Dr.Ashok Dvivedi

– डा॰अशोक द्विवेदी

जाड़े ठिठुरत, गांव के लोग, सांझि होते आड़-अलोत दुआर-मड़ई भा कउड़-बोरसी धऽ लेला. जे जहां बा, आ जइसे, सांझि के देंहि चीरत-सितलहरी आ घोरियावत कुहेस का डरे, आड़-अलम तक पहुंचे के तेजी मे रहेला. खाए के जौन दू चार कौर गरम-सेराइल मिलल तौन बहुत बा, पुअरा क पहल आ कमरा-रजाई-चदरा, ओकरा मन के घोरमाठा करे लगेला. ओह दिन, जहिया गया सिंह के परलोक सिधारला के खबर रात खा नौ बजे जहॉ ले पहुँचल, आड़-अलोत, मड़ई-घर कउड़ा-बोरसी का लगे बइठल लोग, आपन-आपन चद्दर, कमरा सरिहावत गयासिंह का दुआरे फरज-अदायगी में पुछारि करे जरूर पहुंचल. तय इहे भइल कि फजिरहीं परवाहि होई त, जेकरा जाये के रहे, ऊ ओही बेरा आपन सुइटर, मफलर, गमछी कोट-जाकिट सरिहा लिहल.

जाड़ कहे कि हमहीं रहब आ लोग कहे कि चाहे जौन होखे होत फजीरे निकल जाए के. गया सिंह का दुआर पर उनकर बड़का लड़िका बड़का कउड़ फुंकवा देले रहलन. ओही में गोंइठा-लकड़ी कुल्हि सुनुगत-जरत रहे. ट्रैक्टर दुआर पर खड़ा क के ओप्पर लकड़ी-गोंइठा लदात रहे. पाला का मारे गोड़-हाथ सुन्न होखे त लोग भागि के आगि का लगे बइठि जाव आ हाथगोड़ गरमा लेव. ओ बेरा आगि का लग से टकसे के हिम्मतो केहू का ना रहे.

चार-पांच बजत रहे, जब ट्रैक्टर गांव से बहरियाइल. बाकिर कुहेस आ सितलहरी का मारे बुझात रहे कि अबही राते बा. ई हाल रहे कि टिकठी चढ़ावत खा, मुंह से ‘‘राम नाम सत्त’’ निकाले में, जइसे जड़वा भितरी पइठि जाई, लोग मंहटियावत-कसरियात रहे. ट्रैक्टर का हड़हड़ाहट में ‘राम नाम’ क सुर एकदमे दबि गइल. चदरा-गमछा के, के कहो, टोपी, मफलर कमरा ले बरफ बन जात रहे. नाक कान मुंह बान्हि के, लोग ट्रैक्टर पर गोलियाइल रहे.

बूढ़ तिलकू, अंगौछी से कस के मुंह बान्हे के पहिले उदास-बफहरा छोड़लन, ‘‘मलिकार के मुवल सुनते हमार परान सूखि गउवे, अधनिनिये कम्मर ओढ़ले, ओही, बेरा टीबुल बन क के दुआरे पर पहुंचुवीं त छोटका मलिकार आगि का लगे कुरूसी डालि के बइठल मिलुवन. जान जा भइया कि ओही बेरा से, ओह आगि का दम प, फजीरे ले बइठले रहि गउवीं. ’’ ऊ जैराम से अउर सटि गउवन.

‘ आ रामकरन कहां रहुवन?’ जैराम चद्दर से अपना के कसत पुछुवन.
‘ ऊ लोग बांस कटवावे आ टिकठी तेयार करावे में लागि गउवे लोग. कूल्हि कइला-धइला का बाद में ऊहो लोग आगी किहां गोलिया गउवे. ’
‘‘कुछ कहऽए बाबू अगर चइली-गोइंठा आ पुअरा ना रहित त राती खा के जाड़ कई जाना के ले बीतित.’’ बूढ़ जुगराती अपना झरल कम्मर में से मुंह निकालत, जाड़े असहाय भइल, अपना हालत के बयान करे क कोसिस करुवन.

गुजराती, तिलकू आ जैराम, बाबू गया सिंह के पुरान अदिमी-जन रहे लोग. तिलकू उनकर खास हरवाहे रहलन. ट्रैक्टर-जुग में हर -फार हेंगा-जुआठ त बन्न हो गइल, बाकि तिलकू बाबू साहेब क टीबुल अगोरला आ खेती-बारी के फुटकर काम अजुओ निबाहते बाड़न. निबाहे के ना रहित त हे जानलेवा ठार में आ हे बुढ़ारी में, ए बेरा उनुका निकले के हऽ?

गंगा-घाट का ओर जाए वाला कच्चा रास्ता पर ट्रैक्टर उतरते, ऊंच-नीच गड़हा में हिचकोला मारे लगुवे. नवहा लइका, जेवन पहिले लकड़ी का गांठ पर बइठल रहुवन स, हाबा काबा आ पहिराव-ओढ़ाव सम्हारत नीचे उतरि गउवन. स आ नीच बइठल-लोगन मे आके घुसरे अँड़से लगुवन स. जाड़े उन्हन क दसा देखे जोग रहवे. हरियराइल गेहूँ, जौ, मटर, मसुरी का ऊपर भूवर पहाड़ अस लदाइल कुहेस के फारत, ट्रैक्टर घाट का ओर बढ़ल जात रहुवे. ओकरा अंजोरे से राह सूझत रहे, ना त बिगहा भर फरका क चीझु लउकतो ना रहे. टेक्टर का अॅजोर मे बस राह के लीखि भर लउके.

‘का धकियावत बाड़ऽ जा ए बाबू? अतना सुइटर, कोट, मफलर आ टोपी का बादो तोहन लोग के जाड़ा लागऽता. पता ना घाट ले पहुंचत पहुंचत तोहन लोग के हाल का होई?’ जैराम जुगराती का ओरी घुसुकत बोलुअन. जुगराती अभागत अस दांत चियार दिहुवन. उनका आंख-नाक से लगातार बहत पानी, उनका बूढ़-झुरियाइल चेहरा प जाड़ के कोप के साफे झलक देखावत रहुवे.

‘‘बुढ़ापो अजीब चीजु हऽ. ऊ धनी-गरीब ना चीन्हे. ओसहीं जाड़ो बा, ओकरो लगे धनी-गरीब के भेद नइखे. बलुक ससुरा लड़िके-बूढ़ प पहिले धावा बोलेला. ना त गया सिंह नियर, सुविधा संपन्न टांठ आदिमी जवन अभी काल्हु ले बोलत-बतियावत, डांटत-पोल्हावत खेत में घूमे चलि गइल रहुवन, आज अचके जाड़ का एक्के झटका में ना चल जइतन.’’ रामलखन सिंह आपन चुप्पी तूरत, सधुआइल-मुंह बनावत कहुवन. जाड़ क डर उनका भर्राइल आवाज से साफ झलकत रहुवे.

बुझावनपुर का मोड़ से घाट का ओर जाए के रस्ता रहे. ओइजा पकड़ी का फेंड़ तर आगी जराइ के दू तीन लोग बइठल रहे. गंगा के अरार से हटि के एह उंचाह मैदान में बसल बुझावनपुर गांव में जादातर लोग बीने, मलाह रहे आ दू चार घर चउधरी रहे लोग.

ट्रैक्टर नदी का अरार पर घरघरा के खाड़ भइल, त सब कपड़ा-लत्ता सइहारत जल्दी-जल्दी नीचे उतरे लागल. नीचे दू गो घाट रहे. नहाये वाला दहिने आ परवाहि वाला बांया ओर थोड़िकी दूर. आगा एगो पुरइंठ पीपर के पेड़ तर आगी जराइ के दूइ-तीन गोड़ा बइठल रहलन स. जब बबुआन क टिकठी ट्रैक्टर से उतराये लागल त ओमे से एक ठउरा दउड़त आइल. बुझला डोम रहे. ऊ हाली-हाली नीचे उतरि के पहिलही लासि जरावे खातिर जगह साफ करे लागल.

ट्रैक्टर से लकड़ी गोइंठा उतराये लागल. तिलकू, जैराम आ गांव क दूसर लोग मदद करे लागल. नीचे छोट-मोट टोटरम का बाद चिता सजा के बाबू साहब सुता दिहल गइल. उनकर बड़ लड़िका मुंहे आगि दिहलन फेरू चारू ओर घीव गिरावत आगि लहका दिहल गइल. बाबू साहब जबले जरत रहलन लोग एकोरा खड़ा होके उनके जरत देखत रहे. कुछ लोग उनका बारे में सोचतो रहे.

जे हिम्मती रहे ऊ नहाए वाला घाट का ओर नहाइल. केहू हाथ गोड़ धोवल, केहु कपार आ देहिं पर गंगाजल छिरिक के हाथ जोड़ल. ओह लोग के ऊपर चढ़े का पहिलहीं एगो दोसर ट्रैक्टर हड़हड़ात आ पहुंचल. ऊपर पहुंचते फेरू जाड़ से देहि थरथराये लागल. दुसरका ट्रैक्टर के लोग ‘राम नाम सत्त है’ कहत हाली हाली नीचे उतरि गइल. ओ लोगन के, लासि गंगा जी में बहवावे के जल्दी रहे.

बाबू साहेब का ट्रैक्टर से ड्राइवर गायब रहे. कुछ लोग एने ओने निगाह दउरावत भुनुकल, सरवा केने चल गइल? हो पिपरा तर आगी नइखे नू तापत? छोटका मलिकार नहइले आ, ऊनी चदरा ओढ़ले रहलन, तबो कांपत रहलन. उनकर लइका गरमाइले तिलकू-जैराम के इसारा कइलस-दउरि के देखऽजा आके, देखत नइखऽजा कि जाड़ बढ़ते जाता.’

ड्राइवर सचहूं आगी तापत रहे. तिलकू आ जैराम के निगिचा आवत देखते, जोर से बोलल, हइ सरवा मुर्दा जरावे वाला लकड़िया लिया के तापत बाड़े स आ हइ करीमना स्साला कहत बा कि तोहन लोग का हटते हऊ जरत बुझात लकड़ियों में घींचि ले आइबि जा तापे खातिर. ’’

तिलकू समझवलन, ‘‘छोड़ऽ मरदे लइका हवन स. चलऽ मलिकार नाराज होत बाड़न. जाड़ का मारे सबकर हालत खराब होता. तूँ जल्दी चलऽ.’’

आगी में दोसर लुवाठी डालत करीमना हंसल, ‘‘तोहन लोग के बुझाता न सितलहरी! हिनिका के नइखे बुझात. जाये वाला त चल गइल, जे बा ओके त जिये के अलम चाहीं. आ हमहन खातिर त ई अगिये न बा. जवना के तोहनो लोग बेर-बागर तापि लेत बाड़ऽजा, हुँह, मुरूदा क लकड़ी……’’ ऊ ब्यंग भरल हंसी हंसल. फेर भुसुराइल इहवां अइलो पर नइखे बुझात…. आगि त आगिये हऽ. हमहन एही मे आलू आ कन्ना भून के खा लेनी सऽ.

लाल दहकत आगि देखते तिलकू के मन कइल कि ऊहो दउर के अगिये का लगे बइठि जासु. नोह करिया होखल जात रहे आ अंगुरी सुन्न. लड़िकवा ठीके कहत बा, हइसन ठार में जीऊ बचावे खातिर आगिये नु बा इन्हनी का पास. आगी त आगी हऽ चाहे मुर्दा जरावे, चाहे खाना पकावे. फेरू ट्रैक्टर प बइठल जाड़े काँपत लोगन के इयाद आइल आ आगि का लगे जाए क विचार दबि गइल. तिलकू फेर ड्राइवर के टोकलन, ‘‘अरे चलबऽ कि जाके उनहीं के भेजीं!’’ ड्राइवर असकतियाते आगी का लग से उठल आ देहिं के चद्दर झारे लागल. रामकरन पारा-पारी आपन गोड़ सेंकत कहलन आ ‘‘जा न तिलकू भाई तनी तूहऊँ हाथवा सेंकि लऽ, दू मिनट में कवन पहाड़ टूटि जाई?’’

अब जल्दी चलबऽजा ! का जाने मलिकार केतना नाराज होत होइहें. ’’ तिलकू धिरवलन आ पाछा घूमि के फलगरे अरार पर खड़ा ट्रैक्टर का ओर चल दिहलन. सांच पूछऽत ऊ अपना पाछा आवत ड्राइवर आ रामकरन का बहाने अपना मनवे के धिरावत, ललकरूवन जवन जरत लहकल आगि देख के, ओके तनिकी ताप लेबे खातिर ललचा गइल रहुवे.


टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

कुछ त कहीं...

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