डायरी

– डॉ. रामरक्षा मिश्र विमल

बुदबुदाई अब समय

मौसम के सुगबुगाहट के पता साफ-साफ चल जाता. काल्हु तक के टेढ़ आ लरुआइल पतइयो आजु हवा का सङे घुमरी-परउआ खेले लागल बाड़ी सन. टीबी से लेके सोशल साइट तक एकही विषय छवले बा- स्त्री विमर्श. बदलाव के धमस साफ-साफ सुना रहल बा. बैरागी लोगन का प्रति आस्था बढ़ रहल बा. प्रशासन में विश्वसनीयता के पर्याय बन रहल बा लोग. अलग-अलग तबका के मेहरारुन के दुख-दर्द सुनावे में मीडिया दिलचस्पी ले रहल बिया. न्यायालय पर सभके नजर लागल बा- चाहे मुद्दा राम मंदिर के होखो, मेहरारुन पर अत्याचार के होखो भा ध्वनि-प्रदूषन के. सोनू निगम जइसन लोकप्रिय आ मशहूरो लोग अपना फैन सभन के मोह त्याग के अपना दिल के बात खुल के कहे लगल बाड़न. अपना घीव अस चीकन बार के आ अपना सुंदरता के लोभ छान्ही प धइके टकला होखे में तनिको हिचकिचइले ना सोनू निगम. उनकर फतवा के आतंक के मजाक बनावल साफ बता रहल बा कि पिछला दू-तीन बरिस में देश में जागरूकता आ निडरता का स्तर में जमिके बढ़ोत्तरी भइल बा.

लागता एह पारी त कुछु होइए के रही. लोगन का उत्साह के देखिके त सभ कुछ पोजिटिभे लागता. काल्हु तक पानी पी-पीके कोसेवाला लोग जोगी जी के बड़ाई करत नइखन अघात- जोगी जी वाह ! गरीब, कमजोर से लेके पुरुष वर्चस्व के शिकार मेहरारू आ लइकी तक जवन प्रताड़ना के जहर पीके पूरा जीवन अपमान आ तिरस्कार में काटि देत रही सन, ऊ आजु जोगी जी के साथ पाके असीम ऊर्जा से भर गइल बाड़ी सन. डर के माहौल बाइ-बाइ. सात साल पहिले के लिखल आपन एगो गजल के दू गो शेर बार-बार जबान पर आ जातरे सन-

भाग सकबऽ दउरि के जतना निकलि जा भागि लऽ
बहसला का जोम में  छरपट छोड़ाई अब समय
अब जरे लागल दिया बा शहर में हर गाँव में
दूध घी के सच छिपी ना बुदबुदाई अब समय

छपास के बुलबुला, पुजाई के तरास आ भउरि के बनौरी

पिछला दिन कुछ अइसन भइल कि हमार कुछ मित्र ‘छपास’ शब्द का पाछा परि गइले. ओइसे त कई बरिस पहिले से नेट पर भोजपुरी के दर्शन होखे लागल रहे बाकिर सभसे अधिक सक्रियता के दौर लगभग 10-11 बरिस पहिले लउके लागल रहे. अँजोरिया डॉट कॉम, भोजपुरिया डॉट कॉम आ जय भोजपुरिया डॉट कॉम जइसन साइट का प्रेरणा से कई गो नया लेखक तेयार हो गइले. एने दु-तीन बरिस में एकरा में अउर बढ़ोत्तरी भइल बा. भोजपुरी साहित्य खातिर एगो नीमन संकेत बाटे छपास के ई बुलबुला. बाकिर जब पुजाई का तरास से परेशान होके ई कलम साँठ-गाँठ का पोखरा में मृगतृष्णा के अमिरित पिए लागतिया त कुछे दिन में भउरि के बनौरी बनिके नीमन-नीमन लोगन के माथ फोरे लागतिया. ई एकर बाउर पक्ष बा. भाषा आ साहित्य के अध्ययन जरूरी बा. जे हिंदी में शुद्ध ना लिख पावत होई, ऊ भोजपुरी में कबो शुद्ध ना लिख सके. बोली आ भाषा के फर्को जानल जरूरी बा. भलहीं भोजपुरी के मानकीकरण नइखे भइल बाकिर 50-60 बरिस पहिले के स्थापित साहित्यकारन के भा वर्तमान स्थापित साहित्यकारन के पढ़लो से ओकरा आस-पास जाइल जा सकता. स्वतंत्रता के त हम पक्षपाती हईं बाकिर स्वच्छंदता भाषा आ साहित्य – दूनो के नासि दी. संबंधित शास्त्र आ परंपरा के ज्ञान का बाद चिंतन आ लेखन के स्वतंत्रता समाज खातिर हितकारी होले, बाकिर पूर्व ज्ञान से कटल आ कवनो अनुशासन के ना मानेवाला लोगन के स्वतंत्रता स्वच्छंदता का कोटि में आई. ई दुर्भाग्यजनक बा कि एह तरह के मठाधीश भोजपुरी में ढेर लउके लागल बाड़न. भीष्म पितामह लोग भी साँच बोले से बाँचतारन. ई शुभ ना कहाई. समुझावल-बुझावल आ समुझल-बूझल चलत रहेके चाहीं.

आलोचना के संकट

दू दिन पहिले एगो मित्र के कविता संग्रह मिलल. ऊ हिंदी के एगो प्रोफेसर से ओकर लमहर समीक्षा लिखववले रहन. हम कबो उनुकर किताबि पढ़ीं आ कबो समीक्षा के उलटीं-पलटीं. छंद पर कुछ ना बोलबि, काहेंकि मुक्तछंद जब सँकारि लिहल गइल बा, त सभ प्रयोगे में आ जाई, बाकिर भाषा का सङे त अनेति मति कइल जाव. शुद्ध लिखे-पढ़े के व्यवस्था सरकार आ समाज का ओर से डेगे-डेग प मिल जाई, अपना मिथ्याभिमान के किनारा धइके तनिका सा ज्ञान ले लिहला में हरजे का बा ? जब बरदास से बाहर हो गइल त मुँह से कुछ अनुभवी बचन निकलि गइल आ बरिसन के संबंध टूटि गइल. भोजपुरिहा लोगन के नाकि बड़ा सुकवार होले. दिमागो के बाति छनहीं में दिल पर कुंडली मारिके बइठि जाले. साइत ईहे कारन बा कि भोजपुरी में आलोचना या त अभाव के आस-पास बिया नाहीं त बड़ाई के पर्याय बनिके. अपना ओर से लिखेवाला लोग इक्का-दुक्का रहि गइल बाड़े, मान-मनउवल कइके बरियारी लिखवावेके परता. नया पीढ़ी साफ बोले आ सुनेवाली बिया. हमरा नइखे बुझात कि चारण साहित्य के फेरु जमाना लवटी. बहुत चिंता होता. कम से कम भीष्म पितामह लोगन के पीढ़ी के कठकरेज बनिके आलोचना पर कलम चलावेके चाहीं.

ओकरो ऐप गूगल प मिल जाई

एक हप्ता पहिले के बात ह. हमार एगो मित्र बड़ा गंभीर मुद्रा में लउकले, हालाकि ई उनका सुभाव के विपरीत हटे. कहले कि हम ई सोचतानी कि मए नोकरिहा लोग 18-18 घंटा काम करे लागी त उनुका गिरहस्थी के का होई ? ऊ लोग कब बाथरूम जइहें, कब पूजा-पाठ करिहें ? टीबी-सीबी आ फिलिम-सिलिम त भुलाइए जाईं बाकिर कब हाट-बाजार जइहें आ कब परिवार का सङे रहिहें. दिनवा त चउबीसे घंटा के नु होई जोगी जी ? हमरा त सबसे चिंता एह बात के बा कि निफिकिर होके फराकित होखेवाला लोग अब बुढउती में लर-लैट्रिन कइसे होइहें. हम कहलीं कि पीकू के चिंता छोड़ीं, ओकरो ऐप गूगल प मिल जाई.

Advertisements