Dr.Ashok Dvivedi

– डा॰अशोक द्विवेदी

अबले जवन पढ़नी तवना से आगा
गाड़ी में मोटरी-गठरी लेले पनवा, बीरा का बगल में बइठल रहे. ओकरा भीतर एगो नया सँसार के सपना कुनमुनात रहे. बीरा ओ सपना से अलग कुछ दूसरे सोचत रहलन. उनका दिमाग में गाँव-जवार के उपहास आ अपमान घुमरियात रहे. ऊ सोचत रहलन…….. चउधुर के ए बेरा ना त सबेरे जरूर मालूम हो जाई. अब त गाँव में उनकर मुँह देखावल दुसवार हो जाई. गवना करावे आइल पनवा के ससुर एको पद ना छोड़िहें चउधुर के. लोग कवन-कवन बोल ना बोली.

“का सोचऽतारऽ?” पनवा उनका के टोकलस. बीरा चिहुँकलन, बाकिर उनका मन के व्याकुलता कम ना भइल. “किछउ ना…” बीरा आपन आँख बन क के कपार सीट से टेका लिहलन. पनवा उनका देहि पर ओलरि गइल. मादक-स्पर्श के गुदगुदी में बीरा के कूल्हि चिन्ता-फिकिर गायब होखे लागल.

गुदगुदी जब रुकल त भविष्य के उदवेग लेसि दिहलस. बीरा फेर आँख खोलि के छत के घुइरे लगलन. उनका अपना ओह संघतिया पर पूरा भरोसा रहे जवन आसाम रहे. ओही का अलम पर ऊ ओइजा पयान बन्हले रहलन. ओकर पता उनका पाकिट में चिंगुराइल परल रहे. पनवा साइत उंघाइ गइल. बीरा एक हाली ओकरा अचरजकारी मोक आ निश्छल सुघराई के निहरलन. ओकर मुँह लरुवा गइल रहे. बीरा का मन में प्यार उमड़ल आ लमहर सांस बनि के निकल गइल….. “बेचारी थाकि गइल बिया”. ऊ सोचलन, आ ओकरा ओलरल देहि के अपना कान्ही प सम्हार लिहलन.

आसाम कवनो नियरा थोरे रहे. रात से सबेर भइल आ सबेर से रात. एह बीचे भविष्य का ओह अनिश्चित अन्हार में बीरा के एक मात्र अलम उनका संघतिया के “पता” उनका साथे रहे. पनवा खातिर जेवन कुछ रहे, पहिलहीं से बीरा पर निछावर रहे. एह परदेश यात्रा में छुइ मुई बनल, मोटरी लेले उनका पाछा-पाछा चले त ढेर लोगन के नजरि बिछिल जाव. गँवई सुघराई आ सादगी में सँवरल देहिं पर आँखि गड़कि जा स. बाकिर बीरा के सुगठित सरीरि देखि के केहू के हिम्मत ना परे. एगो स्टेशन पर दुइ गो सिपाही बीरा के धइलन सऽ, बाकिर पनवा के निधड़क जवाब उन्हनी के चिरुकी हिला दिहलस. “तहन लोग के सरम-हया नइखे का। मरद-मेहरारू नइखे चिन्हात?” पनवा के तिक्खर बोली सुनते उन्हनी के रोब खतम हो गइल. बीरा पनवा का एह तेज रुप से खुदे अकबका गइल रहलन.

एक तोर त गाड़ी बदले के हड़बड़ी में गार्ड के डिब्बा भेंटा गइल. चढ़े के त बीरा चढ़ि गइलन बाकिर अधेड़ गार्ड खोदिया-खोदिया के बीरा का बारे में पूछे लागल. रहि-रहि के ओकर नजर पनवा पर गड़कि जाव. पनवा गुरमुसि के रहि जाव. ओकरा बड़ा बाउर लागे. गार्ड के तरक से जब बीरा गड़बड़ाए लगलन र पनवा का बोलहिं के परि गइल, “घर के इस्थिति ठिक ना रहल हा गाट साहेब! ओही से घर छोड़ै के परल हा. भागि के भरोस पर हमनी का मरद-मेहरारु देस छोड़ि दिहनी जा, अब आगे भगवान जानसु.” गार्ड खरखाहि देखा के चुपा गइल बाकिर ओकरा मन में खुदुर-बुदुर होखत रहे. ऊ हंसि के कहलस – “ई मरद हउवन! बड़ा सिधवा बाड़न बेचारू! परदेश में एंतरे गड़बड़इहन त काम ना चली.” पनवा ओकर व्यँग के समझलस, बाकिर बीरा का ओरि आँखि तरेरि के जइसे उनका मुरखाई पर आँखिए-आँखी धिरवलसि आ फेरू मुस्कियाइ के हूँ कहि के चुपा गइल.

आसाम पहुँचला पर कवनो परेशानी ना भइल. उहवां बीरा के हिरऊ सँघतिया रहलन रमेसर काका के लड़िका, कौलेसर. खूब आव-भगत कइलन उनकर. बीरा के मुंहे, उनुकर कहानी सुनि के चिन्ता त भइल उनका, बाकिर ढाढस देत कहलन, “अब तूँ हमरा किहां चलिए अइलऽ त निश्चिन्त होके रहऽ. इहवां केहू कुछ ना बिगारी तहार. हम बड़ले नु बानी.”

बीरा पनवा के संगे कौलेसरे किहां रहे लगलन. दू चार दिन क त सवाल रहे ना कि पनवा कौलेसर का कोठारी में गुजर कर लीत. कौलेसर का चलि गइला पर ऊ एक दिन बीरा के टोकलस, “तहरा नीक-जबून कुछ ना बुझाला. एकहीं कोठारी में आखिर अतना अदिमिन के गुजर कइसे होई? दीन सुखरग बा त तू कौलेसर का संगे बहरा सूति जा तारऽ! बरखा-बूनी अइला पर का होई? रात त एही में भेड़ियाधसान होई न! एहूं तरे इहां ढेर दिन रहल नीक नइखेऽ!” बीरा मोट बुद्धि त रहले ना. फट से बूझि गइलन. पनवा सांच कहतिया.

रात खान, खाइ-पी के जब कौलेसर सूते चललन त बीरा कहलन, “ओंतरे त हमनी का एके बानी जा ए कौलेसर, बाकिर एगो कोठारी में क दिन गूजर कइल जाई? तहरो त फजिहते न होता. बरखा-बूनी अइला पर अवरु परेशानी हो जाई. कहीं एगो कोठारी देखि के दिउवा देतऽ त बड़ा नीक होइत.” कौलेसर त पहिलहीं से फिकिरमन्द रहलन बाकिर संघतिया पर जाहिर ना कइल चाहत रहलन. पनवा के रहला से, उनका खाए पिए के त आराम रहे बाकिर सांच ई रहे कि ओह हालत में ढेर दिन चललो मुसकिल रहे. तब्बो उ अहथिरे कहे सुरु कइलन, “ए संगी! परदेश में केहूँ तरे गुजर बसर करे के चाहीं, फेरु अबहीं त तूँ कहीं नोकरी नइखऽ करत. कोठारी के किराया लागी. पहिले नोकरी त मिले द. कोठरियो के इन्तजाम हो जाई. हम तहरा खातिर एक दू जगह बतियवले बानी. कहीं नोकरी धरा जाए द.”

अबहीं कुछ दिन बीतल होई. कौलेसर का सिफारिस से बीरा के एगो सेठ किहां दरबानी मिल गइल. साथे साथ कोठरिया के इंतजाम हो गइल. बीरा पनवा के लेके अपना सेठ किहां चलि अइलन. सेठ उनका के अपना हाता के एगो कोठरी देइ दिहलस. तनखाह तय भइल पाँच सौ पचास रुपया. मोका पर उहे ढेर रहे. बीरा का संगें-संगे पनवा खुश रहे.

बाकिर ज्यों-ज्यों दिन बीते लागल, ओह रुपया के पोल खुले लागल. सुबिधान भोजनो मोहाल रहे दूनो परानी के. कबो चाउर रहे त दाल ना, कबो रोटी रहे त तरकारी ना. जाड़ के दिन रहे. बीरा सेठ के पुरान कम्मर पर दिन काटत रहलन. पनवा से बरदास ना भइल त बीरा से कहलस, “एगो नाया कम्मर काहें नइखऽ कीनि लेत। ए फटहा कम्मर से क दिन काम चली? जाड़ो बढ़े लागल.” बीरा ओकर पीर समझलन बाकिर पइसा के महमार देख के महंटिया गइलन.

दू चार दिन बाद पनवा फेरु पाछ धइलस. कुछ समझे बूझे लऽ ना का। आखिर कमरवा कहिया किनबऽ? हमहूं त हइ फटही लुग्गा साटि के रात काटऽतानी.” बीरा फिकिर में परि गइलन. पनवा जानत रहे कि कम्मर काहें नइखे आवत। ऊ मोटरी खोलि के ओमे से अपना पछुवा निकललस आ बीरा के हाथे ध दिहलस. बीरा भौँचक! भकुवा के ओकर मुंह ताके लगलन. पनवा झिरिकलस, “भकुवा मत. जिनगी रही त अइसन अइसन कतने पछुवा आई जाई. देहिंया ले कीमती इहे बा? एकरा के बेंचि के एगो कम्मर कीनि लऽ!” ना नुकुर करत आखिर बीरा के मानहीं के परल.

बीरा कौलेसर किहाँ गइलन त ऊ ना भेंटइलन ना. लचार होके अकेलहीं बजारे चलि दिहलन. पूछत-पाछत एगो सोनार का दोकानी बइठलन. सोनार चलता-पूर्जा रहबे करेलन स. बीरा के निछट गँवार आ सीधा साधा चेहरा से, अनुभवी सोनार का बूझत देरी ना लागल कि आसामी बुद्धू बा. पांच सौ बीस रुपया के पछुवा पर कतरनी चलावत-चलावत ऊ दाम दूइ सौ कइलस त बीरा के झूझूंवावन बरल. उ कहलन, “हमार पछुवा द ए भाई, हम दुसरा जगह बेचब”. आसामी फूटल देखि के सोनार लासा फूसी लगावे शुरु कइलस, “रउवा सोझिया आदिमी बानी. दोसर केहू हमरा ले ढेर दाम थोरे दे दी. हमरा बात पर बिसवास करी. विश्वास पर दुनिया टिकलि बा. ओंतरे राउर मरजी”. बीरा के मन आग-पाछ होत रहे. सोनार बुझि गइल कि ओकर बात सटीक बइठलि बीया. ऊ कुछ रुपिया अवरु अधिका बढ़ाई के रुपिया गीन दिहलस. बीरा तीन सौ सत्तर रुपिया लेके उठि गइलन.

कम्मर किनला का बाद बीरा के लगे एक सौ तीस रुपिया बांचल. उ पचास रुपिया में पनवा खातिर एगो लुग्गा किनलन आ घर के राह धइलन. लवटत खा उनुका मन परल कि कई दिन से बे तियने-तरकारी के कटऽता. ऊ खाली आलू आ पियाज लिहलन. किरिन बूड़त-बूड़त जब घरे अइलन त पनवा लुग्गा किनला खातिर उनका के खूभ झंपिलवलस. ओंतरे ओकरा भीतर बीरा खातिर सनेह लहरियात रहे. सोचत रहे कि बीरा ओकर केतना खेयाल राखऽ ताड़न. बीरा बाँचल रुपिया पनवा के देत कहलन, “ल! अब सब्बुर हो गइल नऽ!”

ओघरी सेठ कहीं बाहर गइल रहे. बीरा संझिए से गेट पर बइठल रहलन. भाला देवाल पर ओठँघावल रहे. एगो त माघ के टुसार, ऊपर से सन् सन् हवा चले त बुझाव कि देंहि अंगरि जाई. पनवा उनका के कहत थाकि गउवे बाकि ऊ कम्मर नंहिए ले अउवन. उनका अब जाड़ लागत रहुवे. गांव रहित त पतई पुअरा फूंकि के आग ताप लेतन. ईहां कउड़ के सुनगावो। कउड़ का मन परते उनका दिमाग में हाता का आरी-आरी फेंकाइल लकड़ी इयाद परुवी सन. उ उठि के अन्हारे टोइ-टोइ लकड़ी बटोरे लगुवन. लकड़ी बटोरउवे त आगि के फिकिर भउवे. टाइम बारह से कुछ उपर होत रहुवे. सोचुवन आगी सुनगा लेब त तापत-तूपत सबेर हो जाई बाकि आगि आवो त कहाँ से? उ कोठारी का ओर चलि देहुवन.

कोठारी के कंवाड़ी बन रहुवे. बीरा धीड़े धीरे जंजीर खड़कउवन त भितरी से पनवा के बोली सुनउवे, “के हऽ?” बीरा ओकरा आवाज के कंपकंपी महसूस करत धिरही से सन्तोष दिहुवन, “हम हईं हो, बीरा!” बोली सुनतहीं कहीं कि कवाड़ी फटाक से खुलि गउवे. पनवा चिहाइले कुछ पुछहीं के रहुवे, तले बीरा पूछि दिहुवन, “अभिन जागले रहलू हा?” पनवा उदास मुसकान में बोलुवे, “नीन त रोजे तूँ लेके चलि जालऽ. अकेल जीउ घबड़ाइल करेला. कइसे कइसे रात कटेले, एकर मरम हमार हिरदया जानऽता!”

बीरा ओकर तड़प महसूस करुवन. पनवा का सटला से उनका भितरी कुछ सुनुगे लगुवे. देहीं के जामल खून पनवा के कंपकंपी देखि के दउरे लगुवे. ऊ पनवा के अँकवारी में भरत कहुवन, “नोकरिए अइसन बा ए पान. हम का करीं? हमरा कवनो सवख थोरहीँ बा कि तहरा से अलगा रहि के रात काटी.”

बीरा के बोली मोटर का पी-पी में दबा गउवे. उ पनवा के छोड़ि देहुवन आ भाला उठावत गेट का ओरि दउरुवन.पनवा सन्न. ओकर गरमात खून धीरे-धीरे फेरू जामे लगुवे. मुँह से खाली अतने निकलुवे, “धिरिक जिनिगी बा हमार! संगे सुतलो-बईठल आ बोललो-बतियावल मोहाल हो गइल बा.”

सेठ के रोबिआइल बोली सुनि के जब बीरा गेट खोलुवन त सेठ गड़िए में से डाँटि के पुछुवे, “घर में सोया था क्या रे? इतनी देर से हार्न दे रहे हैं और तुझे सुनाई नहीँ रहा है?” बीरा सकपका गउवन, फेरु सँभारि के कहुवन, “हुजूर जाड़ लागत रहल हा. कउड़ सुनगावे खातिर आगी लियावे चलि गइनी हाँ.” “ऐसे ही गायब हो जाएगा तो दरबानी क्या करेगा? अच्छा सबेरे तुमसे पुछेंगे!” आ सेठ के गाड़ी हुर्र से आगा निकली गउवे. बीरा गेट बन करत खान सोचुवन, “अधम जिनिगी बा हमरो. छन भर हटि का गइनी, साला पहाड़ टूटि परल. अब सबेरे का जाने का होई?”

पनवा देरी होत देखि के बहरा निकलि आइल रहुवे. सेठ के डपटल सुनि के ओकरा बूझत देर ना लगुवे कि सेठ काहें अतना नराज बा? ऊ धीरे-धीरे गेट का ओर बढ़ि गउवे, बीरा स्टूल पर बइठि के मूड़ी गोतले रहुवन. फिकिरे उनुकर माथा फाटत रहुवे. पनवा उनका कान्ही हाथ धरुवे त ऊ चिहा के ऊठि गउवन. पनवा धिरहीं से पूछुवे, “का ह हो? सेठ काहें गरमात रहलन हा?” बीरा चिहुँकि के ओकर मुँह ताके लगुवन. उनका कुछ ना सुझुवे त अतने कहुवन, “तूँ का चलि अइलू हा? जेवन होई तेवन आगहीं आई. अन्हेरिहे सोचि-सोचि के मुवला से का फायदा? तू जा! सूतऽ!” पनवा चुपचाप खड़ा रहे. बीरा फेरु स्टूल पर बइठि गउवन.

पनवा गोड़ का अगूँठा से माटी निखोरत पुछुवे,”तनी हमहूँ त जानि कि का भइल हा?”
“तोहरा ए पचरा में परला से का फायदा? आरे आगि लिआवे खातिर उहाँ से हटि गउवीं आ एने सेठवा आ गइल हा. ऊ बूझलस हा कि हम सूतल रहनी हां. बस गरमा गइल ह.” बीरा चुपा गउवन.
पनवा उनका कपार पर हाथ फेरे लगुवे. सहानुभूति का छुअन से बीरा के ढाढस मिलुवे बाकिर ऊ पनवा के काँपत देखुवन त प्यार से झिरुकुवन, – “जा ना, जाड़ लागी. ढेर फिकिर कइला के काम नइखे. अइसन गलती नइखीं कइले कि सेठ डामिल-फाँसी चढ़ा दीहें.” पनवा तब्बो उहाँ से ना हटल, त बीरा उठि के ओके दहिना अंखवारी में भरले कोठरी का ओर चल दिहलन..

सबेरे होखते सेठ का बइठका में बीरा के बोलाहट भइल. उहे पूछ ताछ, ऊहे जवाब. बाकि बीरा ए बेरा ना सकपकउवन. ऊ साफ साफ साँच कहि दिहुवन. सेठ पर ओह सफाई के कवनो असर ना भउवे. उ आपन दू टूक फैसला सुना दिहुवे. बीरा के ई उम्मेद ना रहुवे कि सेठ अतना कठोर होई. उ गिड़गिड़उवन बाकि सेठ टस से मस ना भउवे. “एक हप्ता के टाइम बा! तूँ जल्दी से जल्दी आपन बेवस्था क के ईहां से चल्ता बनऽ. तोहार हिसाब परसो मुनीब क दीही”. ऊ भारी मन लेले अपना कोठारी का ओरी चल दिहुवन.

बीरा के अलम टूटल त सँघतिया कौलेसर किहां सरन लिहलन, फेरु जवन फिकिर कपारे चढ़ि के, भीतर का काँवर पिरीत के असमय झांवर क देले रहे ऊ मोका पावते अवरु चाँड़ हो गइल. सबेरे के निकलल डगडग मारल फिरसु बीरा. बाकिर नोकरी मिले त कवना सोर्स कवना विश्वास पर? बहुत कहला सुनला पर कौलेसर के मालिक साहब उनका के आपन दरबान बनावे पर राजी हो गइल. नोकरी पर जात खानी कौलेसर समझवलन, “सँघतिया, दुनिया देखावटी इमानदारी आ देखावती करतब खोजेले. एक जगो त भुगत चुकल बाड़ऽ, सोच समुझि के ठेकान से रहिह.” बीरा संघतिया के सीखि खूँटा गठिया लिहलन आ नवका सेठ के दरबार धइलन.

नवका सेठ बड़ा रंगीन तबियत वाला रहे. साहखरच आ फितरती. बड़े बड़े साहब सुबा ओकरा किहां जुटसु. अंगरेजी शराब के बोतल खुले आ किसिम किसिम के भोजन तइयार होखे. बीरा भड़कलन बाकि संघतिया के सीखि मन परि गइल. सेठ का सहर में कई गो माकन रहे. अदमियो जन के कमी ना रहे ओकरा. चाह के दू गो बगान ओकरा पास रहे आ चाह तइयार करे वाली फैक्ट्री. ओहि किहां बीरा काम करे लगलन.

सुरु-सुरु में सेठ के रंग-रोआब से बीरा भले कुछ भबतल होखसु, बाकि अब उनका एकर रपट परि गइल रहे. रोज खाइ-पी के संझिए खान अपना ड्यूटी पर हाजिर हो जासु. दिन का ड्यूटी पर दूसर दरबान रहे. बीरा के ड्यूटी सांझिए लागि जाव. ई बात दोसर रहे कि एइजा तनखाह अधिका मिले.

अपना चुस्ती आ फुर्ती से, बीरा के सेठ के विश्वासपात्र बने में देरी ना लागल. सेठ बाहर जाव त उनका उपर पूरा जिम्मेवारी डालि जाव. नतीजा ई भइल कि बीरा के कबो कबो दिनवो के मोका ना लागे कि कोठारी में जासु. कतने बेर ऊ आवे जाए वाला लोगन के मेहमाननवाजी आ सवाल के जवाब देत-देत अउँजा जासु. कबो-कबो उनके बख्शीश में पचीस पचास रुपयो भेंटा जाव. सेठ के दाई उनके पछिला-पछाड़ी बइठा के खिया पिया देस.

उनकर एह डयूटी से पनवा बहुत खुझे. अकेले ओकर मन ना लागे. बइठल-बइठल बीरा के बाट जोहल करे आ उनका बारे में सोचते सोचत ओकर मन रोवाइन हो जाव. परदेश में बीरा के छोड़ि के ओकर दूसर के रहे आपन? उदासी जब चँपलसि त ओकर रौनक उतरि गइल. नेह का संगे-संगे देंहि झँवाए लागल. उ बइठल बइठल सोचे…” हे गंगा माई! इ कइसन परिच्छा ले ताड़ू? गाँवे रहली त गांव-घर, कुल-परिवार आ समाज के भय से कुहुंकली आ जब एके लग्गे रहे के मोका आइल त बतियावहूं के मोका नइखे भेंटात.”

एक दिन, दुपहरिया में, जब बीरा अपना कोठरी का आगा परल बेंच पर ओठँघल सूति गइल रहलन, कौलेसर आ गइलन. पनवा दुआरी पर बइठल का जाने कवना सोच में डूबल रहे. कौलेसर का खँखरला पर जब ओकर नजर उठल त जइसे आँखी में खुशी के फुलझड़ी छूटे लागल. हड़बड़ाइ के उठल आ कोठारी में से एगो स्टूल लिया के बहरा ध दिहलस. कौलेसर बीरा के झँझोरि के जगा चुकल रहलन. बीरा का बगल में बईठत कहलन, “गाँवे गइल रहनीं हाँ. पूरा आठ-दस दिन रहि के आवत बानी!”

– “बाबू जी ठीक-ठाक बाड़न नऽ!”, कटोरी में मिसिरी आ लोटा के पानी स्टूल प धरत, पनवाँ अकुताइल पुछलस.
– “ठीके बाड़न, आरे एघरी तोहरा काका आ भतीजा लोग उनका के देखत-भालत बा. ऊहे लोग खेत-बधार से लेले गोरु-बछरु कुल्ही सँभरले बा.”
– “जवन सँभरले बा लोग, तवन भगवाने जानत होइहें. कइसन बाड़न बाबू? ढेर दुबराइल बाड़न?” पनवाँ के गला भरि आइल.
– “कहत न बानी कि ठीक बाड़न”. कौलेसर पनवाँ के ढारस देबे खातिर अपना बात पर पूरा जोर देत कहलन.
– “आ हमरा भइया-भउजी से भेंट ना भइल हा? ऊ लोग जानत बा कि हमनी का एइजा बानी जा.” बीरा जइसे कूल्हि समाचार एक्के बेर जान लिहल चाहत रहलन.
– “ठीके-ठाक बा लोग, तहन लोग के गाँव छोड़ देला से नाराज आ दुखी बूझाइल लोग. तोहार भइया जरुरे कुछ परेशान लउकलन. तोहन लोग के खिस्सा सुनाइ के बतावे लगुवन कि केंतरे उनका दुआर पर कई दिन ले बलुआ के लोग उपदरो कइले रहे. ई त अच्छा रहे कि उनका तोहन लोग के पता-ठेकाना मालूम ना रहे, ना त जेंतरे ऊ बतावत रहुवन, चउधरी गाँव-जवार के लोगन का सँगे एइजा चलि आइल रहतन.”

बीरा के मुँह लटकि गइल रहे. मूड़ी नीचे कइले फिकिर में डूबे उतराए लगलन.
– “पहिले पानी पी लेबे दऽ इहाँ के, त फेर जवन बुझाय पूछिहऽ.”, पनवाँ बोलल.
कौलेसर जब पानी पी चुकलन त मूड़ी लटकवले बीरा के बल देत कहलन, “लोगन के त काम बा कहल-सुनल. तोहन लोगन के आपन रस्ता अपने तय करे के बा. हँ हम अपना बाबू जी के जरुर बतउवीं कि तोहन लोग एइजा बाड़ऽ जा आ ठीकठाक बाड़ऽ जा.”
– “का? तब त जुलुमे बा!” बीरा के बेचैनी अउरी बढ़ि गइल.
– ” अरे मरदे, आखिर कबले केहू ना जानी? कबले भगोड़ा बन के रहबऽ एक न एक दिन त सब जनबे करी! आ हमार बाबू जी बहुत धीर गम्हीर आ समझदार आदमी हउवन. उनके असलियत के मरम खूब नीक से बूझाला!”
– “जनला का बाद हमहन का बारे में कुछ कहतो रहुवन?” पनवाँ निखोरत पुछलस.
– “हँ, इहे कि तोहन लोग कवनो पाप नइखऽ जा कइले. एक दोसरा के चाहल आ निबाहल कवनो पाप ना हऽ. अगर पनवाँ के बाबूजी दुनियाँ के परवाह ना क के तोहन लोग के बियाहे क देले रहतन त ई नौबते काहें आइत? तोहनो लोग के भलाई भइल रहित आ ऊहो आज ठीक ठाक रहितन. इनकर काका आ पितिआउत भाई लोग के जरुर घाटा होइत.”
– “अब त फायदा होत बा नऽ! हवेखते बा लोग. पहिलहूँ ऊ लोग इहे चाहत रहे कि कइसे हमार बिदाई होखे आ कइसे बाबू का खेत पर ओह लोगन के कब्जा होखे.” पनवाँ अपना मन के उदबेग खोलि दिहलस.
– “अउर सब घर पलिवार मजे में बा लोग नऽ?”, बीरा पुछलन.
– “हँ भाई सभे मजे में बा. हमार पूरा घर-पलिवार तोहन लोग का सँगे बा. साँच के आँच का? बाबू कहत रहुवन कि धीरे धीरे सबका एक दिन तोहन लोग के कबूलहीं के पड़ी.”

कई महीना से गांव-घर से उखड़ल, लांछित-अपमानित पनवाँ का हिरदया के कुछ शांति मिलल. परदेस में अकेल रहत रहत उदासी ओढ़े-बिछावे के लकम धरा गइल रहे. अपना अँगना-दुआर आ सिवान में चहकत-उड़त रहे वाली चिरई इहाँ पिजड़ा का भीतर छटपटाइ के रहि जाव. अइसन ना रहे कि ओके गाँव घर के इयाद ना आवे, बाकि इयाद आइए के का होइत?

कौलेसर घंटा भर रहलन. बहुत बतकही भइल. बहुत बादर छँटलन स. जात जात ऊ बीरा से कहलन, “गाँव मे लवटे आ रहे खातिर अपना के कूल्हि बिरोध, अपमान, तिरसकार, आ लड़ाई खातिर तइयार करे के परी. तोहके आजु से ई गँठियाइ लेबे के चाहीं.” बीरा के उनका एह उछाह भरल सीख से बहुत अलम, बहुत बल भेंटाइल.

सूरुज के ललाई धीरे-धीरे बदरन का धमाचौकड़ी में ओरात रहे. साँझ के धुंध धीरे धीरे जमीन पर उतरे शुरु क देले रहे. बीरा आपन खाकी कोट पहिन चुकल रहलन. पनवा चउकी पर थरिया धरत बोलल, “आराम से कुछ खा-पी के तब जइतऽ! दिन पर दिन शहरी बाबू भइल जात बाड़ऽ!” बीरा हँसि दिहलन, “भूखि रही तब न केहू खाई! पता ना एइजा हमरा के का हो गइल बा?”
“दूध-दही कुछऊ रहित त खाइल होइत. खाली रोटी आ आलू के तरकारी खात खात मन अँउजाइ गइल बा. एइजा गाँव लेखा लेहना पताई आ फरुहा कुदार त करे के नइखे. आदमी जब जाँगर चलावेला त भुखियो चाँप के लागेले.” मुंह में हाली हाली कवर डालत बीरा सफाई दिहलन.
पनवा समझत रहे. असल बात त इ रहे कि सँझिए इनकर ड्यूटि चालू हो जाले. गेट पर ना रहसु आ कवनो बात हो जाव त नोकरियो जाई. तनी बेरा गिरा के इतमीनान से खइतन त एक दू रोटी बेसी खइतन, दूध दही कहाँ से आवे? दिन के ड्यूटी देबे वाला दरवान सँझही, माली का संगे संगे भागि जाला. जात जात बोलत जाई, “तनी देखिहऽ बीरा… हमरा बजारे जाए के बा.” फुकवना इ कबो ना सोचे कि बीरो के पलिवार बा, इनहूँ के बजार हाट जाए के परेला. इनकर बजार त दुपहरिए में होला. अतना दिन में कब्बो जो इनका संगे बजार घूमे के मोका मिलल होखे. पनवा उनकर हाली हाली कवर उठावत देखत रहे आ मने मन खीझत रहे.

थरिया टारत बीरा उठि गइलन. अँचइ के लवटलन त गमछी से ताबरतोर मुँह हाथ पोंछलन आ कोना में खड़ा कइल भाला उठा के बहरिया गइलन.

“आवऽ लवटि चलीं जा” लघु उपन्यास के पहिला हिस्सा १९७९ में भोजपुरी पत्रिका “पाती” में “सनेहिया भइल झाँवर” शीर्षक से छपल रहे आ एकर दुसरका हिस्सा “समकालीन भोजपुरी साहित्य” के जून १९९७ के कथा विशेषांक में ” पनवाँ आ गइल” शीर्षक से छपल. हालांकि ई देहात के बे पढ़ल-लिखल पनवाँ आ बीरा के प्रेमकथा ह, बाकिर एम्में गाँव से शहर के पलायन आ फेरु ओसे मोहभंग के साथे-साथ वापसी आ अन्तःसंघर्ष के चित्रण बा.

ई लघु उपन्यास बाद में अँजोरिया में धारावाहिक रुप से प्रकाशित भइल रहे. अब ओही उपन्यास के अँजोरिया के एह नयका संस्करण पर प्रकाशित कइल जात बा. कोशिश बा कि पुरनका संस्करण से सम्हारे जोत रचनन के एह खंड में ले आवल जाव जेहसे कि पाठकन के खोजे पढ़े में सुविधा होखे.

उपन्यासकार डा॰ अशोक द्विवेदी के नाम भोजपुरी साहित्य में जानल मानल आ मशहूर बा. अँजोरिया के सौभाग्य बा कि डा॰ द्विवेदी के रचना नियमित रूप से मिलत रहेला प्रकाशन खातिर आ हर बेर ओकरा के प्रकाशित कर के मन खुश होला. डा॰ अशोक द्विवेदी का बारे में भोजपुरी साहित्य के एगो पुरहर स्तंभ पाण्डेय कपिल के कहना बा कि, “गीत, गजल, नई कविता, निबंध, कहानी, लघुकथा, आलोचना आ संपादन का क्षेत्र में डा॰ अशोक द्विवेदी के जे अनमोल अवदान भोजपुरी के मिलत रहल बा ओकरा से भोजपुरी के ठोस आ वास्तविक समृद्धि सुलभ भइल बा…… उनुकर कहानी परम्परागत भोजपुरी कहानियन के इतिवृत, आदर्श आ औपचारिक विवरण से आमतौर पर मुक्त बा. यथार्थ जिनिगी के नीमन‍-बाउर अनुभवन से उपजल कहानी जहाँ एक ओर भाषा के संपूर्ण संस्कृति संस्कार से लैस बा, उहें एकनी में देश आ काल का मोताबिक उभरल चरित्र तीखा आ क्रिटिकल भइला का साथे बड़ा सहज ढंग से उभरल बाड़ें स.”


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