– डॉ॰ उमेशजी ओझा

UmeshOjha
नीलम के गोड़ धरती प ना पड़त रहे. खुशी के मारे एने से ओने उछलत कुदत चलत रही. एह घरी के सभ लइकी आ लइका के बड़ी इन्तजार रहेला. नीलमो आखिर उछल कुद काहे ना करस. उनकर बिआह जे ठीक भइल रहे. नीलम के मन में खुशी के लड्डू फूटल जात रहे. तिलक लेके उनकर बाबुजी आपन हित-नाता के साथे निकले वाला रहले. तबही नीलम अपना बाबुजी के आवाज लगवली, ‘बाबुजी…, बाबुजी….!’
‘इयाद से लइका वाला सोना के सिकरिआ राखी लिही.’
नीलम के घर मे बइठल सभ लोग नीलम का ओर देखे लगले. नीलम के मॉइ चुस्की लेत बोलली, ‘अरे ए पगली, तोरा का हो गइल बा? हमनी के मालूम बा कि तहार बिआह होता. मजाल बा कि कवनो कसर रहि जाई.’

सभ लोग हंसे लागल. नीलम शरमा के भाग गइली. नीलम के बाबुजी रविरंजन जिला समाहरणालय में नोकरी करत रहले. जिला के प्रतिष्ठितन में उनकर गिनती होत रहे. उनका एगो बेटी नीलम आ एके गो बेटा विनय बाड़न. रविरंजन नीलम के बढिया शिक्षा दिअवइले रहले. नीलम सी॰एस॰ करत रहली. विनय अबही +2 के अंतिम परीक्षा में बइठे वाला रहले. नीलम के एगो बड़ कम्पनी से नोकरी के बुलावो आइल रहे. नीलम कद काठी के बढिया, दुधिया गोराई के, करिया आँखि उनकर सुन्दरता के चार चाँद लगावत रहे.

दोसर ओर सत्य प्रकाश कलकता पुलिस में इन्सपेक्टर के पद प कार्यरत रहीं. उनका एकेगो बेटा प्रेम बाड़न. प्रेमो नीलम से कवनो निहन कम ना रहले. प्रेम सी॰ए॰ कइला के बाद मुंबई के एगो प्रतिष्ठित कम्पनी में नोकरी करत रहले. सत्य प्रकाशो अपना बेटा प्रेम के बिआह इयादगार के रूप में मनावल चाहत रहले कि वोइसन बिआह केकरो ना भइल होखे. आपन बेटा के बिआह खातिर रविरंजन से दहेज के रूप में नगद पैतीस लाख आ एगो मारसीडीज गाड़ी प तय कइले रहले. बिआह ठीक ठाक होखला के बाद सत्य प्रकाश, रविरंजन से कहसु कि, ‘भाई रविरंजन जी, हम त, राउर लइकी के सुन्दरता के देखीए के अतना कम में बिआह तय कइले बानी. ना त पचासो लाख देबे वाला आदमी आइल रहले.’
‘हँ सत्य प्रकाश जी, काहे ना, राउर बेटा सी॰ए॰ जे कइले बा आ उपर से रउआ पुलिस इन्सपेक्टर ठहरनी. खुशी से ना त डर से त मिलीये जाइत, कि कानुन के सभ जानकारी रउरा बा, ओकरा बेटी के कइसे तंग कइल जाइ रउरा से बढिआ दोसर के जानी.’ एह बात प दुनो ठहका मारी के हंसे लागत रहले.

रविरंजन अपना सगा संबंधियन का साथे तिलक लेके कलकता सत्य प्रकाश जी का घरे पहुँच गइले. तिलक गाजा बाजा के साथे शांति पूर्वक पूरा भइल. सत्य प्रकाश आपन बेटा के तिलक में अपना विभाग के सभ बड़ अधिकारियन के बोलवले रहले. सभ केहु तिलक में रविरंजन के चढ़ावल समानन के खुब बड़ाई कइले. प्रेम के खुब ढेर आशीर्वाद दिहलन. रविरंजनो आपन बेटी के बिआह में कवनो कसर ना राखल चाहत रहले. एकरा खातिर उ बेचाइओ जाे ला तइयार रहले. आपन लइकी के बिआह में आपन राखल सभ जमा पुंजी लगा दिहले रहन. रविरंजन जी आपन संबंधी लोगन के साथ लइका पक्ष से बिदाई लेके अपना घरे अइले. लइकी पक्ष सत्य प्रकाश के आव-भगत से बड़ी खुश लागत रहे लोग.

बिआह आठ दिन बादे होखे वाला रहे. बिआह के तेयारी में दुनो पक्ष लाग गइल. जइसे-जइसे बिआह के दिन पास आवत रहे नीलम के घबराहट बढ़ल जात रहे. नीलम आपन होखे वाला पति के बारे में अलग-अलग सपना सजोवे लागल रही. सोचत रही कि उनकर पति कइसे घोड़ा प सवार होके अइहे, आ उनका के अपना साथे लेके जइहे. उ आपन सुहागरात के तेयारीओ कर लेले रही. बिआह के चार दिन रह गइल रहे तसही रविरंजन के फोन के घंटी बाजल…ट्रिन……..ट्रिन………

‘हेलो, सत्य प्रकाश जी, कहीं कइसे इयाद कइनी. बिआह के तेयारी ठीक से चलत बा नू. बस चार दिन रह गइल बा बिआह के.’
‘हँ रविरंजन जी, तेयारी त ठीके चलत बा. रउरा से कुछ काम रहल हा. अगर रउरा कलकता आ जइतीं त ठीक होइत.’
‘कुछ बात बा का, सत्य प्रकाश जी? आजु हमरा के कलकता बोलावत बानी.’
‘बस अतने कह सकत बानी कि राउर आइल जरूरी बा.’ फोन कट जात बा.

नीलम के माई पूछली, ‘का जी, का भइल? केकर फोन रहल हा? आ फोन सुनते मुंह काहे लटका लिहनी?’
‘का कहीं, सत्य प्रकाश जी के फोन रहल हा. ना जाने का बात बा. हमरा के कलकता बोलावत बानी.’
‘का! कलकत्ता? कहीं फेरू से त कवनो नया माँग ना करी लोग?’
‘का कहीं, गइले प पता चली. अइसन करऽ, समय नइखे, तेयारी क द. सांझी वाली गाड़ी से चलि जाइब.’
‘ठीक बा.’

रविरंजन राति के दस बजे हावड़ा स्टेशन प उतरले आ बिना कुछ खइले पिअले सीधे रात के इगारह बजे सत्य प्रकाश के घरे पहुच गइले. सत्य प्रकाश के घरे पहुचि के रविरंजन अवाक रहि गइले कि ई का, एहीजा त मातमी उदासी छवले बा. कवनो तेयारी नइखे. सभ उदास बइठल शायद इनके आसरा देखत बाड़न. प्रेम रविरंजन के सत्य प्रकाश के रूम में ले गइले. थोड़िके देर के बाद प्रेम बाहर निकल गइले त, सत्य प्रकाश कहले, ‘बइठीं रविरंजन जी, कहीं राहता में कवनो तकलीफ त ना भइल हा?’
‘ना सत्य प्रकाश जी, दिक्कत त ना भइल हा. बाकि ई का बिआह के घर ह, आ कवनो तेयारी नइखे बुझात, ई कइसन उदासी छवले बा?’
तब सिसकत ‘का बताईं, रविरंजन जी हलाते अइसन हो गइल बा. बाबुजी जी ना रहनी.’ अतना सुनते रविरंजन के काठ मार गइल. अपना के सम्भारत आ चिहात बोलले, ‘का कहत बानी सत्य प्रकाश जी ? चार दिन पहिले तक त उहां के ठीके रही. अचानक का हो गइल हा?’
‘का बताईं रविरंजन जी. काल्हू बाबुजी छत से नीचे उतरत रहीं कि सीढ़ी प से गोड़ बिछिला गइल आ ओहिजे उहाँ के आपन प्राण तेयाग दिहनी. हस्पतालो ले जाए के मौका ना मिलल.’
रविरंजन फेर चिहाइल बोलले, ‘का! सीढी़ से गिर के?’ अब रवि रंजन के आपन खुशी प गरहन लागल लउकत रहे. सोचत रहले कि घरे जाके खुशी के घर में ई कइसन समाचार बताइब. तबहीं सत्य प्रकाश बोलले, ‘रविरंजन जी, कहत बड दुख होता. हालांकि हम उ सभ बात ना मानी, बाकी घर ह, घर के लोग के लेके चले के पड़ेला.’
‘बिना सकुचाहट के कहीं सत्य प्रकाश जी, कवनो बात के बोझा अपना उपर मत राखीं.’
‘रविरंजन जी, घर के लोग के विचार बा कि प्रेम के बिआह नीलम से अब ना होई.’
ई बात सुनि के रविरंजन सन रह गइले. पूछले, ‘अइसन काहे सत्य प्रकाश जी?’
‘घर के लोग मानत बा कि नीलम के सगुन शुभ नइखे. सगुन आवते अइसन हादसा हो गइल. उ कुलछनी बाड़ी. उनका से आपन बेटा के बिआह नइखी कर सकत.’
‘का कहत बानी सत्य प्रकाश जी? भला नीलम कुलछनी कइसे हो सकत बाड़ी? राउर बाबुजी के साथ घटल एगो घटना रहे. सीढ़ी प से गोड़ बिछिलाये के चलते ई घटना घटल. एह में हमरा बेटी के का दोस बा? अपना घर के लोग के समझाईं. कवन जुग मे जिअत बा लोग! दुनिया कहाँ से कहाँ पहुँच गइल आ रउरा सभे एगो निर्दोष लइकी के, जवना के रउरा सभे जानत तक नइखी, बिआह के पहिले कुलछनी कहे लगनी, आपन घर वालन के समझाईं.’
‘हम समुझा के थाकि गइल बानी ओकरा बादे रउरा के बोलवले बानी. अब बिआह नइखे हो सकत. दोसरा जगह नीलम के बिआह क दिहीं इहे हमार आशीर्वाद बा.’
‘अइसन मत करीं सत्य प्रकाश जी. हमरा किहें सब तेयारी हो चुकल बा, हमार पुरा परिवार टुट जाई, हम बरबाद हो जाइब.’
‘हम कुछ नइखीं जानत, जब बोल देनी त बिआह ना होई. अब रउरा हमरा दुआर से जाईं आ दहेज में दिहल पइसो ले जाईं.’

रविरंजन आपन सब सुझ-बुझ लगा दिहले बाकि कवनो फायदा ना भइल. आखिरकार रविरंजन अपना घरे आ गइले. घरे पहुचले त नीलम के माई पूछली, ‘का जी, का भइल, कलकता काहे के बोलवले रहे लोग?’

बात के कवनो असर रविरंजन प ना पड़त रहे. सीधे अपना रूम में जा के पलंग प गिर पड़ले. उनका पंलग प गिरते नीलम चाय के कप लेके आ गइली. बेटी के हाथ से चाय के कप पकड़त रविरंजन भावुक हो गइले आ उनका आँखि से लोर टपके लागल. रविरंजन के लोर नीलम से बाचि ना सकल आ उ देख लिहली. एह प दुनो माई बेटी रविरंजन के लगे बइठ के पूछे लागल लोग. आपन पत्नी आ बेटी के आगे जादा देर तक रविरंजन चुप ना रह पवले. सत्य प्रकाश से भइल सभ बात कह दिहले. नीलम के त आपन सपना बालू के घर लेखा ढहि गइल रहे. उनकर हाल खराब होत जात रहे. बाकि आपन बाबुजी के हाल देखी के आपना प काबू पावत कहली, ‘घबराईं मत बाबुजी, हमहू सी॰एस॰ करत बानी. देखब उ लोग से बढ़िया परिवार में हमार बिआह होई.’

रविरंजन ई सोचि के बड़ ब्याकुल रहन कि समाज के जवाब का देब. अतना जल्दी नीलम के बिआह कहाँ ठीक क दीं. आपन बेटी के हालत देखि के उ आपना के उनका आगे मजबूत देखावत रहले बाकी भीतर से कतना कमजोर, उ फैसला ना कर पावत रहले कि का करी. उनकर तेयारी सब बेकार हो गइल रहे. तब ही सांझी के उनकर फोन के धंटी बाजल. ट्रिन… ट्रिन…

‘हेलो, के बोलत बा?’
दोसरा तरफ से ‘हेलो, रविरंजन जी बोलत बानी, हमरा रवि रंजन जी से बतिआवे के रहल हा.’
‘जी हमही बोलत बानी, रउरा के?’
‘जी हम, कमलेश, आसनसोल रेलवे के स्टेशन प्रबन्धक.’
‘जी कहीं, हम का कर सकत बानी?’
‘अरे कुछ ना बस हमरा प एगो एहसान.’
‘का कहत बानी, हम राउर बात नइखी समझ पावत.’
‘अजी हम राउर बेटी नीलम के बिआह में प्रेम के तरफ से लइकी देखे रउरा किहां गइल रही, आ प्रेम के तिलको में गइल रहीं.’
‘जी कहीं. हमरा धेआन से रउरा त उतरिये गइल रहीं, कहीं कइसन बानी, कइसे इयाद कइले बानी?’
‘जी हम सुननी हा कि राउर बेटी नीलम से प्रेम के घर के लोग बिआह करे से मना कर देले बाड़न.’
‘जी सही सुनले बानी.’
‘अगर रउरा बुरा ना मानी त एगो बात कहीं.’
‘अरे कहीं. बुरा का माने के बा.’
‘हमार बेटा रमेश डिफेन्स में कर्नल बा. राउर बेटी नीलम हमरा आ हमरा बेटा के पंसद बिआ. हम रउरा से नीलम के हाथ, आपन बेटा रमेश के खातिर मांगत बानी. अगर राउर इजाजत होइत त वोही तारीख प बिआह हो जाइत.’
‘का कहत बानी कमलेश जी? सत्य प्रकाश जी त आपन बाबुजी के मृत्यु के कारण हमरा बेटी के मानि के ओकरा के कुलछनी समझत बाड़न. आ रउरा सभ जानत, आपन बेटा रमेश के बिआह करेके तेयार बानी?’
‘अइसन कवनो बात नइखे रविरंजन जी, हम अइसन बेकार के बात ना मानी, लइकी में कवनो दोस ना होला. उ त हमनी के समाज के बनावल ढोंग के कोप के भाजन बने ली स. अगर हम रउरा पसन्द बानी त एक दिन के रउरा लगे समय बा हमरा के जाँच लिहीं आ वोही तारीख प बिआह के तेयारी करीं. हमरा के भगवान बहुत कुछ देले बानी. बेटो एकेगो बा. हमरा रउरा से एक फुटी कउड़ी ना चाहीं. चाहीं त बस अपना बेटा खातिर राउर लइकी नीलम.’
‘ठीक का, कमलेश जी डुबला के भगवान सहारा, हम रउरा लगे आवत बानी.’

रविरंजन आसनोसल गइले. ओहिजा कमलेश जी से बात क के हंसी खुशी वापस अइले. दोसरा दिन कमलेश आपन बेटा रमेश के बारात लेके अइले. नीलम के बिआह बहुते धूम-धाम से भइल. शहर के ई एगो यादगार बिआह बन गइल. नीलम के बिआह में शहर के बड़-बड़ अफसर आ प्रेस के लोग बिआह के दर्शक रहे. बिआह के बाद नीलम अपना पति रमेश संगे हैदराबाद चली गइली आ ओहीजे दुनो आपन गृहस्थ जीवन हंसी खुशी से बिता रहल बाड़े.


(सत्य घटना प आधारित एह कहानी के पात्र आ जगहन के नाम बदल दिहल गइल बा. समानता मात्र संयोग हो सकेला.)

लेखक परिचय
वाणिज्य में स्नातकोत्तर, बी॰एच॰एम॰एस॰, आ पत्रकारिता मे डिप्लोमा लिहले उमेश जी ओझा साल 1990 से लिखत बानी. झारखण्ड सरकार में कार्यरत उमेश जी के लेख आ कहानी अनेके पत्र पत्रिकन मे प्रकाशित होत रहेला.
ई कहानी एगो साच घटना प आधारित बा. एकर सचाइ के देखत एकरा मे स्थान आ पात्रन के नाम बदल दिहल गइल बा.

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