कबहुँ न नाथ नींद भरि सोयो

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– कमलाकर त्रिपाठी

बाँके बिहारी घर से दुई-तीन कोस चलल होइहँ कि ओनकर माई चिल्लइलिन, ”रोका हो गड़िवान, दुलहिन क साँस उल्टा होय गइल.“
बाँके लपक के लढ़िया के धूरा पर गोड़ राखि के ओहार हटाय के तकलन – ”का भइल रे?“
”होई का ए बाबू, अब अस्पताल गइले का फायदा, दुलहिन बचिहें थोरो!“
”बँचल-बे बँचल अपने हाथ में बा! अरे आपन काम करे के चाहीं, बाकी भगवान पर छोड़ा. चला हो बुझावन. बरधन क तनी अउर बढ़ाय के हाँका.बखत थोरै बा.“

बाँके लढ़िया से नीचे उतरि अइलैं. बुझवना पैना लेके खोदलस ”ओ-ओ तत्-तत् चल रे….“ चिर्र-चिर्र चोंय-चोंय… लढ़िया फिर उहै चाल. आधी रात क समय. आगे-आगे बाँके बिहारी लालटेन लेके राह देखावत. पीछे बुझावन, बैलगाड़ी हाँकत. कबो-कभार तिवराइन क कँहरब, साँस के घरर-घरर आ बाँके के माई के रहन-समुझावल.
”अब बस करतिउ दुलहिन. तोहरे रहले कवन सुख, गइले कवन दुख. बीस बरिस होइ गइल, जोगवत बीतल. कगजै के दोना लेखिन. आज साँस, परसों बोखार. लगबे ना कइल कि हमरहूँ घरे पतोह आइल. सोचलीं कि बुढौती कवनो किनारे लगि जाई. केहू एक लोटा पानी त देई. इहाँ त नाती-पतोह के पिसाब-पखाना में बुढ़ौती तरत बाय.“

बाँके के काने में कुछ सुनाई परल, कुछ नाहीं. लेकिन मेहरारू के एह समय पर महतारी क बोलल नीक नाहीं लगल. पिछउँड़ होइके डपटलैं, ”क रे माई, तोके एही टाइम भुनभुनाए के मौका मिलल! कहलीं घरहीं कि रहे दे. लेकिन मनले नाहीं. जतनै करबै ओतने बोलबै. एसे त न करते, तबै नीक रहत. अब बइठि के परान निकरल अगोरीं कि दवाई-बिरो करीं.“
”का करब बोलि के बाबू! के सुनी! जेके सुने के रहल ते त कब्बै चलि गइल. अब बइठि के आपन दिन अगोरत रहलीं त पतोहे क समय देखत हईं. तोहरे जइसन पूत जौन न देखावैं बाबू! अरे ई कुल्ह लिखल नाहीं होत त का करेके बइठल रहतीं!“

बाँके चुपाय गइलैं. ढेर बोलतैं त बाति बढ़त. मेहरारू त मेहरारू, माई के कइसै छोडैं! दुनिया भ के अकिल, पोथी-पुरान कुलि ई दूनो मेहरारू के सामने दुई कौड़ी के. माई त माई हौ, सत्तर-बहत्तर से बेसीअ होई, के जानै अउरो ज्यादा, बाकिर जांगर हाथी के. न कब्बो सर्दी बुखार छुअलस न कौनो चोट-चपेट. बोली टाँय-टाँय, जवान का बोली! लरिकाई से जबसे बाँके होस सम्हरलै तब से महतारी क ईहै बोली. बाप सुतलै रहैं कि माई कूचा-झाड़ू लेके अँगना बहारत ओसारे पहुँचि जाय. कुछ खुसुर-फुसुर बताउ आवे. कुछ काल्हि के ओरहन, कुछ आज के काम सँउपल. दादा कब्बो-कब्बो घुड़कैं त माई पटाय जाय आ कब्बो माई डपटि के ओनहीं के चुप कराय दे. बाँके सोचैं कि ओके डपटले, जुलाब होइ जाला का कि दादा तुरंते लोटा ले सिवाने चलि देलें! अब जो निपटले के जोर न रहे त गोरू के सानी-पानी करे लगें नाहीं त लवटले के बादै. कान पर जनेव तउधिक चढ़लै रहै, जब तक दूनो लुलुहा सानी में न बोरि उठै. माई तउधिक नहाय धोय के पाठ करे बइठ जायँ.
सुनि जननी सोइ सुत बड़भागी.
जेहि पितु बचन राम अनुरागी..

– ”बाँके, उठबो करबा कि सुतलै रहबा!“
बाँके गुड़िआइल-मुड़िआइल उठैं. चादर ओढ़िके बइठले-बइठले एकाध झोंका फिर मारि लें, किताब खोलले. आधा पढ़ाई, आधा रामायण में बाझि जायँ. अंग्रेजी साइंस कठिन लागै. अँखिया बंदो रहै त चौपाई पढ़ाय, खुललो रहै त चउपइए पढ़ाय. माई कब्बौ न डँटलस न डपटलस. बाकिर बाँके के नीके-बउरे पर ओकर अहकल बाँके के ऊपर अइसन असर कइलस कि बाँके फुरै बाँके होय गइलन.

जेही देखै तेही कहै ”अरे ई सुन्नर तिवारी के भाग में कहाँ! ई त कुल्ह बाँके के महतारी क तपस्या ह बाबू, जौन फरत-फूलत बाय.“ जेस-जेस बाँके बढ़लै वइसै-वइसै ओनकर त कम, ओनके महतारी के नाव गाँवै-गाँव महकल. गाँवै गाँवै घूमै हाथी जेकर हाथी, तेकर नाँव.

गाँव के कंकड़हिया राहि ओराइल त चाकर बड़की सड़क मिलल. लढ़िया के चुर्र चूँ कम भइल. बरधन के कुछ चालि तेज भइल त बाँके रहि-रहि के पिछड़ जायँ. बाँके के माई से नाहीं रहि गइल. पतोहे के कहँरल छोड़ि के लइका के ओर चिरउरी कइलिन, ”बाबू कतना पैदल चलबा, ललटेनिया जुअवा में बान्हि द आ अपने बुझवना लग बइठि जा. हाली-हाली चलबा त गोड़वो पिराई.“

बाँके सोचले कि कहीं कि क रे, तोर हमरे गोड़ पिरइला के एतना चिन्ता बाकिर पतोह हाँफत-हाँफत अधमुअलि हो गइल, तब्बो ओके घर से बहरा नाहीं निकरे दिहले! लेकिन सोचते मन दहलि गइल. माई फेरू रोवे-सरापे लगी. दुलहिन बिहोसियो में अगर सिसके लगिहें त अउर जौन जियले क दुइ-चार पइसा भरोसा बाय ऊहो कम होइ जाइ. बाँके लपक के लढ़िया के बाँस पकरि लेहलें. अब ललटेन क कौन जरूरत. पक्की सड़क पर त पहिया अपने आपे ढुरकत चलि जाला. आ स्टेशनों त दुइए कोस रहि गइल. ललटेन पटिया में लटकाय के बाँके लम्मा-लम्मा परग डारे लगलै. दुलहिन क कहँरलो कम हो गइल. हचका-गड़हा क जब कुछ आराम बुझाइल त माइयो के आँखि लग गइल.

आधी रात क समय. दू बजे रात वाली गाड़ी पकड़े के रहल, जवन बिहाने गोरखपुर पहुँचि जाय. बाकिर अबहीं बैलगाड़ी के कम-से-कम दुइ घंटा के राहि. एक एक मिनट पहाड़े जस बीतै. दुलहिन क साँस जोर से चलै त डर लगै कि अबै खतम न हो जायँ आ पटाय जायँ त डर लगै कि जान बाय कि नाहीं. बाँके के लगल कि दुलहिन कुछ कहति बाटिन. पटिया पकरि के कमरा फाँफर कइलैं, ”का हो, कुछ कहति हऊ का?“

”ऊपर चलि आईं महराज, केतना पैदल चलब, आ कौन अब जियले के लच्छन बाय कि ई लहासि ढोअत हईं! अरे अब गइले के समय त गोड़ हमरे लगे रहे दीं!“

बाँके बूझि गइलैं कि माई करेरे सूति गइल बाय, नाहीं त दुलहिन क हिम्मत नाहीं परत कि एतना बोलि पउतिन. कुछ थकल, कुछ मोह, कुछ अमरख. बाँके रोकि ना पउलैं, ”अच्छा चला. कहति हऊ त बइठि जात हईं. बुझवना, तनी आगे दब त. कहा, का कहत हऊ?“

आगे जूआ पर बुझावन, बीचे में बाँके, बाँसे के खपाची पर ढकल ओहार, ओमें दुलहिन, दुलहिन के अउर पीछे थकल-हकसल महतारी. बाँके तिरपाल हटाय के दुलहिन क हाथ पकरि के पुछलैं, ”कइसन बा तबियत?“

का बोलै दुलहिन? जेतना दम बचल रहल ओतना लगाइ के त बोलय लेहलिन. बाकी बचल-खुचल साँस आँखि में उतरि आइल. बड़हन आँखि अउर निथरि गइल. एक त अन्हियार, दुसरे चकवा लेखा फइललि पुतरी. कुलि लोनाई-सुकुअरई गलि के अँखिए तक रहि गइल रहल. कुछ लालटेन के अँजोर जब आँखि पर चमकल तब बाँके के लगल कि लोर ढरकल बा. गाले पर से पानी पोंछि के बाँके पुछलै, ”का हो रोअत हऊ! कहूँ दुखात-पिरात बा?“

कइसो जोर लगा के गटईं हिलवलिन, बाकिर ऊ हिलल नाहीं. खाली अँखिए नाचि के रहि गइल. मुँह से कुछ कहतिन लेकिन ऊ एस फइलल कि बुझाय ढेर दिन पर भेट भइले वाली हँसी होय. महतारी क डर आ लाज छोड़ि के बाँके मूड़ी उठाय के जाँघे पर धइ लेहलैं. दुलहिन क साँस जेतने जोर से आगे भागत रहल, बाँके क मन ओतने पीछे खसक गइल. बीसन साल पीछे. अइसहीं बाँके लौटत रहलैं घरे, गवन कराइ के, इहै बुझवना तब्बो गाड़ी
हाँकत रहल, अइसनै हँसत-रोअत-लजात दुलहिन, अइसैं डरात- लजात बाँके. तब पीछे नउनिया रहलि, आज ओंही माई सूतलि बा. तब बाँके पढ़े देस-दुनिया, दुलहिन पढ़ै चउका अँगना. तिवराइन करैं पूजा-पाठ, महीनन चन्द्रायण व्रत. कौर-कौर बढ़ावै, कौर-कौर घटावैं. जइसे चन्द्रमा बढ़ैं, जइसे चन्द्रमा घटैं. सुनि के गाँव-जवार आहि-आहि करै.

अइसन तपस्विनी के होइ रे! तिवारी बाँचें कथा-भागवत, लेकिन घर में अस दरिद्रै के बास कि कब्बो डेउढ़ी न लाँघै. जेस-जेस तिवराइन क पूजा-पाठ बढ़ै, तिवारी क चेलाही कमजोर परत गइल. चेलन के लड़िका सब पढ़िलिखि के शहर गइलैं, बूढ़-ठूँढ़ मरि-हरि के छुट्टी. के सुनै पोथी-पुरान, के चढ़ावै भागवत पर रुपया-पइसा. टूका-टटका जोरि-जोरि के कुर्ता-ब्लाउज के जुगाड़ होय इहै बहुत रहै.

कभी-कभार सालि भर में केहू बड़का घर के मरनी करनी पड़ै तब सज्जा-छूअल पर काम बढ़ै, नाहीं त उहै पितरपख कै कमाई, बीस आना घर, अब चाहैं एक तिथि पर चार घर निपटै चाहे एक्को नाहीं. तिउराइन चउकठे पर अगोरतै रहि जायँ कि तिवारी क पुरनकी बगली कान्हे पर से लदल उतारीं, बाकिर तिवारी मुँह लटकउले पसीने पोंछें – ”यस्यामि अहं अनुग्रहणामि हरिष्यामि तद् धनै शनैः“

हर बाति के जबाब पंडित लगे रहै. दुखो में मगन. सुखो में मगन. न तिउराइन सुदामा के मेहरारू लेखा रटिके जजमान किहाँ दउरावै, न तिवारी हहक के दुर्वासा क्रोध पुजावैं. दरिद्रई आ संतोष, जइसे गोड़ तूरि के दुआरे बइठ गइल होय. अइसने में सासुओ से बढ़ि के बीस गुना संतोषी पतोह. एकै पतोह, उहो एस सोहावन कि डेउढ़ी में गोड़ परतै बाँके के नोकरी लागि गइल. तिउराइन जवन पवलिन तवन लुटवलिन, न आगा देखलिन न पाछा. अपनो गइल
बिटउओ क गइल आ पतोह से का पूछैं कि कवन चीज रखीं कवन चीज बाँटी. झाँपी बँटल, गहना बँटल, खेलवना बँटल, धोती बँटल – अइसन बँटल जइसन कि पार्वती जी कुरमिन-खटकिन के सोहाग बाँटै. बाँके कइसों एके राति रह पउलैं. छोट घर, ढेर नाता-रिस्ता वाले, न उठे क जगह न बइठे क जगह. कइसों-कइसों पूजा के कोठरी अलगिआवल गइल. आधा में सामान, आधा में भगवान. कोने अँतरे सकपकाइल-डेराइल दुलहिन आ ओसे चौगुना
चिहुँकल बाँके. कब अइलैं, कब भोर भइल, जानिउ नाईं पउलैं. कुल्हि मान-मनउअल मने में रहि गइल. इनके बोली के ऊ तरसैं ओनके बोली के ई. गाँव भर में मेहरारू हल्ला कइलिन, का ए बहिनी, दुलहिन त अइसन ठस्स कि मुँहे ना खुलल. जब धान-पान कुटलैं में गइबे-बजइबे ना कइलिन तब का जानीं कि गाँव टोला में पतोह आइल बाय.

तिउराइन छेंके लगलिन. ”भागि नाहीं देखतू ओकर. अउते बाबू क नोकरी लगि गइल. गउले-बजउलै से पेट चली! जनम त बीति गइल दुसरे के दुआरे ओर ताकत, अब जा के भगवान सुनलै. अबहिन तक बनवास भोगलीं, अब त दिन फिरल.“

बाकिर तिउराइन क सपना सपने रहि गइल. बाँके आधा गुन माई के त आधा गुन बापे के पउलैं. जौन बिगड़े तौन अपना चलते जौन बनै दुसरे के. न महतारी के सुख पउलैं न बापे के. बाप क जाँगर खसकल, आँखि गइल, अब पोथियो-भागवत बाँचे लायक ना रहि गइले. अधिया-बटइया खेती, पेट भरे के हो जाय उहै बहुत. तिवारी-तिउराइन लइके के भजत दिन बितावैं, कब हमार सरवन अइहैं, कब हमार दिन फिरी. दुलहिन क कुल आस मनहीं में रहि गइल. दुइ चार महीना पर बाँके आवैं, एक दुई दिन खातिर. न माई निहारत अघाय न बाप बतिआवत. बचलिन दुलहिन, त टुकुर-टुकुर ताकैं, चउका-बरतन सम्हारैं आ अगोरत-अगोरत खटिया पर ढुरुक जायँ आ फेर तिउराइन के खोंखलहीं प जागैं. बाँके रातिभर कबों बापे के गोड़ दबाइ के मन जीतैं त कबौ माई के मूड़ दबाई के तरैं. जबतक दुलहिन क सुख-दुख जाने क फुर्सत मिलै तबतक गइलै क दिन आइ जाय. साल क साल बीतल. मुँहदुब्बर बाँके तिउराइन के दुख आ बापे के उमिर देखि के कबौं ना कहि पउलन कि माई, दुलहिन के शहर भेजि द. कुछ जनलैं, कुछ नाहीं. दुइ-दुइ लइका नुकसान भइल. दुलहिन क मान घर में न कम रहल न बेसी, लेकिन तिवारी-तिउराइन नाती क मुँह देखे के तरसि गइलैं. किरिया खाए के शहर में जो दुलहिन गइबो कइलिन त माई के डरे आ बाप के लिहाजे बाँके महीने बीस दिन में वापस पहुँचाय दें. नौकरी के कमाई पढ़ाई के करजे भरे में रहि गइल. जौन बचल-खुचल ऊ कच्चा मकान क पक्का बनावै में लगल. तिवराइन मोहायँ त बहुत, बाकिर दुलहिन क बेमारी पर पइसा फूँकल उनके हरदमे अखरे. ”का बताईं भागि के! भगवान के लइका के दुइ पइसा कमइयो नाहिं देखि जात बाय. एतना उमिर होय गइल. केतना बार मरि के जियलीं बाकिर अस्पताले क मुँह ना देखलीं. एकठे पतोहो आइल त उहो रोगे क घर. लइका त लइका गइल देंह दसा अलगे. रहे द दुलहिन, अपनै देखा. बुढ़वा-बुढ़िया भ के हम कइ लेब. का कहीं बाबू क भागि! देखा कब भगवान लिलारे चन्नन लगावैलैं.“

दुइ तीन लइका के नुकसान भइले के बाद कइसों एक ठो बेटी बँचल. तिवराइन क कुलि हौसला पस्त. तिवराइन आपन करिहाँव सोझ करैं, कि तिवारी क मूड़ दबावै! आपन लइका सम्हारि नाहीं पवली, ई चिरई क बच्चा कहाँ पोसैं? टोला जवारे के मेहरारू तिउराइन के परवचन सुनैं, तिवारी दुअरे पर कथा बाचैं, लगे-लगे गाँव क जजमानी संभारै आ बाँके बाप-महतारी के अज्ञा अगोरैं. दुलहिन क देह जौन गिरल तौन उठल नाहीं. तिवारी पतोहे कै कँहरब सुनैं त पंडिताइन के ऊपर कोहराम मचाय डारैं.

तिवारीइन करैं त बहुत, लेकिन बोलैं ओतनै. कुछ खर-बिरैया दवाई भइल, कुछ गाँव के वैद क काढ़ा चूरन, बाकिर दुलहिन जौन गिरलिन तौन उठलिन नाहीं. बाँके कबो मौका ताकि के पूछैं, ”कहतिउ त सहर चलि चलतीं, कब तक इहैं खर-बिरैया दवाई के सहारे परल रहबू?“
”अब कहाँ ले चलब महराज. अगोरत-अगोरत त उमिर बीति गइल. केतना करवा चौथ आइलि चलि गइलि. बरिस-बरिस क बट-सावित्री बरत बीतल, नया पंखा से हम कब्बो आपकै देहि नाहीं हाँकि पउलीं. दुनिया तीरथ धाम कइलस, हमरे करम में काशी परयागो नाही लिखल बाय. भगवान चुनरी पहिरले एही घरे ले अइलैं, अब चुनरियै ओढ़ाय के आपके कान्हें पर घाटे भेजि दें, अउर का चाहीं.“

बाँके बोलें का? आँखि क कमजोर बाप. करिहांइ के निहुरल, गटई थमले कहँरत महतारी. केकरे सहारे केके छोड़ैं. बियहले के बाद नौकरी लगल. सोचलैं दुई-चार पइसा जुटि जात, कहे सुने लायक दुई क घर किराया पर ले पउँतैं तब दुलहिन के ले जातैं, बाकिर बापे के पुरनके कर्जा से उबरैं तब न. गाँव जवार क खातिर. नात-रिस्तेदार क आइब-जाब. कुल सोचल जइसै क तइसै धइलै रहि गइल. इहो जीअल कौनो जीअल ह. कौने काम क मरदई, कौने
क अकिल. बिआहे में गाँठि जोरि के केहूँ के आसरे कहू क बिटिया ले के चलि दे आ ओकरे मरले जिअले क खोजो-खबर न ले पावै! सबसे नीकै बनी के का होई जब अपनै कुलि बिगड़ जाई. बापे-महतारी क सरवन कुमार, गाँव-जवार क दुलरुआ अपने मेहरारू खातिर एक ठे लुगरिओ न जुटाय पावैं, अइसन पढ़ल-लिखल कौने काम कै!

राहि ओराय गइल त सोचिओ ओराय गइल. बैल गाड़ी स्टेशन के राहि पर घूमि गइल. बुझावन पगहा तनलैं त दहिनवारी बरध पीछे गोड़ धरे लागल. शायद चक्का के आगे कौनो बड़ा ईंटा पड़ि गइल. बुझावन चिल्लइलैं ”बाबू तनि उतरल जाय चक्का कहूँ बाझि गइल बा. तनि पीछे से धक्का लगाय देईं.“

बाँके हाथ खींचि के उतरल चहलैं बाकिर हाथ दुलहिन के गाले तरे दबाइल रहल. दहिने जाँघि पर दुलहिन क माथ, उठैं कइसे!
”दुलहिन तनि माथ उठावा. चक्का फँसल बा. धक्का देबे के खातिर उतरल चाहत हई. दुलहिन के दम रहै तब न सुनै.“ अबहिन तक कुलि सुनतै रहलिन, मनतै रहलिन, बाकिर अबकी जइसै कुल मान, कुल रूप अँखियै में उतरि आइल. अइसन रूप बाँके जनम भर न देखलैं. लगल कि ‘नाहीं’ कहत बाटिन. चिल्लइलैं ”बुझवना, लालटेन त ले आव. माई के जगाव त तनीं.“

लढ़िया खड़ी होय गइल. बुझावन ”काकी उठल जाय“ कहि के पीछे से लपक के पीढ़ई पर खड़ा होय गइलैं. दुलहिन क साँस जतने खिंचाय, जेतने लम्बा होय मुँह पर वइसै-वइसै हँसी बढ़त जाय. बिना आवाजै कै हँसी. दूनो कोना धीरे-धीरे फइलल, उभरल आँखि, अब का दुलहिन हाथ छोड़ें! जइसै हाथ पकरि के सबके सामने मड़वे में किरिया खाय के पंडित बिआह करउलै वइसन संजोग आजै मिलल. तब आवेके रहल, आज जाय के बाय. अइसन केकर भागि होई! सत्यवान सावित्री के जाँघी पर माथ धई के चलि देहलैं, सावित्री आपन परताप-तपस्या से सत्यवान के जमराज के हाथे से छोरि लेहलिन, इहाँ त उल्टा होय गइल. सावित्री के खातिर अब कौन बरत सत्यवान करैं! कौंनो अइसन बरत न पोथी पुरान में न गाँव के कहाउत में. बाँके क कुल देंह कनमनाय गइल. करेजा में हूक उठलि, बुझाइल कि चिल्लाय के रौइतैं छाती पिटतैं कपार फोरि देतैं तबो हूक न मिटत. लेकिन जे खुलि के हँसलस नाहीं ओकर रोअब कस!

साँस रुकि गइल. आसो रुकि गइल. तिउराइन चिल्लइलिन ”कहत रहली बाबू, एह हालत में न घर से चला. कौनो बचे क उम्मीद थौंरे रहल, बाकिर तू मनबा काहें! अब त राहि में परल निकरल न.“

सीवाने में गाड़ी क घरघराइल सुनाइल. गाड़ी टीसन से खुलि गइल, एह जनम से दुलहिनो के छुट्टी मिलल. तिउराइन कुछ रोअत रहलिन, कुछ कोसत रहलिन, कुछ आपन भागि कुछ बेटवा क भागि. बाँके कान में कुछु न सुनाई परै. करेजा के हूक करेजा में रहि गइल. भगवान एतने के साथ लिखले रहले पूरा भइल. के जानो कबो कवनो सत्यावानों सावित्री कऽ परान यमराज से छोड़ाय पावैं. तब कउनो दूसर बरत होई, कौनो दूसर पुरान बनी आ गाँव-गाँव कथा कहल जाई.


(पाती पत्रिका के अंक 75 ‘प्रेम-कथा-विशेषांक’ से साभार)

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  • एइसन कहानी हमरे दिल के हिला के रख दिहलय भारत में खासकर बडी जातियों में बहुओं को आज भी ग्रामीण इलाकों में खासी परेशानियाँ झेलनी पड़ती है और समस्या तब पेचिदा हो जाती है जब सास पढी लिखी नहीं होती नमस्कार

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