(स्मरण – आचार्य गणेशदत्त ‘किरण’)
(पाती के अंक 62-63 (जनवरी 2012 अंक) से – 9वी प्रस्तुति)

– रामजी पाण्डेय ‘अकेला’

‘किरण’ जी का बारे में, हमार छोटकी चाची जे बसाँव के स्व॰ बृजा ओझा के बेटी हई, बतवली कि – ‘बैरी के ‘गनेशदत्त तिवारी’ भोजपुरी में बड़ा निमन कविता लिखेले आ बड़ा जोश में गावेले’. हम पता लगवलीं त ‘किरण’ जी हीत नाता के दायरा में आ गइले. पहिली मुलाकात ‘किरण’ जी से हमरा बिहिया कवि सम्मेलन में सन् 1968 में भइल. ओहिजे स्व॰ कमला प्रसाद मिश्र ‘विप्र जी’ हमनी दूनो आदमी के परिचय करवले. ओही सम्मेलन के दरम्यान हमहन में इयारी बढ़ल, जवन उनका मरते दम तक रहल. कवि सम्मेलन खतम भइला के बाद हमनी के खियाइ के एगो छोटे कोठरी में जमीन पर चारि गो बोरा बिछा के आयोजक के एगो कार्यकर्त्ता कहलसि कि – ‘रउवां सभ एही में आराम करीं, हम फेरू सबेरे आके विदाई कइ देबि’. हमनी का प्रतीक्षा करे लागलीं जा कि जाड़ के दिन बा त कवनो ओढ़ना-बिछौना ले आई. बाकिर ओकरा त आवहीं के ना रहे से नाहिये आइल. आध घंटा तक प्रतीक्षा कइला के बाद ओही सीलन भरल कोठरी में बोड़ा के बिछौना पर हमनी का दूनो आदमी आपन दूनो चादर साटि के सुते के प्रयास करे लगनी जा. मगर जाड़ा नीचे-ऊपर से अतना लागत रहे कि नींद आवे के सवाले ना रहे. काहें कि जाड़ से डेरा के उँघई महरानी विद्रोह कइ देले रही. जब जाड़ा से परेशनी ज्यादा बढ़े लागल त हम ‘किरण’ जी से कहलीं – ‘मरदे हमनी का त इहाँ जाड़े कठुआ जाइबि जा. तीन बजत बा. चलीं जा स्टेशन, चार बजे गाड़ी मिली त हमनी का बक्सर पाँच बजे पहुँचि जाइबि जा. आठ बजे ले सुतियो लेबि जा.’ दूनों आदमी बिहिया स्टेशन आके बनारस एक्सप्रेस पकड़ि के पाँच बजे तक बक्सर पहुँचि गइलीं जा. ओघरी हम स्टेशन के पासे चीनी मिल में एगो डेरा 10 रु॰ भाड़ा प लेले रही. जब चीनी मिल बेचाये लागल त हम ओही डेरा के खरीदि के आजु मकान बना लेले बानी. हमनी के ओह कवि सम्मेलन में एको पइसा के बोहनी ना भइल. किरण जी के पता ना कउँवा कवि सम्मेलन रहे, बाकिर हमार त पहिलके रहे.

दूसरकी घटना भलुनी भवानी में भइल. ओहिजा देशहरा में अष्टमी के दिन मेलों लागेला आ ओही धकाधुकी में ऊहाँ के लोग एगो विशाल कवि सम्मेलनो करा देला. ‘किरण’ जी कई साल से ऊहाँ आदर के साथ बोलावल जात रहन. सन 1972 में हमनी तीन आदमी के ‘किरण’ जी कहले कि तहनियो लोग चलऽ जा काहें कि ओहिजा के आयोजक का ओरि से हमरा पर जिम्मेदारी सऊँपल बा.’ हमनी का ओही दिन आठ बजे बक्सर से मोटर साइकिल से पयान कइनीं जा, बाकिर अभाग्यवश जवना राजदूत पर ‘किरण’ जी चढ़ल रहन ऊ मोटर साइकिल कोचस में करीब साढ़े नव बजे अड़इल घेड़ा नियन अड़कि गइल, लाख किक मरलो के बाद स्टार्ट होखे के नाम ना लिहलसि. कवि सम्मेलन होखे के समय दस बजे दिने में राखल रहे. दस बजत देखि के ‘किरण’ जी बेचैन हो गइले. काहें कि कवि सम्मेलन के संचालन उनके करे के रहे.

कहले – ‘का हो ‘अकेला’ अब त ईज्जति दाँवपर लागल बा. कइसे पहुँचल जाई ?’

हम कहलीं – ‘हमार भिकी ना धोखा दीही, आईं, एकरे पर बइठीं. हम 11 बजे तक पहुँचा देबि आ ए लोग के छोड़ि दिहल जाव. ई लोग गाड़ी बनवा के आई.’ हमनी का भिकी से चलि दिहलीं जा. मगर वाह रे भाग्य आधा घण्टा के बादे ‘किरण’ जी के एक कुंतल के बोझा ढ़ोवे से हमार भिकी जबाब दे दिहलस. भलुनी से दस किलोमीटर पहिलहीं गरम होके बन हो गइल. बन भइला के बाद ‘किरण’ जी के चेहरा के बेचैनी आ घबड़ाहट देखे में आवत रहे. ‘किरण’ जी कहले – ‘का हो अकेला अब का होई ? अब त लागता कि हमनी का ना पहुँचबि जा.’ हम सांत्वना देत कहलीं – ‘घबड़ाई मति, उपाइ करऽतानी’. अतना कहि के हम आपन गमछी पानी में भेंइके ले अइनी आ भिकी के इंजिन में लपेटनी. दस मिनट के बाद स्टार्ट कइलीं त ऊ स्टार्ट हो गइल. ‘किरण’ जी के चेहरा गुलाब नियर खिलि गइल. फेरू हम ओकरा के बीस कि.मी. के चाल से चलावत आधा घंटा के बादे याने करीब 11.30 बजे तक कवि सम्मेलन स्थल पर पहुँचलीं जा. ओनियो आयोजक के ‘किरण’ जी के ना पहुँचला से मुँह में लावा फूटत रहे. सामियाना में करीब बीस हजार श्रोता कवि सम्मेलन शुरू होखे खतिर परेशान रहलन.

कवि सम्मेलन के अध्यक्षता नामी गिरामी भोजपुरी आ हिन्दी हास्यरस अवतार रामेश्वर ‘कश्यप’ ‘लोहा सिंह’ के करेके रहे. उनका सासाराम से आवे के रहे. ऊ अपना जीप से नवे बजे पहुँचि गइल रहन. एह से स्टेज पर विराजमान रहन. जाते स्टेज पर ‘किरण’ जी के भरि अंकवारी धइके कहले – ‘का मरदे अतना देरी क के अइल हा जा. तहरा बिना कवि सम्मेलन शुरू ना कइल जात रहल हा.’

एकरा बाद कार्यक्रम के अनुसार कवि सम्मेलन शुरू भइल. जमल भी, लोग हास्य, वीर, शृंगार रस में पाँच बजे शम तक सराबोर होखत रहल. पाँच बजे के बाद हमनी के ठहरे आ चाय-नाश्ता के व्यवस्था एगो स्कूल में कइल गइल रहे. खइला-पियला के बाद रात खा ‘लोहा सिंह’ के छोड़ि के हमनी करीब बीस गो कवियन खातिर स्कूल के एगो कमरा में नीचे जमीने पर एगो बड़का दरी बिछावल रहे, तवने पर आग्रह से कहल लोग कि – ‘एही पर रउवा सभ आराम करीं आ हमनी का रउवा सभे के सबेरे, सात बजे तक चाय-नाश्ता कराके बिदाई कइ देबि जा.’ सबेरे आयोजक लोग बड़ा प्रेम से ‘किरण’ जी के पचास गो आ हमरा के पचीस गो रुपया थम्हाइ के हाथ जोरि लिहल. ओह घरी हम अपना भिकी में बीस रुपया के पेट्रोल भरा के गइल रहीं. त समझीं हमार मेहनताना मात्र पाँच रुपया मिलल. जमीन पर सुतला से देंहि अकड़ि गइल. पीठी के हड्डी में दूनों आदमी के दरद हो गइल. कोचस आ के हम पाँच रुपया के दवाई किनि के अपने आ ‘किरण’ जी के खिअवलीं ताकि दरद जल्दी ठीक हो जाउ. तबे से दूनों आदमी कान धइनी जा कि अब भलुनी भवानी के कवि सम्मेलन में ना जाइल जाइ. कई बार लोग ओकरा बादो बोलावे आइल बाकिर हमनी के जे कसम खइलें रहलीं जा ऊ ‘किरण’ जी के मरे तक निबहल.

तिसरकी घटना बलिया सतीशचन्द्र डिग्री कॉलेज के बा. हमनी के चेला अखिलेश भट्ट ओघरी ओही कॉलेज के विद्यार्थी रहे. ओही कालेज के डॉ॰ आद्या प्रसाद द्विवेदी पटना आवे जाये के दरम्यान हमरा किहां ठहरत रहन. एही से हमरा साथे ‘किरण’ जी आ पीयूष जी के बोलावे के प्लान बनल. ‘किरण’
जी किहाँ खबर आइल ‘अकेला’ जी आ ‘पीयूष’ जी के जरूर ले के आइबि. रउवा सभ के खरचे-बरच दियायी.

हम अपना राजदूत में पचास रुपया के तेल भरा के ‘किरण’ जी आ ‘पीयूष’ जी के लेके ओह कवि सम्मेलन में पहुँचलीं. कवि सम्मेलन के संचालन मशहूर संचालक सूंढ़ फैजाबादी करत रहन. पहिले ‘किरण’ के ई कहिके बोलवले कि – ‘किरण जी तो शरीर से पहलवान एवं वीररस के बेजोड़ कवि हैं मगर उपनाम से स्त्रीलिंग हैं. अब आप इनकी कविता से सराबोर होइये.’ ‘किरण’ जी एक हाजिर जबाव आदमी. माइक पर जाते बोलले – ‘रउवा सभ ना जानत होखबि कि सूंढ़ फैजाबादी के नाम काहें पड़ल ? त हम बतावतानी. सूंढ़ फैजाबादी के जनम फैजाबाद के हाथीखाना में भइल रहे. एही से इनकर नाम इनकर माई-बाबू सूंढ़ फैजाबादी राखि दिहले.’ अतना सुनला के रहे कि – हाल ताली से गड़गड़ा उठल आ लोग हँसत-हँसत दोबर होखे लागल. एकरा बाद ‘किरण’ जी अपना वीररस के काव्य ‘किरण बावनी’ के गर्जना के साथ सुना के महफिल लूटि लिहले. हम इनका साथे पचासो कवि सम्मेलन में गइल बानी बाकिर कवि सम्मेलन के स्टेज पर इनका जोड़ के हिन्दी भा भोजपुरी में केहू कवि ना मिलल. एह तरी त दिनकर जी के राँची के स्टेज पर देखले बानी. उनुको के सुने के मोका मिलल बा बाकिर हमरा आजु तक इहे बुझाला कि अगर किरण जी कवनो बड़ा टाउन पटना भा दिल्ली रहिते त ‘दिनकर’ से कम नाँव ना रहित.

सूंढ़ फैजाबादी आशु कवि रहन. ऊ हमरा के ई कहिके परिचय दिहले कि – ‘ये अकेला हैं, इनका ‘अ’ हटाइये, केला बनाइये और खा जाइये, अब अकेला जी माइक पर आ जाइये.’ हाल में ठहाका लागल, लोग हँसत-हँसत बेहाल होखे लागल. जब माहौल शान्त भइल त हम कहलीं – ‘असली बात त सूंढ़ जी कहबे ना कइनी हाँ, इहाँ का ‘लाल किला एक्सप्रेस’ से आवत रहीं, हम ओह घरी मोगलसराय तार घर में काम करत रहीं. बलिया हमसे ओही गाड़ी से बक्सर उतरि के आवे के रहे. गाड़ी अइला पर जब आफिस से बहरी प्लेटफार्म पर अइनी त देखनी सूंढ़ जी थर्ड क्लास डब्बा के सामने भरुका में चाय लेके पियत रहन. एक बेरि इहाँ का बक्सर कवि सम्मेलन में आइल रहनी एह से हम पहचानि लिहलीं. पंजरा जाके प्रणाम – पाती कइला के बाद, पुछलीं कि – ’शायद रउवा बलिया कवि सम्मेलन में जा तानी ?’ ऊ ‘हँ’ में जवाब दिहले. हम बतलवनी कि हम इहँवे रेल में काम करीले. हमरो बलिया चले के बाटे. रउवा कवना डब्बा में बइठल बानी त ऊ जवाब दिहले कि – ‘एही सामने वाला थर्ड क्लास के डब्बा में बइठल बानी.’ ओह घरी रेलगाड़ी में थर्ड क्लास के सेकेण्ड क्लास ना बनावल रहे.’ हम कहलीं – ‘चलीं हमरा साथे फर्स्ट क्लास में. बक्सर तक कवनो परेशनी ना होई.’ दूनो आदमी आगा बढ़ि के फर्स्ट क्लास में बइठली जा. कुचमन स्टेशन आवे के पहिले हम लघुशंका करे पैखना घर में गइलीं. अभी ओही में रहीं तलक गाड़ी कुचमन में आके रुकि गइल. गाड़ी के रुकते दूनो ओरि से मजिस्ट्रेट चेकिंग खतिर पुलिस, टी॰टी॰ई॰ कइगो ओह डब्बा में चढ़ि गइले. सूंढ़ जी जब हमरा के ना देखले त पैखाना में जा के सिटिकिनी भीतर से बन कइके लुका गइले. हम जेवना सीट पर बइठवले रहीं, ओहिजा आके खोजे लगलीं त पता चलल कि पैखाना में गइल बाड़े. हमहूँ घबड़इली कि कहीं उनका के पकड़ि के उतारि मति लेले होखन स. एह से पैखाना के पासे दुआरी पर आके देखे लगलीं. त देखऽतानी कि दूगो पुलिस पैखाना के दरवाजा पीटत कहऽतारन स कि ‘निकलो बाहर नहीं तो हमलोग पैखाना का दरवाजा तोड़ देंगे एवं बाद में खातिर भी करेंगे.’

लाचार होके सूंढ़ जी दरवाजा खोलि के निकलले त टी॰टी॰ई॰ पूछलसि – ‘टिकट दिखइये’ सूंढ़ जी आपन टिकट दिहले. टी॰टी॰ई॰ बोलल- ‘थर्ड क्लास का टिकट लेकर फर्स्ट क्लास में चलते हो ? पेनाल्टी के साथ भाड़ा दो नहीं तो जेल जाना होगा.’ अतना कहला के बाद सूंढ़ जी कहले कि – ‘का तहार पैखनवा फर्स्ट क्लस हऽ ?’ इनकर बात सुनि के सभ हँसे लागल त हम टी॰टी॰ से कहनी कि – ‘इहाँ का हमरा साथे बानी’ त जान छूटल. हम लोगन से बतलवनी कि – ‘इहाँ का हास्य रस के कवि हईं. हमरे साथ बलिया जा तानीं. सूंढ़ जी के ई कहानी सूनि के हाल फेरु ताली से गड़गड़ाइल आ हँसी के फौबारा छूटल.’

शान्त भइला के बाद हम आपन एगो हास्य रस के कविता सुना के जब उनका पासे आके बइठलीं त ऊ कहले – ‘हम त तहरा के केला बनवले रहली हाँ बाकिर तू त हमरा के पैखना में घुसा दिहलऽ.’ एकरा बाद कहले कि – ‘तुम दोनो की जोड़ी कमाल की है. अब तक संचालन के दरम्यान, इतना पलटवार हम पर किसी ने नहीं किया, जितना तुम दोनों ने किया है.’

कवि सम्मेलन खतम होखला के बाद आयोजक लोग हमनी के एक सौ पचहत्तर रुपया दिहले, जवना में हम पचास रुपया पेट्रोल के निकालि के पचास गो ‘पीयूष’ जी के आ ‘किरण’ जी के पचहत्तर गो दे दिहलीं. रात में ‘पीयूष’ जी ओही घरी जीप से बक्सर आ गइले बाकिर हमनी दूनो आदमी अखिलेश भट्ट के डेरा पर खा-पी के सुतलीं जा आ सबेरे मोटर साइकिल से घरे लौटि अइलीं जा.

संस्मरण बहुत बा बाकिर एह अंक में अतने नाहीं त पत्रिका में जगहो मिलल मुश्किल हो जाई. अन्त में – हो गइल सूना ‘किरण’ बिन, आजु बक्सर के माटी. का पता कब, के जनम ली, एह कमी के आके पाटी?


पिछला कई बेर से भोजपुरी दिशा बोध के पत्रिका “पाती” के पूरा के पूरा अंक अँजोरिया पर् दिहल जात रहल बा. अबकी एह पत्रिका के जनवरी 2012 वाला अंक के सामग्री सीधे अँजोरिया पर दिहल जा रहल बा जेहसे कि अधिका से अधिका पाठक तक ई पहुँच पावे. पीडीएफ फाइल एक त बहुते बड़ हो जाला आ कई पाठक ओकरा के डाउनलोड ना करसु. आशा बा जे ई बदलाव रउरा सभे के नीक लागी.

पाती के संपर्क सूत्र
द्वारा डा॰ अशोक द्विवेदी
टैगोर नगर, सिविल लाइन्स बलिया – 277001
फोन – 08004375093
ashok.dvivedi@rediffmail.com

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