चहकि के खउ बाकी मीट प ओकर रोंआ गिरि जाउ। कइ बेरि पूछबो कइनी, बाकी इहे कहि के टारि देव कि कबहीं अस्थिरे बताइबि।

एक दिन खए खतिर ओकरा के अपना घरे बोलवनी हमार सिरीमती बड़ा प्रेम से मछरी भत बनवली। ऊ अतवार के दिन रहे-हमनी के छुट्टी के दिन। प्रकाश खूब डटि के खइलस। खइला के बाद हंसि के कहलस कि ‘भउजी अतना खिया देली कि अब टकसलो नइखे जात। आवऽ थेरकी देर बिछवना प पटाइल जाउ।’ दूनो अदिमी एगो बेड प पसरि गइनी जा। ‘आजु बढ़िया मोका बा, पूछिये लीं कि ऊ मीट काहें ना खला ?’ हम सोचनी। अबहीं हम सोचते रहनी कि सुरूआत कइसे करीं, तले ओकर नाक बाजे लागल। अब त ‘मन के मनहीं रही ए उधे’ के हालत हो गइल। दिन में सूते के हमार आदत रहे ना; एह से मन मारि के कमलेश्वर के लिखल ‘कितने पाकिस्तान’ उठा के पढ़े लगनी। किताब में अदीब (साहित्यकार) अपना अदालत में बाबर से अयोध्या में बाबरी मस्जिद बनावे के बारे में तहकीकात करत रहे आ बाबर कहते रहे कि ऊ कभी अयोध्या गइबे ना कइल त मस्जिद कइसे बनवलसि।

अदीब फेरू पूछऽता – ‘इतिहास में तहार अवध में जाए के चरचा बा, ई का झूठ हऽ ?’

”झूठ नइखे लिखल, हम अवध में गइल रहनी लेकिन अयोध्या कबहूं ना गइनी। रउरा जाने के चाहीं कि ओह घरी अवध आजु काल्हु के उत्तर प्रदेश के एगो बड़ हिस्सा के कहल जात रहे आ अयोध्या हमरा समय में एगो छोट बाजार होई एकरा से जादा ओकर कवनो अहमियत ना रहे।“

”तहरा ई त मालूम रहे कि अयोध्या में हिन्दू के भगवान राम के जनम भइल रहे। हिन्दू के रिगावे खतिर तू अइसन ना कइ सकत रहलऽ ?“

बाबर हंसल, हुजूर अगर हमरा हिन्दू लोग के रिगावहीं के रहित त हम मस्जिद मथुरा में बनवले रहितीं। अयोध्या में काहें बनइतीं ?

अदीब अचरज से पूछलसि, ‘मथुरा में काहें बनवइतऽ, अयोध्या में काहें ना ?’

”एह से हुजूर, कि हमरा समय तक राम के भगवान के मान्यता ना मिलल रहे भलहीं ऊ मर्यादा पुरूष होखसु। हमरा बहुत बाद में तुलसीदास के रामचरितमानस लिखला के बाद राम के भगवान के मान्यता मिलल। मथुरा में एह से कहऽ तानी कि हमरा से बहुत पहिलहीं कृष्ण जी भगवान के रूप में पुजात रहले। हमरा हिन्दू के आहते करे के रहित त हम मस्जिद मथुरा में बनवले रहितीं।“

”आछा ई बतावऽ बाबर कि अगर तू नइखऽ बनवले त एकर नाम बाबरी मस्जिद कइसे परि गइल ?“

“हजूर ई त बहुत मामूली सवाल बा आ एकर जवाब भी बहुत आसान बा। आजु अपना हिन्दुस्तान प नजर डालीं त इन्दिरा पार्क, अम्बेडकर पार्क, महात्मा गान्धी संग्रहालय, राजीव गान्धी मार्ग, चन्द्रशेखर नगर आ ना जाने अइसने कतना बड़का नेता आ केवनो क्षेत्र में बढ़ल लोग के नाम पर कइ गो चीज बनल बा। हमरा के ई बताईं कि जेकरा नाम प ई सब बनल बा का उहे लोग बनवले बा ?“

हम पढ़े में डूबल रहनी तले प्रकाश लागल जोर जोर से चिचिया के गारी देबे। हम देखनी, प्रकाश के चेहरा प गुस्सा के तमतमाहट ! जानि गइनी कि कवनो भयानक सपना देखले बा। झकझोरि के उठा देनी। थेरकी देर में ऊ नार्मल भइल। हाथ-मुंह धोवाइ के पुछनी- ”प्रकाश का भइल, केकरा के गारी देत रहलऽ हा ?“

”प्रसाद भई, ई सपना हम सैकड़न बार देखले बानी। गारी कसाई के देनी।“

”तहरा कसाई से कइसे पाला परि गइल ?“

”तूं क हाली पूछऽल कि हम मीट काहें ना खानी। लऽ अब सब समुझ में आ जाई.“

”ओ घरी हम मैट्रिक में पढ़त रहनीं। अतना लम्बा समय बीत गइल लेकिन एगो अइसन पाप कइनी जवना के कवनो पराछित हइये नइखे। जिनिगी में बड़ बड़ घटना भइली स आ समय के संगे भुलइयो गइली स लेकिन ई पाप रहि रहि के हमरा समूचा इन्सानियत प सवाल खड़ा करत रहेला। हमरा दिमाग प ऊ घटना जस के तस बा। तू साहित्यकार हवऽ। हो सके त हमार ई पाप अपना कलम से अपना पाठक लोग में बांटि दीहऽ।“ प्रकाश कुछ देर चुप भइल। हम ओकर चेहरा पढ़े के कोशिस करे लगनी। आजु के प्रकाश हमरा एकदमे दोसर लागल।

हम नौवां क्लास में रहनी त हमरा बाबूजी के कवनो बेमारी भइल। डाक्टर उनुका के बकरी के दूध पीये के कहलसि। बहुत सुन्नर बकरी आइलि, ओकरा संगे एगो ओकर मखमल लेखा मोलायम बच्चो आइल। बचवा प हम मोहा गइनी। ओकर आंखि अतना सुन्नर रहली स कि हम बहुत देर ले ओकर चुम्मा लेते रहि जाईं। चुम्मा लेत खा उहो खूब अगरा जाऊ आ अगरइला के मारे ऊ आपन पोंछ खूब तेजी से बिजुली के करेण्ट लेखा दाएं बाएं सटकारे लागे।

धीरे धीरे हमरा ओकरा में खूब छने लागल आ होत होत अइसन हो गइल कि हम ओकरा खातिर आ ऊ हमरा खातिर बेचैन हो जाईं जा। हमरा जिनिगी में ओकरा छोड़ि के कुछ रहिए ना गइल। नाम राखि देनी – ‘मोहन’।

अब स्कूल जाए में बड़ा मुश्किल खड़ा हो जाउ। मोहना छपिटाए लागे। धउरि के गोड़ में आपन मूड़ी डालि के चलल मुश्किल क देव। ओकरा के गोदी में उठाइ के मुंह आंखि चूमि के पूरा देंह सुहुराईं तबो केहू दोसर धरे तब हमरा स्कूल जाये के तनिको मन ना करे। पता ना प्रकृति में अइसन कवन शक्ति बा कि ऊ अनबोलता जीव हमरा स्कूल से लवटे के समय जानि गइल रहे। हमरा के दूरे से देखि के भर जोर धउरि के हमरा कीहें चलि आवे हमहूँ धउरि के ओकरा के गोदी में उठा लीं, सुहुरावत चूमत घर में घुसीं।

कभी हमरा कान्हा प आपन गरदन ध देउ कभी पीठ कावर जा के आपन गरदन हमरा कांख में घुसा के बड़ा प्रेम से हमार मुंह निहारे। ओह घरी ओकरा आंख के सुनराई आ मासूमियत देखे लाएक होखे।

मोहना चार महीना के होखे चलल त ओकर माई बेमारी से मरि गइलि। स्कूल से लवटे के बेरा हम ओकरा खाये खातिर कुछ घासि पात ले ले आईं। ओहू दिने कुछ मोलायम पतई ले ले अइनी। स्कूल से लवटनी त ऊ हमरा कीहें धउरि के ना आइल। धीरे धीरे आ दरदीला आवाज में मेमियात आइल। ओकरा मन के दरद हमरा के बेधि गइल। माई खतिर ममता अनबोलता जीवन में भी अदिमिये लेखा होला, हमरा ओही दिने बुझाइल। गोदी में उठा के घरे ले अइनी आ खूब चूमा चाटी कइला के बाद ओकरा के खाए के पतई देनी बाकी ऊ छुअबो ना कइलस। बइठनी त हमरा कान्हा प आपन गरदन चुपचाप राखि देलसि। बड़ी देरी ले ओइसहीं रखले रहि गइल। हम घूमि के ओकर आंखि देखनी। एकदम टूअर वैरागी के भाव। हमरा बुझाइल कि ओकर आंखि हमरा से कहऽ तारी स कि ‘अब त हमार माई मरि गइल। एह दुनियां में हमनी के बाप त होला ना अब त ‘त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव
बन्धु च सख त्वमेव।’ अचानके हम ओकरा के गोदी में लेके खूब कसि के जांति लेनी आ ओकर पूरा देंह सुहुरावे लगनी। अनासे हमार आंखि ओकरा आंखी के बार बार चुम्मा लेबे लागल।’

हम प्रकाश के चेहरा देखे के कोशिस कइनी। बुझाइल कि ऊ धरती प हइये नइखे। खाली खोंखा शरीर बा लेकिन आवाज आकाशवानी लेखा कहीं दोसरा
लोक से आ रहल बा।

‘ओ दिन से मोहन के हम माई-बाप दूनो बनि गइनी। अब ऊ उठे बइठे आ सूते लागल। राति खा धीरे से हमरा बिछवना पर चढ़ि के सूति जाउ। खाए बइठीं त हमरा थरिया में मुंह डालि देउ। हमरा बड़ा नीक लागे बाकी घर के लोग बड़ा खिसियाउ।’

धीरे-धीरे मोहन एक साल के हो गइल। घर के लोग कहे लागल कि ‘बेंचि काहें नइख देत। भर घरे घूमत रहऽता, तहार बिछवना महकत रहऽता, लेंड़ी
लेंड़ी घर भइल रहऽता। घिनावन कइले रह तारऽ घर बिछवना सब्बे। हरे चली का ?’ सुनि के बड़ा बाउर लागे बाकी हमरा पासे जवाबो त ना रहे। सोचे लगनी कि आदमी कतना स्वार्थी होला। बिना स्वार्थ के ऊ केहू से प्रेम भी ना क सके। मोहना से हमार प्रेम बढ़ते चलि गइल, घटल तनिको ना।

मोहना के ले के परिवार में सबसे बिगाड़ हो गइल। जब सुनऽ त ओकरा के बेंचही के बात होखे। हम कवनो हालत में बेंचे के तेयार ना भइनी बाकी टेंसन से परेशन रहे लगनी। पढ़ाई चउपट होखे लागल, परीक्षा कपार प आ गइल। अब हम ऊहापोह में रहे लगनी। एक दिन हम मोहन से पूछनी – ’का हो मोहन, का करीं, तहरा के बेंचि दीं ? अब टेन्सन सहात नइखे।’ मोहन अपना ढंग से जवाब देले। चुपचाप हमरा आंखि का ओर तकले आ आपन गरदन हमरा जांघ प राखि के सूति गइले आ टुकुर-टुकुर ताके लगले। मतलब साफ रहे कि ‘जवन मन करे तवन करऽ हम त अपना के तहरे के संउपि देले बानी।’ पता ना ओ दिन ममता से हमरा आंखि में लोर काहें भरि गइल। हमार हाथ मोहना के पूरे शरीर प फिरे लागल। मोहना निहचिन्त हो के सुति गइल आ हम ओकरा भविष्य खातिर चिन्तित होके बहुत राति तक जागल रहि गइनी।

प्रकाश अचानके चुप हो गइल। हम ओकरा चेहरा प नजर फेरनी। बेचैनी, छपिटाहट, पाप-बोध साफ साफ लउकत रहे। अतना परेशान हम ओकरा के कब्बो ना देखले रहनीं।

”फेरू का भइल प्रकाश ?“ हम धीरे से पूछनी।

“भइल का, जवन होखे के रहे तवन हो गइल। तंग होके छाती प पत्थल राखि के मोहना के बेंचि देनी। खरीदे वाला दू किलोमीटर दूर हमरा रानीगंज बाजार के ए गो कसाई रहे। अपना मोहन के हम कबहूं डंटलहूं ना रहनी आ ऊ कसाई ओकर गर्दन में रसरी बान्हि के घसेटे लागल। मोहना एको डेग आगे ना बढ़ावे। पूरा वजन के साथे खड़े खड़े घसेटात रहे। मोहना घूमि घूमि के हमरा कावर देखे आ मेमियाउ। मन करे कि कसइया के गोली मार दीं।

आधा घण्टा ले हम सुन्न होके खड़ा रहनी। गरमी के दिन रहे। एह आध घण्टा में हम निश्चय कइनी आ रूपया हाथ में ले ले भर जोर बाजारे धउरनी आ कसइया के दोकान प पहुंचनी। हांफते कहनी – ”हई आपन रूपया धरऽ आ हमार खँस्सी द।“

”राउर खस्सी हइका टांगल बा मालिक, कहीं त एमे से थोरकी मांस दे दीं।“

हमार देहिं थर थराए लागल। तारू सूखि गइल। ओकरा ठेहा प देखनी – एक ओर मोहन के छाल धइल रहे, एक जगह चारो गोड़ी आ एक दम आगे ओकर खून से लथपथ मूड़ी। ओकर आंखि हमरे ओर रहे। बुझाव कि ओकर आंखि हमरा से अनेक सवाल करत कहऽ तारी स – ‘तहार जिनिगी संवारे खतिर हम आपन गरदन कटवा देनी, कसइया प मति खिसिया। घरे जा आ शन्ति से सोचिहऽ कि हमार गरदन के काटल, कसइया कि तूं ?’


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

Advertisements