– डा० अमरेन्द्र मिश्र


शेखर के गांजा के इ पहिलका दम रहे। अवरू सब साथी गांजा के दम पचावे आ जोम से मुँह आ नाक से धुँआ निकाले में माहिर हो चुकल रहन। पहिलके दम शेखर तनि जोर से खींच लेले रहले। उनका से बर्दाश्त ना भइल। उनकर माथा चकराए लागल। बाकि उ अपना साथी लोग से कुछ ना कहले। उनका बुझाइल कि साथी लोग मजाक उड़ावे लागी। जब दुसरका राउन्ड में चीलम उनका पास पहुँचल त उ झूठो के दम खींचे के नाटक कइले। ओकरा बाद उ ओहीजे एगो बँसखट पर ओठंघि गइले। नीम के पेड़ से झुर-झुर हवा बहत रहे। शेखर ओहीजे नशा में पड़ल रहि गइले। बाकी साथी लोग उनका के ओहीजे छोड़ के जेने-तेने चलि गइल। जब शेखर के नशा टूटल त देखले कि दिन बहुत ढ़ल गइल बा। घाम मैदान में बहुत दूर भाग गइल बा।

शेखर, रामायनी काका के एकलउता, दुलरुआ बेटा हवे। गाँव के लोग कहेला कि बड़ा पूजा-पाठ करावला के बाद तीन गो लइकी पर उनकर जनम भइल रहे। रामायनी काका के सऊँसे गाँव काका कहेला। अतने ना, शेखरो रामायनीजी के कके कहेले। रामायनी काका के गिनती जवार के एगो प्रतिष्ठित अवरू धनी आदमी में होला। उनका दुआर पर आठ-दस आदमी हमेशा बइठल रही आ कुछ ना कुछ बतकही होते रही। उनकर दुआर हमेशा गुलजारे रही।

शेखर के काका उनका से कहले रहलन कि घूरन कींहा जाइके गाइ के गरदांव बनवा ले अइह, गरदांव टूट गइल बा। अब काका से जाके का कहबि, उनका चिन्ता भइल। अतने ले ना, उनका लागल जे ढ़ेर लोग उनका के गांजा पीअत देख लेले होई। काका से जाइके केहू इ बात कहि ना देले होखे। सांचो, आदमी जब समाज से छुपा के कवनो काम करेला त कतना कमजोर हो जाला। ओकरा हमेशा लागेला कि कहीं केहू देख त नइखे लेले। शेखर लजइले, डेरइले, राह में सब केहू से मुँह चोरवले, पिछवाड़ा के राह से अंगना गइले। अंगना में माई आ फूआ के बात-व्यवहार से उनका बुझाए लागल जे गांजा वाली बात घरे केहू के मालूम नइखे। जब उनकर माई बतवलि कि घूरन आइल रहले हा, गाइ के गरदांव बना के दे गइले हा त शेखर के जीव में जीव पड़ल। लेकिन अबहिंयो उनका लागत रहे कि कहीं गांजा वाली बात काका से केहू कहि ना देले होखे।

शेखर दुआर पर गइले। देखले जे दुआर पर पाँच- छः आदमी बाड़न। रघुवर ठाकुर काका से कुछ बतिआवत बाड़े। शेखर पर जब ठाकुरजी के नजर पड़ल त उ पूछिए त बइठले – ’’का शेखर, तहरा दू-तीन साल एम०ए० पास कइला भइल। अबहीं कहीं नौकरी के ठर-ठेकाना ना लागल? हरखू के लइकवा, अरे, का नाम ह? हँ, मोहन। सुननि हाँ जे ओकर कवनो नीमन नौकरी लाग गइल।’’
शेखर अभीं मुंड़ी गाड़ि के खड़े रहले कि रघुवर ठाकुर के नजर हरखू पर पड़ गइल। उ छवरी धइके कहीं जात रहले। ठाकुरजी उनका के आवाज देके बोला लीहले आ कहले – ’’का हरखू, कहँवा धड़धड़इले चलल जातार? अरे तनि हमनिओ संगे बइठ। सुननी हाँ कि तहरा बड़का लइकवा के नौकरी हो गइल। कहँवा? कौन नौकरी भइल हा?’’
शेखर भीतरे-भीतर कनमनात रहन। भीतरे-भीतर उ ठाकुरजी पर अनसातो रहन। कहाँ से इ बीपत आ के बइठ गइल बाड़े। दाँव देख के उ ओहीजा से घसक गइले।
’’रावा सब के आसीरवाद बा।’’ बड़ा विनम्र भाव से हरखू बोलले।
’’कवनो बैंक में नौकरी मिलल बा। परसो चिठ्ठी आइल हा। अगिला अतवार के मोहन जइहें। मंगल के, महावीरजी के दिने ज्वाइन करे के बा।’’
काका जे अभी तक चुपचाप सुनत रहन, हरखू भगत से पूछले – ’’मोहन के नौकरी कइसे लागल हा? कहीं कौनो सोरस लगवल हा कि कुछ खरच-बरच करे के पड़ल हा?’’
’’ना ए काका, कहीं कुछुओ ना। मोहन परे साल एह नौकरी खातीर इम्तहान देले रहले हा। उ रावा सब के आसीरवाद से पास क गइले। राउर शेखरो त इ इम्तहनवा देले रहले हा, जइसन कि मोहन कहत रहन। उ त अवरू ढ़ेर बात कहत रहले हा, ना जाने झूठ कि सांच।’’ एक सुर में हरखू भगत बोलत चलि गइले।
’’अवरू का बात कहत रहले हा?’’ रामायनी काका बड़ा उत्सुकता से पूछले।
हरखू भगत संकोच में पड़ि गइले। आगे उ कुछ कहल ना चाहत रहन। बाकी रामायनी जी के बार-बार पूछे लगला पर हरखू भगत कहले – ’’मोहन कहत रहले हा कि शेखर भइया त हमरा से एक साल पहिलहिं एम० ए० कइले। हमरा से सब इम्तहान में उनका नम्बरो अधिक मिलल बा। हमरा कवनो इम्तहान में दूसरा दर्जा से ऊपर नइखे मिलल आ शेखर भइया कवनो इम्तहान में पहिला दर्जा से कम नइखन पवले। बाकी कवनो इम्तहान पढ़ि के उ अपना बल पर पास नइखन कइले। साल भर साथी लोग साथे चकल्लस मारत रहले हा आ इम्तहान में चोरी करत रहले हा। साफे किताब खोलि के लिखत रहले हा। केहू के हिम्मत ना पड़त रहे उनका के टोके के। प्रोफेसरो लोग उनका से डेरात रहे। बाकि नौकरी खातीर जवन इम्तहान होला ओह में चोरी के ओइसन दाँव ना लागे। भरसक उ कोशिश कइल चाहेले, बाकि घात ना लाग पावे।’’ अतना कहिके हरखू चुप हो गइले।

रामायनी काका के त बुझाइल जइसे कठिया मार देलस। सन्न हो गइले। बोलिए ना निकले। खाली उहे ना, बाकी सबलोग भी चुप। केहू, केहू से बोलते ना रहे। केहू बोलो त का बोलो।
अतना कहि के हरखू ओहीजा से चल दीहले। रघुवरो ठाकुर उनका पीछे-पीछे चल दीहले। रघुवर ठाकुर त कवनो पढ़ल-लिखल ना रहन बाकि देश-दुनिया में घूमल-फिरल रहन। बाहर-भीतर निकलल रहन। जुग-जमाना देखले रहलन। रास्ता में हरखू भगत के रोकि के कहे लगले – ’’हरखू भाई, एके बेर सब बात एह तरे से ओसाइ के कहि देल हा। इ अच्छा ना भइल हा, ना रामायनी काका खातीर, ना शेखर खातीर। अचक्के में रामायनी काका के दिल के बड़ा धक्का लागल होई। उनका एगो लइका। ओकरा के लेके दिल में कवन-कवन अरमान होई उनका। तहरा अइसे ना बोलल चाहत रहे।‘‘
हरखू के लागल कि अनजाने में उनका से एगो बहुत बड़ गलती हो गइल। उ रोवे लगले।
’’हमरा से सांचो बहुत बड़ गलती हो गइल। अब कवनो उपाय बताव ए ठाकुर भइया जे हमरो मन हलुक होखो। हमरा ना बुझाइल हा। हमरा से कुल्हि कहा गइल हा।’’
’’अच्छा कुछ उपाय होई। चिन्ता मत कर।’’ रघुवर ठाकुर भगत के अश्वासन दीहले। फेरु मने में सोचे लगले – ’अजीब बात बा। कहहूँ वाला परेशान आ सुनहूँ वाला परेशान।’

एने रामायनी काका के दिल पर का बीतल, इ त उहे जानसु। बाकिर उपर से कुछ खास ना बुझाए पावल। काका सिर्फ रामायन के अर्थे ले ना कहत रहन, रामायन के कुल्हि सीख अपना जिनगी में उतार ले ले रहन। एगो रामायन जइसे उनका सब शास्त्र-वेद के ज्ञान करा देले होखे आ जिन्दगी के हर हालत में हालात के सामना करे के ताकत भर देले होखे। हरखू के इ बात सुन के रामायन काका विचलित ना भइले। पहिलहिं अस धीर-गम्भीर रहले।

एक दिन रामायनी काका रघुवर ठाकुर कीहाँ गइले। ओह घरी रघुवर ठाकुर गाय के सानी गोतत रहसु। काका के देखते जल्दी-जल्दी सानी गोतके आ हाथ धो के तड़फड़इले अइले।
’’का काका, कइसे अइल हा। तोहार का सेवा करीं?’’ रघुवर ठाकुर कहले।
’’हम एगो काम से आइल बानी। ओह दिन हरखू के सब बात सुनबे कइल। अब तू तनी शेखर से बतिआव आ उनका के समझाव। हमार हिम्मत नइखे परत कुछ बात करे के। का जाने हमरा कवना बात के उ का माने लगा लीहें। तू समझाव जे अबहीयों से पढ़सु, मेहनत करसु। बिना पढ़ले कुल्हि सर्टिफिकेट जुटवले बाड़े, त ओहसे घर के शोभा ना नु बढ़ी, घर ना नु सजावल जाई।’’
काका के बात काटि के रघुवर ठाकुर कहले – ’’अच्छा इ भार तू हमरा पर छोड़ि द।’’

एने शेखरो के बुझाए लागल जे फर्स्ट डीविजन के सर्टिफिकेटे से नौकरी नइखे मिले वाला। जहँवे जा तारे, इन्टरव्यू में उनकर पोल खुल जाता आ उ खोटा सिक्का अस निकाल बाहर कर दीहल जातारे। उनका सर्टिफिकेट के अतने कीमत बा कि उ कवनो नौकरी के इम्तहान में बइठ सकत बाड़े। ओकरा बाद अपना में योग्यता होखे के चाहीं। इ सब बात अब शेखर समझे-बुझे लगले। एही बीच एक दिन शेखर से रघुवर ठाकुर इहे सब बात डाल दीहले।
’’शेखर, इ बात त साँच बा कि अभी तक पढ़े में तू मन ना लगवल हा। इहो बात साँच बा कि कौनो प्रतियोगिता परीक्षा में बिना पढ़ले काम निकले वाला नइखे आ बिना प्रतियोगिता परीक्षा के कवनो नौकरी मिले वाला नइखे। हमार राय जो मान त फेर से पढ़। अबकी सर्टिफिकेट खातीर ना, साँचो के पढ़े खातीर। साल भर, छः महीना जमके पढ़, मिहनत कर। साल, छः महीना एह लम्बा जिनगी में कुछ नइखे। तीन साल से त तू नौकरी खातीर कहाँ-कहाँ नु मारल चलल। ना पढ़ला के नतीजा त देख लीहल नु। अब तनि पढ़ के नतीजा देख ल। कहल मान हमार।’’
शेखर जे बीच-बीच में अबहीं ले सिसकत रहलन, रघुवर ठाकुर के बात खतम भइला पर भोंकार पार के रोवे लगले। अपना गलती के एहसास उनका खूब बढ़ियां से हो गइल। उ रघुवर काका से लपटा गइले आ सुसकते-सुसकत कहले – ’’चाचा, हम ना समझनि हाँ। अपने के हम धोखा दीहनी अबतक। हम कवनो लायक ना रहनी।’’
रघुवर ठाकुर उनका के हिम्मत बँधवले आ कहले – ’’बबुआ, हिम्मत मत हार। जवन भइल तवन भूल जा। अब नया जोश से पढ़ाई में जुट जा। परीक्षा के तैयारी कर। भगवान सब ठीक करीहें।’’
’’से त ठीक बा, चाचा। बाकि अब हम काका पर बोझ नइखीं बनल चाहत। उनका से अब पटना रहे खातीर खरचा नइखीं मांगल चाहत। उनका के अब हम मुँह देखावे लायक नइखीं रह गइल। कतना बड़ अरमान हमरा से पाल के उ रखले रहन। हम सब पर पानी फेर देनी।‘‘
’’तू अइसन काँहे सोचत बाड़? अइसे मत सोच। तू सिर्फ पढ़े पर ध्यान द। काका खातीर तहरा के छोड़ि के, के बा? इ समुझ जे इ बात हम नइखीं कहत, तहार काका कहतारे।’’ रघुवर ठाकुर आश्वासन दीहले।

सचमुच शेखर ओही दिन से बदल गइले। उनकर हताशा वाली भावना गायब हो गइल। उनका मन में आत्मविश्वास जाग गइल। ठान लिहले कि हमरा कुछ करे के बा। साँचो, आदमी ठान ले त दशरथ माँझी अस अकेले पहाड़ काट के रास्ता बना ले। उनकर पुरनका साथी सब छूट गइले। उ अब मन लगा के पढ़े लगले। बैंक के पी० ओ० के इम्तहान खातीर उ जी-जान से जुट गइले। एक साल उ पूरा मन लगा के तैयारी कइले। उ अब जान गइल रहलन कि आधा मन से कइल काम के सफल होखे के कवनो गारन्टी ना होखे आ पूरा मन से कइल काम के सफल होखे में कवनो शंका ना रहे।

गाँव के लोग डेढ़-दू साल बाद इ सुनल कि शेखर बैंक में अफसर हो गइले। अतने ले ना, पूरा राज्य में उनकर स्थान तीसरा बा। काका के दरवाजा पर गाँव के लोग के तांता लागि गइल, काका के बधाई देबे खातीर आ काका से मिठाई खाये खातीर। काका के त खुशी के ठिकाना ना रहे। बड़ा अहगरि के कहले – ’’ए रघुवर, आजु हमहुँ अफसर के बाप बन गइनि हो। हमार शेखरवा अफसर हो गइले हो।’’

गाँव के नवजवान विद्यार्थी लोग सांझि के शेखर से मिले आइल। ओहू लोग में शेखरे का तरह बने के लालसा पनपल। शेखर एके बात कहले ओह लोग से, बलुक समझवले – ’’अगर तहनी लोग जीवन में कुछ बनल चाहतार त मन लगा के पढ़। एकर कवनो विकल्प नइखे। पढ़ल कबो बेकार ना जाला। नाजायज तरीका से, चोरी से नम्बर लेआ देला से कवनो फायदा नइखे। उ त अपने आप के ठगल बा। सोचे के बात बा कि अइसे कइला से आखिर के ठगाता।’’

सब विद्यार्थी लोग मन में एह संकल्प के साथ उनका से विदा लीहल कि उहो लोग अब मन लगा के पढ़ी आ जीवन में जवने लक्ष्य तय करी, ओकरा खतीर पूरा मन और विश्वास के साथ लागि जाई।


डा० अमरेन्द्र मिश्र : एक संक्षिप्त परिचय
17 जुलाई,1950 के जन्म। गाँव – सोनवर्षा, थाना – शाहपुर, जिला – भोजपुर (बिहार)।
बेयालिस बरिस सांख्यिकी में शिक्षण कइला के बाद पटना विश्वविद्यालय से 2015 में सेवानिवृत। शिक्षण के अलावे पटना विश्वविद्यालय में निदेशक, दूर शिक्षा निदेशालय; अध्यक्ष, सांख्यिकी विभाग; निदेशक, जनसंख्या शोध केन्द्र; निदेशक, एकेडेमिक स्टाफ कालेज; संकायाध्यक्ष, विज्ञान संकाय आदि अनेक पदन पर योगदान। 2011 में ‘बेस्ट टीचर अवार्ड‘ से सम्मानित। आकाशवाणी, पटना से अनेके भोजपुरी कहानी के प्रसारण। कविता संग्रह ‘अंजुरी भर मेरी भी‘ अवरू एक भोजपुरी कहानी संग्रह ‘आखिर के ठगाता‘ प्रकाशित।

वर्तमान पता – प्रेमचन्द पथ, राजेन्द्र नगर, पटना- 800016
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ईमेल- mishraamar@rediffmail.com

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