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कुछ साथी-सहयोगियन का सुझाव / निहोरा पर जब ‘प्रेम’ पर केन्द्रित कविता पर अंक के बिचार बनल त हम जल्दी-जल्दी भोजपुरी कवियन से संपर्क सधनी. ओइसे त प्रतिक्रिया उछाहे भरल रहे, बाकिर कुछेक भाई लोग अइसनो मिलल, जे या त लजइला लेखा या अजीब उटपटाँग जबाब दिहल; जइसे… ‘छोड़ीं’ जी, अब ए उमिर में प्रेम ?’ ‘अब कूल्हि छोड़ ‘प्रेम’ पर कविता लिखाईं ?’ ‘हम त कबो जिनिगी’ में परेमे ना कइलीं, ‘काजी रउरो प ‘वेलेन्टाइन’ वाला असर हो गइल बा का?’ कहे क मतलब ई कि ऊ लोग या त ‘प्रेम’ के गलत माने निकललस, या एकरा के ‘वर्जित’ आ उपहास जोग मानल. ओह लोगन के साइत पता ना रहे कि ‘प्रेम’ माइयो-बाप, भाइयो-बहिन, पति-पत्नी, आ नातियो-पोता क होला. बलुक ए जुग में त प्रेम आदमी ले बेसी धन, पद, कुरुसी, घर दुआर, आ चीजो-बतुस से होत बा. कुछ लोग के त बेमतलब ताबरतोर लिखले आ किताब छपवले से ‘प्रेम’ बा. अइसनका बुधिगर-समझदार लोगन का संवेदन ज्ञान आ संसारी बोध का आगा हमहूँ हार कइसे मान लेतीं? नतीजा में ई अंक आइये गइल.

‘प्रेमः न कहले कहाइल, न गवले गवाइल –

प्रीति के रीति आ परतीति निराली हवे. प्रेम से परहेज क दावा करे वालन के जब एकर अनुभूति होला त स्थिति बड़ी बिकट हो जाले ऊधो (उद्धव) जी के हाल ईहे नु भइल. प्रेम के समुझत-समझावत आपन डहरिये भुला गइले. ई न लगवले लागेला, न दबवले दबेला. ‘इश्क पर जोर नहीं, है ये वो आतश ‘गालिब’/ कि लगाए न लगे और बुझाए न बने.’ एकरा अभिव्यक्ति पर रोक लगावे वाला लोग खुदे धरती से उठि गइल.

इतिहास गवाह बा कि तमाम रोक-टोक, तिरस्कार आ बरिजना (वर्जना) का बावजूद आजु ले ना त प्रेम खतम भइल ना एकरा पर ‘बावरा’ कवि कविते लिखल बन कइलन सऽ. लोक भाषा भा बोली में श्रेष्ठ काव्य लिखे वाला मैथिली के विद्यापति, भोजपुरी के अनगढ़ कबीर, अवधी के जायसी, तुलसी; ब्रजी के सूरदास, मीरा, रसखान आ घनानन्द आदि के लगावल प्र्रेम-अभिव्यक्ति लकम (आदत) छुटे वाला रहे की आजु का कबियन से छूटी ?

प्रेम क गहिराई आ बिस्तार अगम-अछोर बा. ‘प्रेम’ बिना मानुस जिनिगी के बतियो ना सोचल जा सके. ई प्रेमे हऽ जवन न कहले कहाइल, न गवले गवाइल. न अबले ओराइल, न कब्बो ओराई. इ सब दिन कहाइल आ सबदिन बँचाई ! ‘प्रेम’ शाश्वत आ सार्वभौम बा.

‘छिनहिं चढ़ै छिन ऊतरै’ वाला प्रेम त बोखार हउवे. कबीर एही से ‘अघट प्रेम पिंजर बसै, प्रेम कहावे सोय’ कहत रहले. उनका प्रेम में ‘रोम-रोम पिउ-पिउ करै’. उनके ‘रोम-रोम पिउ रमि रहा’ के परतीति होखे. एही से उनके हरमेस ‘जित देखूँ तित तूँ’ नजर आवे. उनका आँखी में जवन सुघराई वाली छबि एक हाली समा गइल, तवने रही, ओमे कजरो क रेखि लगावे क गुंजाइस नइखे – ‘कबीर काजर रेखहूँ अब तो दई न जाय/ नैनन प्रीतम रमि रहा दूजा कहाँ समाय.’ ‘प्रेम’ कबीर का लेखे खाली जिये वाला तत्त्व ना बलुक सार तत्त्व आ परमतत्त्व बन गइल रहे . ई प्रेम लौकिक का धरातल से ऊपर उठि के अलौकिक हो गइल रहे.

ग्यानी कहेलें कि प्रेम भोग ना योग हऽ काहे कि ऊ ‘जीवन’ का सार तत्त्व का ओर ले जाला. ओकरा में ‘काम’ क सत्ता ना चले. प्रेम अपना में पूर्ण आ सोगहग बा तबे नऽ प्रेम में जप तप जोग कूल्हि छोट पड़ जाला. सृष्टि के जीवन-आधार ह प्रेम आ मानुस जीवन के अदम्य शक्ति हऽ . एही का जोरे अदिमी का भीतर दया,ममता, करुना, सहनशीलता आ पर दुखकातरता आवेला. विनय ईहे सिखावेला. ई ‘मातृत्व’ के ऊ अलंकार हवे, जवन ‘स्त्री’ के सर्वाेच्च आसन प बइठा के ‘माई’ क संबोधन देला. प्रेम दुसरा खातिर जिये आ मुवे सिखावेला. त्याग आ उत्सर्ग क प्रेरक प्रेमे नु हवे . ई ऊ संजीवनी शक्ति हऽ, जवन बिपरीत समय आ दुसह दुखो का घड़ी में धीरज बन्हावेला.

बुद्धि के सूखल संवेदनहीन ज्ञान कवनो काम क ना होला. उल्टे ऊ आदमी के कठोर, कठकरेज आ अंहकारी बना देला. प्रेम-पूरल ज्ञान आदमी का भीतर-बाहर दूनो ओर उजियार करेला – ओके संवेदनशील बनावेला. ऊ मानुस जीवन के नया अरथ, नया माने देला. एही प्रेम पूरल ज्ञान के उजाला सिद्ध, संत, फकीर आ रिसि मुनि समाज के बाँटत आइल बा. कवनो जगह पर ओ लोगन का अइला आ प्रेम से नजर घुमवला मात्र से साधारन लोगन का दुखी संतप्त जीवन में योग-क्षेम आ मंगल प्रतिफलित होखे लागेला-लोग थोड़ी देर खातिर प्रेम भरल दिव्य उजियार क परतीति करत आपन दुख, अभाव भुलाइ जाला.

प्रेम से सुरू आ प्रेम पर खतम होखे वाला जीवन के ‘अथ’ से ‘इति’ में प्रेम क न जाने कतना रूप-रंग-अनुभूति भरल बा, न जाने केतना राग-बिराग, हर्ष-विषाद, पीर आ उछाह-उमंग छिपल बा. प्रेम के पावे, बचावे आ उकसावे-निभावे के अनेक जुगत-जतन मानव इतिहास के गाथा आ काव्य बनल बा. ईहे प्रेम जब मानव-हिया के हिलोरेला त उल्लास फूटेला आ लोकजीवन के उत्सव के बनेला आ ईहे जब थिर बनेला त जिजीविषा जागि के अदिमी से असंभवो संभव करा देले. प्रेम का बले उमड़त नदी पँवर जाये आ दुर्गम जंगल-पहाड़ लाँघि जाये क कतने दृष्टान्त आ कथा कहानी बनल बा.

प्रेम आ भोजपुरी गीति -परंपरा –

अइसे त ‘गीत’ एगो भाव-संवेदन भरल सांकेतिक काव्य-रूप हऽ जवना में लय,गेयता आ संगीतात्मकता कलात्मक रूप में रहेला. अनुकूल अरथ उभारत शब्दन के सुघर बिनावट में गहिर संवेदना आ आत्मानुभूति के अन्तः संगीत ‘गीत’ के खासियत हऽ. लोकगीतन के अनगढ़ बाकि सहज-संरचना के मरम छुवे आ झकझोरे के शक्ति ; ओमे बिनाइल गहिर आत्मानुभूति का समाजिक-विस्तार का कारन आइल बा. लोकजीवन के हूक, हलास, राग-रंग, प्रेम विरह के मार्मिक व्यंजना, लय धुन अनुगूँज का जरिये साधारनीकृत होइए के लोकगीत बनल. एही परंपरा में ‘पूरबी’ का जरिये महेन्दर मिसिर भोजपुरी के पहिचान बनले ! प्रेम रस भींजल, विरह के पीर वाला कसक उपजावत उनका भावभींजल ‘पूरबी’ में, भाषा के सीमा टूटि जाले आ राग, लय के स्थाई अनुगूँज जगह बना लेले. भोजपुरी कवि अजुओ एह लोकराग-परंपरा से विलग नइखन स भइल, नवगीत का ढाँचा का बादो.

जीवन-जगत से जुड़ल ‘प्रेम’ के मरम छूवे वाली अनुभूति, दाम्पत्य-साहचर्य के आत्मीय तरलता आ मन के भाव प्रवण कोमलतासे टघरल ‘रागतत्त्व’ गीत के प्राण रहल बा. बाकिर ऊ एघरी जीवने-जगत का विसंगति भरल ‘भौतिकी’ का चपेट में बा. आज के जीवन-शास्त्र जटिल आ विडंबना भरल बा निछान भौतिकवादी-चिन्तन आ ओकर तार्किकता, छेनी-हथौड़ा लेके आदमी के नया रूप गढ़ रहल बा- बाजार का मुताबिक. लोग अतना हकासल, हहुवाइल, परेसान आ तनाव में बा कि ओकर हिरऊ संवेदना आ अनुभूति दरकचाइ जाता. आदमी के काठपन आ सूखल परायापन एही से बा. जीवनी शक्ति के आधार तत्व ‘प्रेम’ आ ‘गीत’ दूनों के सहजता आ ‘निजता’ खतरा में बा.

धरीक्षन मिश्र, मोती बी. ए., अनिरुद्ध, हरेन्द्र देव नारायण, भोलानाथ गहमरी,‘बावला’, ‘सुन्दर’ जी, रामनाथ, पाठक प्रणयी, प्रभुनाथ मिश्र, परमेश्वर शाहाबादी आदि कवियन का चलते विकसत,गीत-चेतना के प्रवाह निरंतर निखरत गइल . बदलत समय में रागात्मक संवेदना, नया नया भावबोध का साथ, विविधता में प्रगट भइल बा. ओमे ‘निजता’ का साथ स्वतंत्रता, प्रेम आ समानता के समाजिक-भाव का साथ ऊ आस्थावान जीवन-जगत बा, जवना में प्रकृतियो बा आ प्रत्यक्ष का साथे अप्रत्यक्षो बा. संकेतिकता, ऐन्द्रिकता आ आत्मीय भाव संपन्न गीत रचा रहल बा. अइसन गीत बोलत कम, असर ज्यादा करत बाड़न सऽ. प्रेमपरक कविता पर ‘पाती’ के ई अंक मनुष्यता के सुखात सोत आ साँस बचावे क एगो छोट कोसिस भले होखे, बाकि ई रउरा सभ अस सुधी पाठक के आस्वाद का नया धरातल पर जरूर ले जाई .

एह प्रेम-भींजल अंक का साथ लोक-उत्सव होली का अवसर पर उछाह उमंग से ‘बाहर-भीतर’ रंगे-रंगाये खातिर हमार हार्दिक मंगलकामना !
– अशोक द्विवेदी
संपादक, पाती

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