dr-asharani-lal

– डॉ॰ आशारानी लाल

कचरा के कहानी ओकरे जबानी

kachraअइसे त हम बेजान बानी, हमरा मुँह में जबान हइए नइखे तबि बहुत दिन से हम सोचत रहीं कि अपना बारे में रउवो सभे के कुछ बता दीं. ना बोलब चाहे ना बताइब त हमरा मन के केहू कइसे जानी. हमरा मालूम बा कि हम बतइबो का करब – जब हमके केहू देखले ना चाहेला त हमरा बारे में सुनल आ जानल त चहबे ना करी. असल में हम सबका आँख के किरकिरी हईं. हमके देखते लोगन के आँख परपराए लागेला आ सबलोग हमके अपना-अपना घर में से निकाल के बहरा फेंक देला, एहीसे न कि हम अनेरिया बानी. हम कबो केहू से बोलीला ना, न त कुछ मँगबे करीलाँ. अरे हम त घर-बहरा कहीं चुपचाप पटाइल रहीलाँ, तबो भोर होते सब मरद मेहरारू अपना हाथ में कूँचा-बढ़नी-झाड़ू चाहे खरहरा लेलहीं उठेला, आ घर से बहरा ले झार-बोहार के हमके बटोर के उठा लेला लोग, एतनो पर रुकेला ना लोग. हमके डिब्बा में भर के चाहे छितनी, डलिया, दउरी में उठा के आ दबा के घूरा पर फेंक देला लोग. ई कुल सहीलाँ तबो हम केहू से कुछु ना कहीलाँ. हमरा विश्वास बा कि सौ बोलता के एगो चुप्पा हराइए देला, त मुँह खोलल नीक ना कहाई.

हमार नाँव एह संसार में रहला से रंग-बिरंग के धरा गइल बा – केहू हमके अलियार कहेला त केहू कतवार, केहू कूड़ा-करकट कहेला त केहू कचरा, केहू गंदगी के ढेर कहेला त केहू खर-पतवार, इहे ना अबे त अवरियो केतना नाँव बा जेके हमहूँ नइखीं जाबत. हमरा जनम के बाद हमार नाँव धरे में केहू के सोचे के ना परे. हमरा नामकरण के रसम में कबो न त कवनो पंडित बाबा बोलावल जालन न कवनो विद्वाने से पुछल जाला. केहू इहो ना सोचे कि हमार नउँवाँ देवता आ भगवान लोग के नाँव पर धरा जाइत, त हमरो में ओह लोगन के आभा आ जाइत आ हमहूँ कबो लायक बन जइतीं. जाए दीं नालायक बानी तबे न भोरे-भोरे सभे लोग हमके बहार-झार के अपना-अपना घर से दूर भगा देला. हालाँकि सबके मालूम बा कि हमहीं भगवान के गोड़ो के धूर बनेलीं आ हमहीं साधु-महात्मा घरे ओह लोग खातिर भभूत बन के बइठल रहीलाँ, त भगवान के गोड़ के धूर के लोग कपारे चढ़ावेला आ भभूत के अपना भर देहें लगा लेला. एतना भइलो पर हमके सब दुर-दुरइबे करेला – इहे हमार दसा बा.

हमरा एही बात के संतोष भेंटाला कि लोग हमके सब जगहा से झार-बोहार के हमरा घरे चहुँपा देला,जहाँ पहिलहीं से हमार ढेर भाई-बहिन, माई-बाप, दोस्त-मित्र, भाई-बिरादर, देयाद-पटिदार सब बइठल रहेला लोग. उहाँ पहुँचते सब लोग मिल के हमार सुआगत करेला आ हमके अपना गला से लगा लेला. मानऽतानी कि हमरा घर के नाँव सब लोग घूरा धइले बा – त का भइल, अपना घर में पहुँच के आ अपना सब स्वजन लोग से भेंट क के – हमहूँ बहुत खुश हो जाइलाँ. कहले गइल बा कि एकजुटता में बड़ा ताकत होला, तबे न ओइजा पहुँच के हमरो में बहुते बल आ जाला. हमरा घर में केहू केहू से घिरना आ द्वेष ना करेला. सब एक दुसरा से सटिए-सटिए के बइठल रहेला. उहाँ त जातियो-पाँति के दूरी ना होला. रंग-रंग के हमनी का सब मिल के एक बरन हो जाइलाँ जा. हमरा घर में तरह-तरह के सब कूड़ा आवेला आ जब सब मिल के एक जगह सुतेला-उठेला आ खाला-पिएला चाहे गावे-बजावेला त भगवान के भक्त नियर हमनियो के एकही नाँव पड़ जाला – जेके सब “खाद” कहेला. हमार नाँव बदलते हमरा जिनगी में चमक आ जाला.

जब हम खाद कहाए लागिलाँ तब हमार पूछ बढ़ जाला. लागेला कि लात-जूता गारी-गुप्ता सुनेवाला हमार लइकाईं अब खतम हो गइल. हमरा देह में खाद बनला से ताकत भर जाला – सब जानते बा कि एह दुनियाँ में त ताकतवरे के पूछ होला. जब हमार रूप बदलेला आ हमरा पर जवानी चढ़ जाला तब त हम चमके लागिलाँ आ हमार रोबो बढ़ जाला. अब हमरा के केहू दूरदुरावेला ना बलुक सब लोग हमके जतन से राखेल. हमरा एह घड़ी के बदबूदार साँसो से केहू घबराला ना – ना दूर भागेला. जवानी में अइला आ खाद के रूप धर लेला पर सब हमार मोल-भाव करे लागेला. हमरा के देखे-जाँचे आ कीने-बेसाहे खातिर किसान भाई लोग हमरा लगे ढेर जुटेला. हमार बड़ा आदर-सत्कार होखे लागेला, काहे कि हमरा बिना खेतिहर लोगिन के खेतीए सुन्न पड़ जाला.

हमरा खाद के रुप के जवानी देख के त लोग हमके उठा-उठा के अपना-अपना खेत आ बारी-बगइचा में पहुंचावे लागेला. खेत में हमरा पहुँचते सबकर खेती लहलहा उठेला. भरल खेत के अनाज हमके पा के खुशी के फुल बिखेर देला आ झूम-झूम के लहरा लेबे लागेला, काहे कि हम अपन भरपूर ताकत ओह खेत के अनाज में भर देईलाँ. पेड़-पौधा आ खेत के अनाज के पोर-पोर में हमार रस भीन जाला. हमरा कहे के ई बा कि जबले हमार रस ई मनई लोग ना चूसेला तबले ओह लोगिन के पेट कबो ना भरेला. एतना सब भइला के बादो हमार जवन सीट्ठी बाचेला ऊ फेरू कूड़ा-करकट-कचरा आ गंदगी कहाए लागेला. असहीं हमरो जिनगी एगो गोलाई में घूमत रहेला, यानी हमार बचपन अलियार-पतवार, कूड़ा-करकट आ कचरा कहाला त जवानी खाद बन जाला – जवन हमरा जिनगी में बुढ़ापा कबो ना आवे देला. हमरा जिनगी के दूइगो पड़ाव बा लरिकाईं आ जवानी.

अबही ले रउवा सभे हमरा जवानी के एगो रूप तकलीं हँ आ जनली हँ, जवान अनाज बन के सबका सोझा मे आइल ह. बाकि धीरे-धीरे जवान भइला पर हमार दोस्ती विज्ञान-जगत के वैज्ञानिक लोगिन से हो गइल. ई विज्ञानी लोग जब हमके निरेखल आ हमरा चमक के चीन्ह लिहल त लागल लोग तरह-तरह के खोज हमरे ऊपर करे. जब हम गाँव में रहीं, तब हमार नाता खाली घूरा से रहे आ उहें से खाद बन के हम खेत में चल जात रहीं, बाकि जब हम शहर में आ महानगर में पहुँच गइनी तब त हमके झार-बटोर के लोग एगो जगह में बड़-बड़ टाल लगा दिहल. शहर में हमार तादाद बढ़ गइल. एगो घूरा एके दिन में भर जात रहे, एहिसे हम अपना दोस्त विज्ञानी लोग के पुकरलीं. दोस्ते न दोस्त के मदद करेला. हमरा दुर्गंध से शहर के लोग जब घबड़ा उठल तब सरकार शहर से बहरा हमके रहे खातिर कई एकड़ जमीन हमरा घर खातिर खरीद लिहलसि. हमरा एह नया घर के देखे खातिर बहुते वैज्ञानिक लोग हमरा लगे पहुँचल. ऊ लोग हमरा के देखल आ सरकार के बतावल कि एह कचरा से खाली खादे ना बनी एकर त बहुते नया-नया उउपयोग हो सकेला.

अबे कुछ दिन हमनी अपना नया घर में रहलीं जा कि वैज्ञानिक लोग आइल आ लागल लोग हमरा से बिजली बनावे, फेरु हमरा भीतर से लोग गैस निकाले लागल आ कहल कि हमरा मदद से त बहुते बड़हन-बड़हन कल-कारखाना हमरा देस में चली. हमरा बिजली से अब गाँव के हर घर में उजाला हो जाई. केहु के घरे चुल्हा जरा के खयका ना बनी, गैस हमरा से निकाल के ओही पर खाना बनी, इहे ना कुल काम के करे में बहुते लोग के रोजगार भेंटाई – ई कुल बात सुन के त हमहूँ खुशी से फूल उठलीं. आगे का देखलीं कि हमरे के लेके लोग मोट-मोट किताब लिखे लागल. रोज नया-नया खोज हमरा घर में कइल जात रहे – इहे ना हम पढ़ाइ के एगो विषय बन गइलीं जेके पढ़े खातिर लोग देस-बिदेस में जाए-आवे लागल. हम त अपन एतना महत्व देख के अपने आप में खूब इठलाए आ इतराए लगलीं – कि अब हमरो (घूरो के) दिन फिरल बा.

हमार दिन लवटल तब त हमार पूछ कपारे चढ़ के बोले लागल. अब झार-बुहार के लोग हमके फेंकत नइखे बलुक अस्थिर से सरिहा के धर देत बा. धरहीं खातिर लोग हमके हरदम बटोरत रहऽता. देस में अब हमार रूप निखारे खातिर संयत्र बइठावल जा ता जेमे सैकड़ो लोगिन के रोजगार भेंटाता, उनकर रोजी-रोटी हमरे से चलऽता. सब लोग हमके मशीन में डालऽता आ हमरा पेट में भरल गैस के बाहर निकाल लेता. हमरे से निकलल गैस पर खाना पकावल जा ता आ दीया-ढिबरी जवन चुहानी मे जरत रहे ओहू से फुरसत मिलल कि अब उहाँ हमरे से निकसल बिजली जरावल जाए लागल.

देखीं, ई गैस आ बिजली निकालियो के लोग हमके छोड़त नइखे. मशीन से हमार जवन सूखल सिट्ठी निकलऽता आ बाँच जा ता ओके लोग जैविक खाद कह ता. ई खाद बहुते महँग बिका ता, काहे कि किसान जब एह खाद के अपना खेत में डाल ता त उनकर फसल लहलहा उठ ता. आ ओह लहलहाइल फसल के देखि के किसान हमके चुमे लाग ता.

ई कुल देख के आ जान के त अब हमरो बुझाता कि हमार नाँव लोग भले कचरा धइले बा त का, हम त आज के जमाना में सोनो से ढेर कीमती बन गइल बानी. हमार नाँव त बहुते मनई लोग अपना बेटा के धर लेला आ कहेला कि एह नाँव में ई गुन बा कि हमार बाबू अब जी जइहन. रूप से कुछु ना होला, गुने सब कुछ होला, त हम त इहे कहब कि हमरा नाँव में बहुते गुन बा.

जइसे हमार दिन लवटल, ओइसहीं सात घर दुश्मनो के लवटो. पहिले लोग हमके कूड़ा-करकट, गोबर, गूह-मूत, घास-पात, अलियार-पतियार आ अन्होरिया बूझ के हरदम दूर-दूरावत चाहे लतियावते रहल रहल ह, बाकि आज त एह नया पढ़ाई के हमहीं आधार बानी. हमरा पर लछिमी माई आ सरस्वती माई दुनू के रहि-रहि के कृपा भइल कर ता. हमरा बुझाता कि एह नया जुग में हमार पूछ दिन दूना – रात चौगुना बढ़ते रही आ तब हमार कीमत केहू नाप ना पाई.

हमार विज्ञानी भाई लोग हमरा देह के चमक बढ़ा के हमार दुख दुर भगावल ह आ हमार इज्जत बढ़ावल ह त अब हम ओह लोगिन के आभारी बानी. एह लोगिन के उपकार हम कबो ना भुलाइब आ रोज बिनती करब कि भगवान ओह लोग के दिन दूना – रात चौगुना बढ़न्ती देसु.


पता –
लक्ष्मीबाई नगर, फ्लैट ८२३, टाइप फोर, आई एन ए के सामने, नई दिल्ली २३

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