एक चिटुकी सेनुर

(भोजपुरी कहानी)
sudhirsrvstv

– सुधीर श्रीवास्तव ‘नीरज’

राति अबहिन दुइयो घरी नाहीं बीतल होई बाकिर बरखा आ अन्हरिया क मारे अधराति के लखां सन्नाटा पसरि गइल रहे चारू ओर. अषाढ के बादर पूरा दल बल के साथे आ के डटि गईल रहे… आ बरखा कहे कि आजु नाहीं बरसबि, फेर कब बरसबि. कहले बा जे गांव की माहौल मे बिजुली आ बिपति कब आ धमके कवनो ठीक नाहीं ह.

पूजन बाबा खिरकी खोलि के दुआरे का ओर झंकलें त पूरा टोला मे केहू के कवनो चाल नाहीं मिलल. कहीं एक्को चिरई के पूत ले नाहीं लउकल. हँ.. मंगऱुआ अलबत्ते अंउआत रहे. आजु कौरा नाहीं पवले रहे जपला.

– ई.. अन्हरवां का ठाढ बानी जी…
– नाहीं हो मलिकाईनि, मंगरूआ भोंकलसि ह त, आजु कौरा पवलसि ह न ?
– काहें, कबो एइसनो भईल बा का आजु पांच बरिस मे कि मंगरूआ कौरा नाहीं पवले होखे ?
– नाहीं हो, एइसन नइखे.
– रउरा अनेरे… बन क देईं खिरकी आ चलीं घर में.
देवाल घडी क ओर तका के कहले बाबा जे .. देख..न हो मलिकाइनि. अबहिन त नवो नाहीं बजल बा. तनि सुर्ती खियाव ना एक बीरा.
बाबा चउकी पर गोड़ लटका के बईठि गइले बाकिर गोड़ आगे पाछे हिलते रहे.
– हं..लेईं..
– हं हं ले आव…द…हेने.
बाबा के चेहरा गम्भीर बा. ई बडी देर से सवाचत रहली मलिकाईनि. जब नाहीं रोकाईल त टोकली – कवनो बाति ह का जी ?
– नाहीं त हो.
– नाहीं कइसे. आजु संझहीं से देखऽतानी राउर मन कहीं लागत नईखे. खनवो ढंग से नाहीं खाईल गइल ह अपने का. का बाति ह, बताईं.
– कहनी हं न. नाहीं कुछु. बस एहीं तरे.
– अरे पैंतीस बरिस हो गइल एहि मिसरौली (गांव के नाम) में अइले आ रउरे साथे रहत. रउरे एकहक सांस के हालि जानेनी हम.
बाबा सुर्ती झारि के दांते तर दबा लिहलें बाकिर नजर अबहिन निचहीं रहे. कुछु देरी ले एकदम सन्नाटा छवले रहे आ जब बाबा मूड़ी ऊपर उठवलें त बहरे वाला अषाढ के बादर उनकी आंखी.से झरे लागल. नजर घुमवलें मलिकाईनि की ओर. – देखबू हो बाबू के अम्मा. आजु बिहनहीं से कुछु नीक नइखे लागत. बाबू आजु बडा मन परऽताने. लोर आंखी से चूअत धार बनावत मोंछी पर पहुंचि गइल. मलिकाईनियो के पुक्का लर फूटि गइल. थोरे देर मे अपना के सम्हालि गलेहली आ अंचरा से बाबा के मूंह पोंछे लगली.
– बबुनवां सूति गइल का ? नाहीं. अबहिने त खिया के पहुंचवनी हंईं दुलहिनि की लगवां. अबहिन जगले होई.
– दुलहिनि खा भइली ?
– नाहीं जी. अबहिन तोपि के धइले होइहें. दस बजे के बाद न खाली. अरे जनम भरि बनारस रहली. आ अब न ए गांव मे आ के फंसि गइलि बिया बेचारी. बिजुलिओ नइखे रहत कि टीबी-ओबी देखें जे कुछु मन लागे.
– ए बेरि जबसे बाबू जम्मू गइले हं तबसे बडी उदास रहतिया दुलहिनियां.
– सही कहताडू मलिकाईनि. केतना त कहनी बाबू से जे लिया जा लइकन के अरे जम्मू नइखे जाए लायक त बनारसे चहुंपा द. अरे बनारस मे एतहिन से साफ-सूफ घर दुआर बा. बिजुली बत्ती स्कूल बजार सब बा. आ संउंसे घर केहू रहवइयो नइखे. अरे दूनू लइका लोग आपन आपन जरोह ले के बहरे बा. इहे बूढा बूढी दूनू जाने बा लोग. बबुनवों के दाखिला कौनो अंगरेजी स्कूल मे हो जाइत त बाबू सकरले नाहीं. आ उनसे पहिले दुलहिने कहली जे ओहिजा सब रहिए के का करी ए बाबूजी. सभत्तर भरि के का होई जब रउरा आ अम्मा जी एतहिन अकेल्ले रहि जाइबि जां. हम रउरा लोगन के अकेल्ले नाहीं छोडबि चाहें जवन हो जा. आ रहि गइल सवाल बबुनवा की पढाई के त, इहों का त मिश्रौली आ कुशीनगर मे पढि के सेना मे हवलदार भइल बानी. कहत रहनी राउर बाबू जे सगरी पढाई एहि कितबवे मे बा. केहू गावें पढो, बनारस भा लखनऊ पढो. अरे हमरी गाजीपुर वाली फूआ के छोटका जवन नाहीं आइल रहे परसाल हमार तिजिआ ले के. ऊ गउएं पढि के सेना मे लेफ्टिनेंट भ गइल. तनि बताईं त..आपन बबुनवो कसयां आ कुशीनगर पढि के एक दिन लेफ्टिनेंट बनी रउरे असिरबाद से देखि लेबि. आ रउरा लोगन के ए उमिरि मे छोड़ि के हम कही नाहीं जाइबि.

दुलहिनि के ओ दिन के बाति मन पारि के दूनू बेकति की आंखी से एक गारल हजार आंसु गिरे लागल.
ओ जनम मे हमनी के कवनो निम्मन करम कइले होखबि जां तब एइसन बेटा आ बेटियो ले बढि के पतोहि पवले बानी जां.

तवले मोबाइल मे घंटी बाजल. ए मलिकाईनि तनि देखऽ त अच्छा ले, ई एतनी राति खां के ह जी. लेईं देखीं त, हमरा लउकत नइखे साफ. हं लेईं. ई..त बाबू के फोन हवे दे आवऽ दुलहिनि के.
– दुलहिनि, ए दुलहिनि, ल, हई बाबू के फोन आइल बा. कटि गइल का दो ए दादा.
– देईं हमके अम्मा जी, ऊंहा के होई त अब्बे फेर से करबि. हं आ त गइल.
– हलो, हं गोड़ लागऽतानी.
– का हो, कइसन बाडू ?
– हम त एकदम फिट्ट बानी जी. गोडे के
पंजा पर डोलि डोलि मुसुका मुसुका बतियावे लगली सुमन.

– बाबू सूति गइल का हो ?
– हं जी, अबके त सुता के इहे उठनी हं तवले राउर फोन आइल ह.
– आ तहरा अंघी नइखे लागत का ?
– नाहीं त.
– कइसे लागी ?.
– भुला गइनी का ?
– नाहीं हो. अब एतहिन से कवन इंतजाम करीं ?
– करीं कवनो जोगाड़.
– जा के ठंडा पानी पी ल दू गिलास. आ जाई नींद.
– ठीक बा ले.
– रउरे खाना खा भइनी ?
– हं. .तनी बाबू जी के दे द फोन.
-अच्छा. लीं ए बाबू जी. अपने से बाति करे के कहऽतानी. हं लेईं.

– गोड लागऽतानी बाबूजी.
-जीय बेटा. निंमने बाड़ऩ न.
– हं, बाबू जी. एगो बाति पूछे के रहल ह..
– का बाबू, कवनो परेशानी में नइखऽ न ?
– नाहीं बाबू जी.
– तब ?
– आ, अम्मा कहवां बीया ?
– रहली ह त एहीजा. संझवे से बड़ान पारत रहली ह तहके. कहत रहली ह जे का जाने काहें आजु बाबू के मुंहवां भक्क भक्क लउकऽता. तूं बताव बाबू, का कहत रहलऽ ह ?
– एइसन बा बाबू जी. अपने बार्डर के एगो चउकी पर धोखा से पाकिस्तानी सेना कब्जा क लेहले बिया. ओकरे खिलाफ आपरेशन के आदेश हमरी रेजीमेंट के मिलल बा. बडे साहब आजु मीटिंग मे कहले हं. जे काल्हु भोर में चार बजे चालीस जवान के टुकडी कुछ आफीसर के साथे ओ आपरेशन पर भेजे के बा. दुश्मन काफी ऊंचाई पर बा ए लिए उहां जान गइले के पूरा खतरा बा. त साहब के ई कहाबी बा जे खाली चालीस जवान के भेजे के बा. ओहू मे जे जाइल चाहे ऊहे जा. सभे अपने परिवार से बाति क ले. जेकरे मन मे कौनो डर भय होखे ऊ मति जा.

कवनो अनहेनी के आगम से बाबा के कंठ सूखे लागल.
– त, ई कहऽतानी बाबू जी कि एमे जान के पूरा खतरा बा.

जान के खतरा…….. बाबा बडी जोर चिहुंकलें.
– केकरे जान के खतरा ए दादा. ई बाप पूत कवन पूआ पकावऽताड़ जां ए दादा. हमके देईं त फोन.
– ल..बतियावऽ.
– कइसन खतरा बा ए बाबू ?
– कुछु नाहीं अम्मा. तें त अनेरे घबडाए लागेले.
– अरे कौनो बैंके के बाबू थोरे भइल बानी जे एसी मे बइठि के कलम चलाइबि. सीमा पर तैनात बानी. कुछ न कुछ खतरा त रहबे करी. सामने दुश्मन बा त फूल थोरे बरिसाई. गोले दागी न ?
– ई त सही कहऽताड बेटा. केतना चिल्ला चिल्ला के कहनी कि बलकवे वाली नोकरिया ध ल. कागज दुआरी पर आइल आ बाप पूत का जाने का खुसुर फुसुर बतिया के लौटा दिहलऽजां. अउरी सेना के नोकरी धरा गइल. ओहि बलकवे मे हरी लाला के बबलुआ कमा के लाल हो गइल.
– हई फोन द त हमके. बे मतलब के बाति. ना कुछु बूझे के ना सूझे के. हं बोलऽ बाबू.
– ई कहत रहनी हं कि साहब के ई मतलब बा कि डेरइले के मारे जे आपरेशन मे नइखे जाइल चाहत…..
डेराइल शब्द सुनि के बाबा बौखला गइलें. कहले – का, का कहले हं तहार अफसर ? डेरइले के बाति पुछले हं तहनी से ? कहि दीहऽजा के उनसे कि कवनो घुरहू कतवारू के खून नाहीं हईं हम. हम ओ खानदान के हईं जवन खानदान यमराजो से नाहीं डेराला. ऐ सुनु बाबू ( बाबा के क्रोध एकदम भडकि उठल रहे अबहिन ले छोट छोट बाति पर आंसु गारे वाली पूजन बाबा के आंखि भट्ठा की आवा लेखां धधकति रहली सँ. कंठ कठोर हो गइल, आवाज भर्रा उठल.) बाबू तहके तोहरे बाबा आ तोहरे बाप के तिलाख बा. तूं ओ चोटी पर चढ़ि के एकहक पाकिस्तानी के मूड़ी काटि लीहऽ बेटा. हई. ल, अपने अम्मा से बतियावऽ.

– हं बेटा, हम बोलऽतानी तहार अम्मा. एक्के पूत जनमनी हम. ना कवनो अउरी बेटा, .ना बेटी. तहरे ले ए परिवार के आस बा. लेकिन हमरे बाती के गांठि बान्हि लीहऽ बाबू. हर घाव के आंसु पियले के तइयार बानी हम. एक सिसकी ले नाहीं लेबि. लेकिन भारत माता के ऊपर लात डाले वाले पपियन के छाती फारि के ओकर खून पी घरिहे बाबू. काली माई छछात तहरे साथे बाडी.
– अरे ए मलिकाईनि, सुनऽसुनऽ. अब बाबू पर खाली तोहार आ हमार अधिकार नइखे. केहु अउरियो बा जेकर जीवन बाबू से बन्हल बा. हमनी के जीवन त कटि गइल. लेकिन दुलहिनि के त सारा जीवन अबहिन पहाड़ की तरे खडा बा. हमरा त बुझाता कि भावुकता मे हम कुछु ढेर बोलि गइनी हं. फोन दुलहिनि के दे आवऽ असली आ आखिरी निर्णय देहले के हक खाली उनही के बा.

एन्ने दांते तर लुग्गा के अंचरा दबा के सुमन सारी बाति त पहिलहीं से सुनति रहली. आ ओकरा मने मन तउलत जोड़त घटावत रहली. आजु सुमन का अपने बियाहे के दिन के एकहक बाति एकहक दृश्य सिनेमा की लेखां चले लागल रहे. बराति नाचत-गावत चलि आ रहलि बिया. मारे रोडलाइट की साथे पड़ाका छूटऽता. जब इहां के कारे मे से गोड़ नीचे डालऩतानी त सारा घराती लोग के मुंह खिलि गइल. सखी लोग त भागल पराइल हमरी लग आ गइल लोग आ मारे खुशी के कूदे लागल लोग. कहे लागल लोग कि – ए सखी , तहार सोरह सुक भूखल एकदम फलित हो गइल. एइसन सुंदर दुलहा मिलल बाने कि अब तहसे का बताईं. हमरा त बुझा ता कि ए मोहल्ला मे अबहिन ले एतना सुंदर दमाद अबहिन नाहीं आइल रहल ह. केहू घरे. सखी लोग क कहले पर जंगला खोलि के तनिएसा झंकनी त मन हुलसि गइल.

द्वार पूजा, फेरा, सेनुरदान. कोहबर मे पासा खेलावल आ अंत मे बिदाई. फेर ईंहां क साथे बइठि के मिश्रौली मे अपनी कोठरी ले. थोरे देर मे सब दृश्य घूमि गइल आंखी क सामने. करेजा पथरा गइल, आंसु सूखे लागल. गंटई कांट हो गइल. फोन ले के सुमन खटिया पर बइठि गइली आ बाबू की माथे पर हाथ फेरि फेरि बतियावे लगली.
– सुमन…..
– कहीं जी.
– तोहसे एगो बाति कहऽतानी. ओकरा के तनि ठंडा दिमाग से सोचिहऽ. काहें चहकत नइखू, ई कुलि सुनि के डेरा गइलू ह का ? अरे देश के रक्षा के जिमवारी न ह हमनी के.
– हं, त बिलुकुल ह. रउरा त समझऽतानी आपन जिमवारी.. बाकिर जेकरे खातिर रउरा लोग सीमा पर आपन जान नेछावर करऽतानी ऊहो लोगवा कब्बो समझऽता रउरे कुर्बानी के मतलब ?
– का मतलब ? अरे, पूरा हिन्दुस्तान बा हमनी के साथे.
– झूठ, बिल्कुल झूठ. बिल्कुल गलत जानकारी बा रउरे लगे. जवने आतंकवादी के पकड़त भगावत में सीमा के रक्षा करत में सैनिक लोग शहीद हो जाता ओ आतंकिन के अपनिए देश के लोग शहीद बतावऽता. ओकरे खातिर जिंदाबाद के नारा लगावऽता.. मानव अधिकार के बाति होखे लागऽता. शोकसभा मनावल जाता. आ जवन जवान मारल जाता ओकर बेटा बेटी टूअर, मेहरारू विधवा, माई बाप लाचार हो जा ताने.
– नाहीं त सुमन. एइसन त कवनो बाति नाहीं सुनाइल ह.
– सुनाई कइसे ? करगिल आ सियाचीन मे डी एन ए थोरे देखल जाला?
– ई बाति ह का ?
– हं जी, बिल्कुल इहे बाति बा.
– तब त ई बहुत बुरा बा हो. ई कुलि जानि सुनि के त सेना के मनोबल बहुत गिरि जाई.
– सेना के गिरो त गिरो. नेतन के त खूब उठऽता. अरे अबहिन टटके सुनीं. ऱाउर फौज सीमा पार जा के आतंकवादी के कैम्प पर हमला क के ओ कुल्हिन के नाश क के आइल ह त.कई नेता आ पत्रकार ए करवाईए पर सवाल खड़ा क देहल ह लोग.
– छोड़ऽ ई कुलि.
– छोड़ीं कइसे जी. अबहिन कुछुए महीना त होता. कर्नल महादिक के सहादत पर कवनो नेता के आंखी से छुछ आंसु ले नाहीं गिरल ह. आ ओहीजा दादरी मे कवनो कसाई गाइ कटले के आरोप मे मरा गइल ह त..ईहे नेता लोग आपन छाती पीटे लागल ह लोग. बाप बाप चिल्लाए लागल ह लोग. आं ओकरे घरे पूरा बराति ले ले धावल ह लोग. विद्वान लोग आपन पुरस्कार लौटावे लागल ह लोग. अरे एगो नचनिया के मेहरारू का त ए देशवे मे डर लागे लागल ह. अरे भेंटाइत कहीं त पूछती ओसे कि रे का जाने कउआं बिआहे ते आइल बाडे एकरी पर आ कवनो ठीक नइखे कि बिहने ऊ तोके लात मारि के कौनो दूसर राखि ले. तोरा कवन डर बा रे. अरे डेराइति ऊ मेहरारू त कुछु बुझाइत जेकर सोहाग सीमा पर दुश्मन से लड़त मरि जा ता तब्बो जवन कहऽतिया कि हमार पति देश के काम अइलें त अइले, जवन हमरे पेटे मे पल़़ऽता ओहू के सेयान क के भारत मां के सेवा मे भेजबि.
– सुमन…. ए सुमन. सुनऽ सुनऽ त…
– कहीं.
– हमके एगो वचन दे सकेलू?
– सारा देहि, आत्मा तक सउंपले के बाद ई कइसन सवाल करऽतानी जी ?
– ई कहऽतानी सुमन, कि अगर कल क लड़ाई मे हमके कुछु हो गइल त बाबू के ले के तूं बनारस चलि जइहऽ. अबहिन तोहार उमिरिए केतना बा? हम बाबूजी के सब बाति समझा देहले बानी. ऊ तहरे पापा से बतिया के फेर से तहार दूसर बियाह करा दीहें.
– का ? का कहनी हं….. दूसर बियाह….? सुमन कौनो पिल्ला बिलारि से नइखी बान्हल. बाघे से बियहल बाड़ी. हमार बियाह खाली रउरी देहीं से नइखे भइल. रउरी आत्मा से भइल बा. रउरे खानदान के इज्जत से भइल बा. कवनो अउरी नाम हमरे नाम के साथे नाहीं जुड़ि सकेला. रउरे हाथ के “एक चिटुकी सेनुर” हमके जनम जनम के सोहागिनि बना गइल बा जी. रउरे साथे जीयल खाली एक छन मन पारि के हम आपन पूरा जीवन काटि सकेनी. अपने बबुनवो के हम सेने मे भेजबि. बलाके क नोकरी नाहीं कराइबि. आ रउरा आजु ई उल्टा काहें सोचऽतानी. बाघे की आंखी मे सियार देखि के आंसु कइसे आ गइल. रउरे मशीनगन के गोली त तोप के गोला के तरे चली आ दुश्मन के लाश बिछा दी. आ जहां ले हमार सवाल बा त हमार कौनो चिंता मति करीं. चौकी फतह क के लौटीं. हम बइठल बानी रउरे इंतजार में. जा के चौगुना जाोश से लडीं देश खातिर.

दू बजे के सायरन के साथ कई गुना जोश आ उत्साह के साथ सैनिक के बूट पटकले के आवाज कैम्प मे गूंजल.
“हवलदार प्रभात मिश्र रिपोर्टिंग सर !”

( समाप्त )


सुधीर श्रीवास्तव.
जन्म- ८ जून १९७२
मिश्राैली, कुशीनगर.

वर्तमान पता –
राजेन्द्र नगर (पूर्वी), गाेरखपुर,
प्रधान सम्पादक – ख़बर गोरखपुर (हिन्दी साप्ताहिक )

प्रकाशित रचना –
1 – काैस्तुभ ( कविता संग्रह २०१०),
2 – मैना ( कहानी संग्रह )

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