– रामजीत राम

भोजपुरिया अमन के संपादक प्रकाशक डा॰ जनार्दन सिंह (दाढ़ी में)

भोजपुरिया अमन के संपादक प्रकाशक डा॰ जनार्दन सिंह (दाढ़ी में)


बेटा के आदमी बनावे के तइयारी बड़ा जोर से बा कि बेटा के पढ़ाइब आ आदमी बनाइब. आजु आदमी के अरथ बदल गइल बा. इ देखि के कि आदमी बने आ बनावे के कला एतना तेज हो गइल बा कि डर लागता. एह तुफान के आवेश में सब मर्यादो टूटे ला आकुल बा.

मन में एगो आस जागल कि समाज में पढ़ल लिखल लोगन के संख्या दिन पर दिन बढ़ऽता. एहसे समाज में फइलल अंधविश्वास आ मन के सकेतापन में कमी आई. बाकि होत बा ठीक उल्टा. आदमी में जलन, लोभ-स्वार्थ, दुराव, अहंकार आपन जड़ फइलावते जा ता. एह समय अब इहे कहल जा सकेला कि आदमी बनल बड़ा मुसकील काम बा. बाजारो भाव इहे कहऽता कि आप कठपुतली बन के आगे-पीछे घूमत रहीं, दांत निपोरत रहीं, गाल बजावत रही आ हंसे ठीक से ना आवे त हिहियात रहीं. ताकि आपन छाव-भाव आ खेती बनल रहे. अपना पढ़ला-लिखला के अभिमान में सब करम उलट होता. गुण धरम त बुझाते नइखे. पढ़ला-लिखला से त बढ़िया अनपढ़ आ गंवार बाड़न जिनका अक्षर भले ना चिन्हे आवे बाकी आदमी के बुनियादी सकल चीन्ह लेत बाड़न.

गाँव-गँवार, खेती-बारी, गाय-भईंस, बैल-बकरी, मुरूगा-मुरगी, जिया-जन्तु आदि से भरल स्वर्ग कहल जात रहे. आज के दिन में इ स्वर्ग सपना जइसन बुझात बा. अइसे त आज लोगन के मन में अइसन सपना आ जाव त इहे समझ में आवेला कि दिन अच्छा ना बीती. काहें कि मन अब उपर के हाव-भाव, आकर्षण के गुलाम बन गइल बा. जीभ के, कान के, नाक के, आंख के चौबीसों घंटा सवाद चाहीं. सवाद नइखे त जिनिगी बेकार बा. जिनिगी बटले कहां बा! गुलाम आ जिनिगी दुनों एक साथ चलिये ना सकेला. जिये के नाम जिनिगी ह, आ, तिल-तिल कुहुकत, घसीटाइल अउरी करेजा छलनी गुलामी ह.

आज देखला पर लागऽता कि उहे गंउवा फेकरत बा बाकि केहू के सुनातो नइखे. फेकरत-फेकरत बेतहासा गिरि के बेहोस पड़ल बा. चूल्लू भर पानी केहू देबे वाला नइखे कि चुल्लू भर पानी से ओकर प्राण आ जाव. आदरणीय कवि श्री चन्द्रकांत जी के कविता से लोगन के इ पता जरूर चली जाई कि गांव का रहल आ आजु का बा –

घीउवा के दीयना जरेला नाहीं अंगना,
दूबिया अछत ना देखाय.
शंख ना सुनाई देले बाबा के मन्दिरवा
पोथी पतरा गइले हेराय.
तुलसी के चउर पर चउरा देखाला नाहीं,
संझिया ना दीयना बराय.
अब नाहीं गंगा के होखेला पुजनियां,
महबर पियरी रंगाय.
अब त मुरेखा पर उचरे ना कागा,
अंगना ना गोबरा धोआय.
टप-टप अंखिया से टपके ना अंसुआ,
अब ना पिरीतिया नहाय.
नाचे परजुनिया ना तीज त्योहारवा,
डफला-नगड़वा बजाय.
बाजे ना जनमवाँ पे फूले के थरियवा,
सोहर लाचारी ना गवाय.
लोढ़वा से अब नाही होखे परिछनवां,
सीलिया ना घरवा पुजाय.
मड़वा धवाला नाहीं चउका पुराला नाहीं,
खिचड़ी पे वर ना कोहाय.
अब रजमतिया उचारे ना सगुनवा,
गोबरा के गउरा बनाय.
अइसन बिकसवा के अन्हिया बहल देखा,
सब कुछ गइले उधियाय.

गांव का रहल उपर दिहल कविता से जरुर मोटा-मोटी अनुमान लगबे करी बाकि आजु गांव का बा इ बात के समुझल आ बुझल बड़ा उलझन भरल सवाल बा. एह उलझन में लोग उलझि के उलझते जात बाड़न. सुलझे बाला चिन्ता आ सोच बहुत दूर भाग गइल बा. हँ! दिमाग जवना के बुद्धि कहल जा ता उ हर आदमी में बड़ा तेज हो गइल बा. लोग गुणा-भाग, जोड़-घटना, पहिले अंगुरी पर आ जमीनी पर खांच-खांच के करत रहल ह लेकिन अब उहो बात नइखे. जमाना के मुताबिक लोगन के पतो नइखे चलत मन ही में सब हिसाब बड़ा ठीक हो जाता. एह पर लोग अगरातो बा कि फलनवा के दिमाग बड़ा तेज बा.

अदमी हंसत रहलन ह त करेजा चेहरा पर साफ-झलकत रहल ह. अब अदमी ना आदमी जब से भइल बाड़न त उनकर हंसी देखला पर इहे बुझाला कि उनकर करेजा अंतड़ी में जाके समा गइल होई. भोला-भाला आदमी आपन करम करे आ निभावे में जांगर ठेठावत थाकत ना रहलन. सरधा अउरी विश्वास भगवान के नियम आ अनुशासन मान के पूजा करत रहलन ह कि कहीं चूक होई त भगवान के दण्ड भोगे के परी. आदमी, गांव-गंवार-माटी के ओढ़ी के आपन जिनिगी रोग-शोक से दूर चलत-फिरत, उठत-बइठत, हंसत-खेलत बितवलन. अब अदमी में कुछ के थोड़-थोड़ बुद्धि जागे लागल त बुद्धिमान कहाये लगलें. जेकरा के आज चतुर कहल जा ता. चतुर आदमी बन गइलन. कभी चतुर आदमी, कभी चटुर आदमी बनिके आदमी आदमी के आदमी बनावे के ठीका लेबे लगलें आ ठीका फलत-फूलत बा आ आदमीओ आदमी बने में सफल होत चल जात बा.

हमरा मन में एगो सवाल बार-बार जागऽता बाकि समझ में आवत नइखे. अदमी से आदमी भइलन त इ बुझाता कि एगो मात्रा बढ़ी भइल माने कि एह में कुछ परिवर्तन देखाता. बाकी आदमी से आदमी बनला में कवनो मात्रा बढ़ल ना, त परिवर्तनो ना भइल. यानी ठहर के ठहरे रह गइल. इहे हमरा समुझ के बहरा बा.
अदमी रेह से देह धोवत रहल ह त नेह सीसा अइसन साफ-साफ देखाई देत रहल ह. आ ओही रेहे से राह बनत रहल ह जवना राह में आह-वाह के मिलन से राह सिकुड़ी के छोटा हो जात रहल ह आ अदमी कोसो दूर जाके चली आवत रहलन. जब ठेगुरीं पर बुढ़ा लोग चलत रहलन त उहे राह सरमा जात रहल ह. आज उहे राह के अब रास्ता कहीं, रोड कहीं, हाइवे कहीं, ग्रान्ड टंक रोड कहीं, जवन-जवन नाम दुनिया में दिखाई दे दे उहे कह लीं. जब जवान लोग माने कि आदमी लोग चलऽताड़न त लागता कि उहे, राह सीना-तानी के खड़ा बा आ आदमी लोग पसीना से तर ब तर होके कुकुर नियर हाफऽताड़न. आदमी लोग के आंखि के सामने अन्हरिया छा जाता, लउकत नइखे. देहि गन-गन नाचऽता, होठ पर फेफरी परल बा, आंख-ताख निकल गइल बा आ राह पर छितराइल बेतहासा पड़ल बाड़न. आदमी देखिके किनारे से चली जाताड़न. साहस नइखे होत कि ओह बेचारा के चुलू भर पानी पिआ के होस दिलाई जेहसे ओकरा जान में जान मिलो.

एकरा बादो हमरा नइखे बुझात कि आदमी से आदमी बने में केतना परिवर्तन भइल बा आ केतना फायदा मिलल. बाकि आदमी समाज से हमार चिरउरी बा, विनिती बा, हाथजोरी बा कि रउवा सभे के जरूर समझ में आवत होई काहें कि आदमी से आदमी बनल बानीं त राउर बड़कपन के माने बा. ओहि मान के बना के राखलो राउर धरम बनऽता.


(भोजपुरिया अमन पत्रिका के सितम्बर से नवम्बर 2013 के अंक से )

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