Prabhakar Pandey

– प्रभाकर पाण्डेय “गोपालपुरिया”

रातिभर दुनु परानी सुति ना पउवींजा. करवट बदलत अउर एन्ने-ओन्ने के बाति करत कब बिहान हो गउए, पते ना चलुवे. सबेरे उठते मलिकाइन चाय बना के ले अउवी अउर कहुवी की जल्दी से तइयार होके आफिस चलि जाईं. हम कहुँवी की अरे आफिस त 9 बजे खुली, अबे साते बजे आफिस जाके का करबि. गेटे पर बइठि के माछी मारबि का?

हमार इ बाति सुनि के मलिकाइन कहली की रउरों कुछु बुझाला ना. आरे आजु पहिली तारीख ह नु जी. अबेर क के जाइबि त पता ना तनखाह मिली की ना. हम कहनीं की अबेर से जाईं जाहें सबेर से, तनखाह त मिलबे करी. हमरी एतना कहते मलिकाइन खुश हो गइली अउर कहली – त तनि आफिस से आजु जल्दिए लवटबि अउर हमरा खातिर एगो झुल्ला ले ले आइबि. महीनन से हमार झुल्ला फाटि गइल बा अउर लइकवो गाड़ उघाड़े घुमऽता. अउर हाँ, आवत साथे दुकानदारो के हिसाब-किताब कइले आइबि. दु महीना से उनकर हिसाब नइखे दिआइल. अबहिन मलिकाइन एतना कहते बारी तवले कहिं माइयो खाँसत चलि आइल, अउर कहलसि की बाबू पइसा बँची त तनि खाँसी के दवाई ले ले अइहऽ. खाँसत-खाँसत लागऽता की परान निकलि जाई.

नहा-धोके हनुमानजी के अगरबत्ती देखवले की बाद हम आफिस खातिर निकलनी. अबहिन दुआरी के ज्यों बाहर अइनी तवले कहीं मकानमालिको भेंटा गइने. हमके देखते मकानमालिक कहि बइठने की मुकुरधुनलाल, ए महीना में किराया बढ़ा के दिहऽ नाहीं त दुसर रुम खोजि लिहऽ. हम कुछ किराया बढ़ावल सँकारि के आफिस की ओर चलि देहनी.

आफिस में पहुँचि के हम आपन तनखाह लेबे खातिर बड़े बाबू की लगे गइनी त बड़े बाबू हमके एगो लिफाफा पकड़ा देहने अउर एगो कागज पर साइन करा लेहने. जब हम लिफाफा खोलनी त ओमे 6 हजार 5 सौ 45 रुपया रहे. रूपया के बार-बार गिनले की बाद हम बड़ेबाबू से पुछनि की बड़ेबाबू ए बेरी त तनखाह जेतना मिले के चाहीं ओसे 3 हजार कमे बा. पिछला महीना में त हम बहुत ओटिओ-सोटी कइले रहनीं. बड़ेबाबू हँसने अउर कहने की मुकुरधुनलाल पिछला महीना में अपनी लइकी के सादी खातिर जवन तूँ पचास हजार रूपया के कर्ज खातिर आवेदन कइले रहलऽ उ पास हो गइल बा अउर एक-दू दिन में मिल जाई पर हाँ एही महीना से ओ कर्ज के भरे खातिर दु-दु हजार रुपया हर महीना तहरी तनखाह से कटल सुरु हो गइल बा. अउर हाँ पिछला महीना में जवन तूँ 1 हजार रूपया हमसे उधार लेले रहलऽ अपनी लइका के दवाई खातिर हम उहो काटि ले ले बानी.

खैर पइसा भरल उ लिफाफा ले के हम अपनी सीटे पर जा के बइठि गइनी अउर अपनी पाकिट में से कुछ पुरजा निकलनी. एगो पुरजा में लइकिनी की सादी में खरच होखेवाला हिसाब रहे जवने में कुल टोटल नीचे 1 लाख 35 हजार लिखल रहे. ओ पुरजा के निकालि के हम अलगे ध देहनी अउर दुसर पुरजा निकलनी जवने में कुछ और हिसाब-किताब रहे. उहो लगभग 7-8 सौ के खरच रहे. ओ बेरा हमरी दिमागे में बहुत कुछ चलत रहे. हम सोंचत रहनि की दिकिर-सीकिर हमार काम त चलते रहल हऽ ए पहिली तारीख की अइले बिना कवन आकाज रहल ह.

साझीखान आफिस से निकलले की बाद हम सीधे राशन की दोकानि पर गइनी अउर दुकानदार से कहनी की तोहार हिसाब-किताब हम अगिला महीना पूरा बराबर क देइबि अबहिन तूँ हई तीन हजार रूपया रखि ल. दुकानदार तनि-मनि नाकुर-नुकुर कइले की बाद उ तीन हजार रूपया रखि लेहलसि. फेर हम मकानमालिक से मिली के 2500 रूपया दे देहनि पर मकानमालिक के इ धमकी मिलल कि अगिला महीना से हमके अगर 3000 ना देबऽ त दूसर ठौर-ठिकाना खोजि लिहऽ.

अपनी भागि पर हँसत हम घरे पहुँचनि अउर एक हजार रूपया मलिकाइन की हाथ पर धरते कहनी की तूँ अपना खातिर एगो झुल्ला ले लिह अउर माई खातिर दवाई. अउर हाँ तनि आपन हाथ रोकि के खरच करिहऽ काहें कि बाकी पइसा में पूरा महीना साग-भाजी, दवा-बिरो के काम चलावे के बा. हमरी एतना कहते मलिकाइन कहलि की का अबहिन लइकवा गाड़उघाड़े घुमी? हम कहनी अबहिन ओकर उमिरिए का बा. सातो बरिस त नइखे. हमनीजान त 12 बरिस ले एगो भगई पहिनी के काम चला लेहनी जाँ.

एतना सब कइले-धइले की बाद हम अपनी पाकिट में हाथ डालि के बाकी बँचल 45 रूपया के कस के मुट्ठी में पकड़ि लेहनी अउर सोंचनी.. ए में त हम खूब आराम से महीना भरि अपनी चाय-पान के काम चलाइए लेइबि अउर हम फेन से निकालि के ओ पइसा के गिने लगनी, अरे इ का इ त 45गो ना पनरहे गो बा. काफी दिमाग पर जोर देहले की बाद हमार चेहरा खुशी से दमक उठल जब हमरि दिमागे में आइल की आफिस से निकलत समय एगो जरूरतमंद पुरनिया मेहरारू के हम 30 रूपया दे देले रहुवीं जवन हमरी आफिसे की सामने भुजा-भरी के छोट-मोट दोकानि चलाके आपन पेट भरेले.

आज राति हम दुनु परानी फेन से ना सुति पवनी जाँ एही सोंच-विचार में कि इ पहिली तारिख त बीती गइल अब अगिलका पहिली तारीख फेनु कब आई…


प्रभाकर गोपलापुरिया के पहिले प्रकाशित रचना


प्रभाकर पाण्डेय
हिंदी अधिकारी, सी-डैक पुणे
पुणे विश्वविद्यालय परिसर, गणेशखिंड,
पुणे- 411007, भारत

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