– अशोक मिश्र

एक बेर एह सदी के महानायक अमिताभ बच्चन एगो फिल्म में गीत गवले रहले, ये क्या हो रहा है, भाई ये क्या हो रहा है? एकर जवाब मिलल रहे कि, कुछ नहीं…कुछ नहीं… बस प्यार हो रहा है. हम एह फिल्म के देखले नइखी बाकिर गीत के बोल से लागत बा कि प्रेमी-प्रेमिका के कुछ अइसन-वइसन करत पकड़ले पर उनका मुंह से निकलल होखी कि ई का हो रहल बा ? आजु हालत ई बा कि सुप्रीम कोर्ट पूरा देश से पूछत बिया कि ई का हो रहल बा आ एह बाति के जवाब देबे वाला केहू नइखे. इहे सवाल एक दिन सुबह-सबेरे हम उस्ताद गुनाहगार का घरे जाके पूछनी, त ऊ खीझिया गइलन. भउजाई से चाय पियावे के बात कहत कहले, “होखे के त बस खाली भ्रष्टाचार हो रहल बा, घपला हो रहल बा, घोटाला हो रहल बा, औरतन लड़िकियन का साथे बलात्कार हो रहल बा. एकरा अलावा त कुछ होखत नइखे. तू अउरी का सुनल चाहत बाड़ऽ ? सुबह-सबेरे राम नाम लिहला का बजाय हमरा मुंह से खराबे बात निकलवावत बाड़ऽ.”

हम उस्ताद गुनाहगार के तनि अउर पिनकवनी, “रउरो अमिताभ बच्चन का तरह लोग से पूछीं, ई का हो रहल बा ?”

गुनाहगार तनी मुलायम पड़लन. कहलन, ‘यार! केकरा-केकरा से पूछबऽ ? सुप्रीम कोर्ट पूछत त बिया ? बा केहु जवाब देबे वाला ? प्रधानमंत्री से पूछऽ, त ऊ अपना ईमानदारी के तगमा आ मजबूरी के रोना रोवे लगीहें. विपक्षी सिरिफ हाय-हाय कइल जानत बाड़े. उनुको मालूम बा कि देश में का हो रहल बा. कुछ ऊ कइले बाड़न, कुछ उनुकर भाई-बंधु करत बाड़न आ उनुका उमेद बा कि कुछ ऊ आगा चलि के करीहें. एही आस पर त उनकर सगरी हाय-हाय टिकल बा.”

हम कहनी, “सरकार के कुछ मत कहीं. ऊ कइले त बिया. ए राजा के जेल भेज दिहलसि, सुरेश कलमाड़ी के किया-कराये पर पानी फेर दिहलसि. अब बेचारु सफाई देते फिरत बाड़न कि हम कुछ नइखीं कइले.”

गुनाहगार फेरु खिझिया उठलन, “अरे, त करतन नू ! कुछ करहीं खातिर त जिम्मेदारी सउपल गइल रहे. जब कुछ ना कइलन त अतना बड़ घोटाला निकलल आ अगर कुछ खुदा ना खास्ता कइले रहतन त फेर पूरा देशे कंगाल हो जाईत. भगवान बचावे, अइसनका लोगन से. अगर अपना देश में दूइयो-चार गो अइसन करे वाला निकल जास त फेर देश के बंटाधारे बूझऽ.”

“भाई साहब, अइसनका लोगन से हमनी के देश के धरती कबहियो खाली नइखे रहल. आजादी का बाद से ले के आजु तक एह घोटालाबाजन के नाम गिनाईं का ?”

“रहे द यार…अपना देश के त भाग्य नियंते हो गइल बाड़न स घोटालेबाज. हमनी जन-गण-मन के अधिनायक त इहे हउवन स. एकनिये के जयगान गावत-गावत हमनी का एह दुनिया से विदा हो जाएब.” उस्ताद गुनाहगार अब कुछ भावुक आ भाग्यवादी जइसन हो चलल रहले. उनुका के अउरी परेशान कइला का बजाय घरे लवटि चलनी. चौराहा पर चहुँपनी त ओहिजा भीड़ लागल देख मामिला समुझे खातिर नियरा गइनी त पता चलल कि कुछ नवही एगो रिक्शा पर गोमती नगर से पालिटेक्निक कालेज आइल रहले सँ आ किराया का नाम पर पांच रुपये पकड़ा के चल दिहले. रिक्शावाला कुछ कहलसि त ओकरा के मार पीट के ओकरा लगे जवने कुछ रहे उहो लूट के भाग गइलें. लुटाइल-पिटाइल रिक्शावाला तमाशाई भीड़ से पूछत रहुवे, “भइया, ई का हो रहल बा ? एकदमे अंधेर मचल बा एह देश में.मेहनतो करवले आ जवन कुछ रहे उहो लूट खसोट के चल गइले.”

हम गुनगुनात घरे लवटि अइनी, “ई का हो रहल बा भाई इ का हो रहल बा ?”


लेखक अपना बारे में जवन बतावत बाड़े :

जब साहित्य समुझे लायक भइनी त व्यंग्य पढल नीमन लागे लागल. व्यंग्य पढ़त-पढ़त कब हमहू लिखे लगनी पते ना चलल. पिछला 21-22 बरीस से व्यंग्य लिख रहल बानी. कई गो छोट-बड़ पत्र-पत्रिकन में खूबे लिखनी. दैनिक स्वतंत्र भारत, दैनिक जागरण आ अमर उजाला जइसन प्रतिष्ठित अखबारनो में खूब लिखनी. कई गो पत्र-पत्रिकन में नौकरी कइला का बाद आठ साल दैनिक अमर उजाला के जालंधर संस्करण में काम कइनी आ लगभग चार महीना रांची में रहनी. लगभग एक साल दैनिक जागरण में काम कइला का बाद अब दैनिक कल्पतरु एक्सप्रेस (आगरा) में बानी. हमार एगो व्यंग्य संग्रह ‘हाय राम!…लोकतंत्र मर गया’ दिल्ली के भावना प्रकाशन से फरवरी 2009 में प्रकाशित भइल बा. आगरा में उम्मीदन के नया सूरज उगी एही उमेद का साथे संघर्ष में लागल बानी.

संपर्क सूत्र –
अशोक मिश्र,
द्वारा, श्रीमती शशि श्रीवास्तव,
५०७, ब्लक सी, सेक्टर ६
आगरा विकास प्राधिकरण कालोनी,
सिकन्दरा, आगरा

Ph. 09235612878
कतरब्योंत

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