पौरा

  • रामनरेश शर्मा ‘शिक्षक’

बेटी लक्ष्मी के शादी खातिर रमई छानि दिहले. कहीं वर-घर ना मिलल, कहीं वर मिले त घर ना रहे, त कहीं घर मिले त लक्ष्मी योग वर ना मिले. कहीं करिमन त कहीं कोते गरदनिया, त कहीं कान-कोतर त कहीं अंगूठा टेक नाँव से वकील जज कलट्टर लइका भेटा सँ. धावत-धावत रमई के पाँव पीरा गईल. चारो ओर से घुम-घाम के आवे त बेटी सुधिया, जवना के उपनाम बेटी लक्ष्मी रमई रखले रहले, के महतारी बुधिया, कटोरी मे गुड़, एक लोटा पानी आ गिलास लेके तुरते हाजिर हो जासु.
आ बेना डोलावत धीरे-धीरे पूछल सुरू करे, ‘का भइल ह, कइसन वर-घर बा, कुछ बातचीत भइल ह की ना ? बुधिया के मन शुभ समाचार सुने खातिर बेताब रहे. बुधिया के मन में डर बनल रहे कि रमई गुस्सा में आके घुड़क न देसु.
काहे कि परेशान लोग खिसियाला बहुत, काहे कि कहीं से हारल-थकल अइला पर निमनो बात कई बेर अच्छा ना लागे. कबो-कबो रमई बुधिया के जवाब तीखा दे देसु. कहे कुछऊ ना भइल ह. बेटी जनमवले के फल मिलऽता आ कबो-कबो कहे ठीक-ठाक शादी ना बा, ओकरे खानदान में दागी बा. कबो जवाब में कहे ओइजा के लइका के बाप बड़ा घमण्डी बा, सोझा मुह बात नइखे करत. कौनो-कौनो त अइसनो बाने जवन एक गिलास पानी पिये के नइखे पूछत.
बुधिया अच्छा समाचार सुने के बेताब रहति बा बाकिर रमई का करे ? चारू ओर से आके मन-मारि के बइठ जाव. बुधिया से एकान्त में बतियावे बेटहा कई प्रकार के बाने. एगो कहत रहे हमरा बिक्खो ना सहेला, हम कवनो ढंड कवन्डल ना करब. लइका भेज देब आ दहेजे के पईसा से चऊराहा पर के जमीन पर घर बनवा देब. कवनो-कवनो त अपने औकात से अधिका दहेज माँगत बाने, एहु तरह के कुछ बात सामने आइल ह कि दहेज के लालच में लइकनीन के जहर देताने, जरा देत बाने, आ मुवा देत बाने.
एक दिन रमई एक जगहि से लइका देखि के अइले. हारल-थकल रहले. तबले उनके मीत कन्हई फोन क के कहले अरे तू का परेसान बाड़. तहरे नियरवे एगो लइका उसर टोला में बा जा देख आव. लइका पढल-लिखल हुसियार बा आ सुन्दर-सुशील बा. लइका के बाप के नाम झमई ह. खदेरू कहले अगर बात बन जाई त रमई आ झमई में बड़ा मेल रही.
दुसरे दिन रमई अपने मीत कन्हई के लेके उसर टोला झमई के घरे पहुच गइले. झमई शादी करेके तइयार रहले. कौनो अच्छा शादी मिले त शादी तय कली. दुनो जाने के बात बनि गइल. शादी तय हो गइल. दिन-बार परि गइल. खूब धूम-धाम से सुधिया आ झगरु के शादी हो गइल. शादी एगो मिसाल बनल. शादी में कहीं कवनो तरह के काव-किचकिच ना भइल. सुधिया अपने ससुराल गइल. एक हफ़्ता खुसियाली मनल. घर में सरग जइसन खुशी पैदा हो गइल. सब लोग मिलजुल के हँसी ठिठोली करे, ठहाका के हँसी हसल जाव.
समय परिवर्तन शील होला. समय बदलल त दशा बदल गइल. झमई के न जाने कवन अइसन रोग समाइल कि उनुका खाना-दाना पचल बन्द हो गइल. खाना छुट गइल. झमई अगर थोरहु खा लेसु त उल्टी हो जाव. दवा-दारु भइल बाकिर कवनो लाभ ना भइल. देह पियरा गइल. बेमारी गरसते गइल आ एक दिन झमई के उठना हो गइल. परिवार पर विपति के पहाड़ गिर पड़ल. काहे कि झमईए ओह परिवार के देख-रेख करे वाला रहले.
झगरु अपने बियाह आ पिता के देख-रेख, दवा दारु, मरले के बाद किरिया-करम बितले के बाद जब अपने नोकरी पर गइले त झगरु के मनेजर झगरु के निकाल दिहले. काहे कि बेकारी के जमाना में पराईवेट नोकरी के का ठेकाना ? झगरु के बाप झमई दुध के शौकीन रहले. एगो गऊ पलले रहले. गऊ बड़ा सुन्नर रहलि. बाकिर पता ना का भइल कि ओकर पेट फ़ुलल आ एक घण्टा के बेमारी में खतम हो गइल. ओही समय में बारिस ना भइल, सूखा पड़ गइल. धान मुआरि कटाइल. अनाज पानी ना भइल.
अब गाँव-घर के माई-बहिन झगरु के घरे आके उनके माई लखिया आ बहिन लखरजिया के काने में मन्थरा लोग दिमाग फ़ेरल शुरु कइल – “कनिया के न जाने कइसन पौरा बा कि अवते ससुरा में पाँव धरते झगरु के घरे विपति के झकोरा आ गइल बा”. एह पर लखिया आ लखरजिया के कौनो ध्यान ना रहे. जवाब देके मन्थरा लोग के मुह बन्द करा देव. जवाब देव लोग – सब समय के फ़ेर होला, विपत्ति-संपत्ति कबो आ केहु पर कबो आ सकेला. बाकिर कहल जाला – “कहते कहते कार हो जाला”. अब धीरे- धीरे लखिया आ लखरजिया के सठाने बइठे लागल. कहे लगली – सो ठीके मुनिया के माई आ जोखना बहू कहत रहलि ह कि कनिया के पौरा बड़ा बाउर बा. पौरा एकर ठीक ना बा. अवते घर के दिन-दशा खराब हो गइल. सुधिया सुन सुन के बड़ा दुखी होखे. सुधिया के लगे एकर कवनो जवाब आ इलाज नाहि रहे. जब लखिया लखरजिया ताना मारल शुरु करे त सुधिया एतने कहि पावे – बताईं एमे हमार का दोष बा ? ई त भगवान के लीला ह, समय के दोष ह. बाकिर लखिया लखरजिया के तेवर अउर तेज होत गइल आ हर समय ताना दिहल शुरु क दिहलि – ते त अवते अपने ससुर के खा गइले, मरदे के नोकरी लीलि घरले आ दुवारे के शोभा खा गइले. ई सुनि सुनि के सुधिया के करेजा में बान के तरे लागे. सुधिया के करेजा फ़ाटे लागे. आँसू के धार बढियाइल नदी के तरह बहे. आंसू से सुधिया के अचरा भीजि जाव. मन मसोस के रहि जाव. कुछऊ उपाय सुधिया के ना सुझे. दिन-रात पहाड़ जइसन लागे लागल. जौने घर में सरग के आनन्द रहे ओही घर में आज एक एक छन बीतल पहाड़ हो गइल बा. कइसे समूचा जिनगी बीती. सोचि-सोचि दुख के सागर मे सुधिया डुबत उतराति बा.
आखिर एक दिन लखिया आ लखरजिया दुनु मिल के सुधिया के घर से निकाल दिहलि आ कहली – डाईन चानडालिन ते हमरे घर के तहस नहस क दिहले. अब तोर ए घर में बसर ना होई. ते अब आपन दुसर राहि देखु. झगरु अपने माई आ बहिन के आगे कुछ ना कहि पावे. चुप रह जाव. सुधिया रोवत गावत अपने नईहर गइल. जब सुधिया के महतारी बाप सुधिया के दशा देखले त दुनु जाने के करेजा फ़ाटे लागल. बेटी लक्ष्मी (सुधिया) के अकवारी में पकड़ि दुनो जाने डहके लागल लोग. दु चार लोग जुटि गइल. लोग हाये हाये करे लागल. जवने बेटी के जनम लेते रमई के नोकरी लागल आ परिवार में सोना अइसन भाई आ गइल, धन दौलत दिन दुना रात चौगुना बढे लागल, जवने के चलते सुधिया के नाव रमई लक्ष्मी बेटी रखले रहले आ हर दम लक्ष्मी बेटी कहि के पुकारे आ सगरो गाँव में लक्ष्मी नाव रखले के बात फइलल बा. सगरी गाँव जानत बा कि काहे रमई सुधिया के लक्ष्मी बेटी कहि के बोलावेले. ओही बेटि सुधिया (लक्ष्मी) के पौरा खराब कहि के ओकर सास ननद घर से निकाल देहलि हई. अब रमई का करे. दु चार लोग के लेके आ सुधिया के लेके ओकरे घरे गइले. ओ गाँव (उसर टोला) के पंच परधान के जुटा के पंचइति करावे लगलन. ओमे कुछ लोग जे पढ़ल लिखल रहे ऊ रमई का तरफ़ से बोले लागल – “सुधिया के कवनो दोष ना बा. समय त आवत जात रहेला. कबो अच्छा दिन होला त कबो बुरा, कहल बा सब दिन होई ना एक समाना. ए मामला में लखिया आ लखरजिया सबसे बड़हन दोषी बाड़ी आ पौरा एगो समाज से उपजल दोष बा.” बाकिर जे पढ़ल-लिखल ना रहे आ पुराना विचार धारा के रहे आ जे सबसे बड़ा सेसर आ बतबढ़ रहले ओइसन दु चार जाने एक स्वर से बोलले – काहे, सुधिया के दोष नइखे ? एकरे अवते झमई के बेमार परे के चाही? आ ऊठना हो जाएके चाही ? आ नोकरी छुट जाये के चाही ? आ पचास हजार के दुवारे के शोभा गउ के मर जाये के चाही ? आ एकर अइसन बाउर पौरा बा कि घर में पाँव रखते सगरो सुख संपत्ति खतम हो जाए के चाही ? जन धन सब पर आफ़त आ जाये के चाही ? ई सुन के लखिया आ लखरजिया के सात हाथ के करेजा हो गइल. ए बईठकी मे केहु केहु कहल कि सुधिया कहीं नाही जाई. एकर इहे घर ह, एही घर में रही. केकर मजाल बा जे घर में ना राखी. झगरु के महतारी आ बहिन के बोलले के आगे पंचयती में केहु के ना चले. महतारी बेटी खड़ा होके कहली सँ – “जे सुधिया के बड़ा हीत दाई होखे उ अपने घरे ले जाके राखो. हमरे घर में एकर पाँव ना पड़ी. हारि पाछि के रमई सुधिया के लेके अपने घरे आ गइले. फ़िर कुछ दिन बाद रमई सुधिया के लेके दुसरकी पंचयती करवले. समय बदलल सुधिया के गाँव में परधान एगो पढ़ल-लिखल ईमानदार समझदार हो गइल रहले आ लखिया लखरजिया के परभाव मे कमी आ गइल रहल. जब पंचयती के बईठकी भइल त ओमे झगरु के बोला के परधान झगरु के फ़टकार लगावल शुरु कइले. कहले – ए झगरु तोहार पढ़ल लिखल सब बेकार बा. तू त पढ़ल लिखल गँवारो से बदतर बाड़. तुहीं अपने इमान धरम से बतावऽ कि एमे सुधिया के का दोष बा ? अब झगरु के समझ में आ गइल कि ई त ईश्वरी देन ह. जवन घरी जवन होखे के होई उ होई. ओके केहु न टाल सकेला, न मेटा सकेला. त सुधिया के काहे सतावल जात बा. अब झगरु पंचयती में सुधिया के राखे के कबूल क लेहले आ सुधिया अपने घरे रहे लागल. सुधिया एगो पढ़ल लिखल समझदार रहली. पिछलि सगरो बात भुला के अपने परिवार में प्यार से रहे लगली. अपने सासु ननद के सेवा मन लगा के करे लागल. ओहि समय में जवन झगरु के नोकरी छुटल रहल नोकरी बहाली के चिठ्ठी आ गइल आ झगरु नोकरी करे लगलन. अब सुधिया के घर धन-धान्य से भरपूर हो गइल. ओही समय में झगरु एगो दू लाख के लाट्री लगवले रहले ऊ लाट्री झगरु के नाव से निकल गइल. खेत पर झगरु के पटीदार फ़र्जी मुकदमा कइले रहे ओ मुकदमा में झगरु के डिग्री हो गइल. मारे घर में आ बहरा चारू ओर से पईसा के बरखा होखे लागल. खेती बारी से अमदनी बढि गइल. धीरे-धीरे सुधिया के बेटा सेयान हो गइल. ओकरा सरकारी नोकरी मिल गइल.
एक दिन झगरु लखिया आ लखरजिया सब मिल के सुधिया के बइठा के पिछली बात पर चर्चा सुरु क के सुधिया से माफ़ी मागे लागल लोग आ कहल लोग – “हमनी से बहुत बड़हन गलती हो गइल बा. जेतना दुख हमनी दिहले बानी जा ओके माफ़ क द. एमे तहार कवनो दोष ना रहल ह. पौरा के भरम में पड़ि के हमनी से गलती भइल ह. पौरा एगो समाज से उपजल भ्रम ह जवना के लेके तोहरा के एतना दुख दिहली ह जा. विपती सम्पती त समय के फ़ेर ह जवन जब होखे के होई ऊ होई, ओमे केहु के दोष ना होला. तहार नाँव जवन तोहार बाप रमई रखले रहले – लक्ष्मी बेटी, त तू लक्ष्मी बेटी ना सचमुच सही के लक्ष्मी बाड़ु. आज से तोहार नाँव लक्ष्मिए रही. सभे तहके लक्ष्मी नाँव से पुकारी. तू हमरे घर में लक्ष्मी जी के रूप में पाँव रखले बाड़ू”.

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ग्राम -परसहवा, पोस्ट -कसया, जिला -कुशीनगर (उत्तर प्रदेश )
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