keshav-mohan-pandey

– केशव मोहन पाण्डेय

जमाना बदलऽता, एकर लछन शहर से दूर गाँवो-देहात में लउकऽता. अब ठेंपों छाप लोग के बात-व्यवहार में जमाना के नवका रूप झलकेला. सुन्नर बाबा ढेर पढ़ले ना रहले, बाकीर ऊ करीकी अक्षर के भँइस ना समुझस. पतरा-पोथी के अक्षर-खेल बुझाऽ जाव. सतनारायन भगवान के कथा ईयाद कइले रहलें. ओह में अउरी नीति-नेह आ नेम के उपकथा जोड़ के अपना पंडिताई के प्रमान परोस के कतहूँ आपन आधिपत्य जमा लेस. सगरी जवार में आपन विजय-पताका फहरा लेहले रहलें. गँवई लोग नीति के कथा से अमृतपान के मजा लेला, से बाबे ओह लोग खातिर सबले योग्य कथा-वाचक रहलें. पंडिताई से ढेर तऽ ना, बाकिर घर के गाड़ी डगरत रहल. थोर-ढेर खेतो रहल. खेत से जवन ऊपजे, ऊ सगरी उनके आँख के पुतरी विजय के पढ़ाई के सुपूर्द हो जाय.

सुन्नर बाबा के उठल-बइठल बड़-बड़ लोगन में होखे, से ऊ पढ़ाई के हुनर आ महिमा जानत रहलें. ऊ बड़ा लगन से विजय के शहर भेज के पढ़वलन. जब ऊ बी.ए. क के घरे अइले त बाबा के साथे उनके धरमपत्नी रूपो के छाती फूला गइल.

ई गाँव गंडक के कछार पर बसल बा. एह माटी के धन बालू आ बल बैल रहले सँ. लोग बजारहूँ जाए खातिर खूब सपराई करेला आ ‘टायर’ नाध के, सगरो दिन बिता के ओह लोग के बाजार करे के पड़ेला. विकास के नाम पर एह गाँव में बिजली, अस्पताल, इस्कूल आ प्रशासन के बदले गड़हा, बेहाया, झउआ, पटेर आ डाकुअन के छोह रहल. ईहवाँ अभाव चारू ओर बतीसी देखा के खिलखिलात रहल.

सुन्नर बाबा के हियरा में अभावो भरत एह गाँव आ एह माटी खातिर बड़ा आदर ह. भले माटी बलुए बा त का ह, ऊ माटी के महत्त्व समझेलन. ऊ समझेलन कि माटी महतारी ह, आ कवनो माटी चाहें महतारी बंजर होखे के ना चाहेले. उनके ईयाद बा कि एही माटी पर उनके पुरखनो के माटी लागल बा. कि एही माटी पर कबो खेंसारियो खनगर ना होखे, जहाँ आज एहीजा के जीवट लोगन के साहस आ पंपींगसेट के छोह से गेहूँओ लहलहाला. हर साल देखे के मिलेला सगरी फसल के कटइलो पर रहर के गदराइल लहर मन में हिलोर मारत रहेला. काहें कि सगरी फसल के बाद रहर जवान होले.

विजय एह टोला के पहिला जवान रहले, जे बी.ए. ले पढ़ल रहले. ऊ जब शहर से पढ़ के अइले त सुन्नर बाबा के लागल कि उनके बरीसन से चलत एगो लमहर तपस्या पूरा हो गइल. कबो-कबो खुशीओ मिलला पर बीतल बात नजरी के सोंझा नाच-नाच के आपन ईयाद दिआवेले. . . . सुन्नर बाबा के इयाद बा कि जब विजय छोट रहलन तब के तरे उनकर देख-रेख भइल. रूपा कई-कई बेरा ले चुल्ह जरावे खातिर सोंचते रहि जासु. ना कवनो बहाना मिले, ना कवनो व्यवस्था होखे. कबो-कबो खेंसारी उसीन के नून-मरीचा के साथे केहू तरें नटई के नीचे सरकावल जाय. कहीं पतरा देखला पर एक-आध सेर सीधा मिले त हाँड़ी पर परई बाजे. बाबा के ओह दिन रसगुल्ला नियर मीठ लागे, जहिया कहीं से जग-परोजन के आज्ञा मिले. उनका ईयाद बा कि जब ऊ खाए जास तऽ बड़का फुलहा लोटा ले के जास. नाक पर ले चढ़वला के बाद दही भर लोटा बोझ के चिउड़ा के मोटरियो बन्हा जाव. खेत से कबो-कबो जौ-खेंसारी ऊपज जाव तऽ जेठ-आषाढ़ के दूपहरिया में सतुआ मिल जाव. बाकिर बेटा के पढ़ाई में कवनो कोतहाई ना होखे. दछिना-जजमानी से जवन पइसा मिले ऊ विजय के पढ़ाई में झोंका जाव. बहाना कवनो होखे, सुन्नर बाबा में परब-त्योहार आ संस्कारन से ढेर मोह रहल. तब्बो ऊ घर के खर्चा में कोतहाई क लेस बाकिर विजय के खर्चा जरूर जाव.

अब, जबकि विजय बी. ए. क के आ गइल बाड़े त चारू ओर खुसुर-फुसुर होता. शिवचन काल्ह कहत रहलन, – ‘का बाबा? . . . अब त हियरा गदगद बा नु? . . . बेटा के पढ़ा के एगो लमहर जस के काम कइले बानी.’

रमुना कहत रहल, – ‘ए बाबा! . . हमरा बाबुजी से कह ना दीं कि ऊहो हमरा के पढ़वावस.’

बाबा के एह तरे के ढेर प्रशंसा, खुशी आ अमरख के सतमेझरा बात सुने के मिले. उनके त गोड़ से मुड़ी ले हुलास हिलोर मारत रहे. ऊ बड़ा बारीकी से बुझत रहलन कि आज के जुग में पढ़ला-लिखला के माने नोकरी मिलल ना ह, बाकिर पढ़ाई अपने में एगो अनमोल रतन ह.

विजय एतना पढ़ला के बादों अपना बाबुजी के खेती-बाड़ी के काम में उनकर हाथ बटावे लगलन. उनके जजमानी ना भावेला, बाकिर अपना बाबुजी के ना मना करेलन. ऊ स्वतंत्र विचार में भरोसा रखेलन. उनके खातिर स्वतंत्रता के मतलब बाउर के विरोध आ नीक से नेह ह. उनके परब-त्योहार आ संस्कारन से ढेर लगाव ना ह, बाकिर अवसर अइला पर होखे वाला विधि-विधान से मनो ना हटा पावेलन. सुरसती के साथे व्यवहारो के बुझे वाला नजर उनके आँख में बा. . . एह टोला के अन्हार में अँजोर के एकलौता किरिन समझ के जगह-जगह से देखनहरू लोग आवे लागल. अभीन लगनदेव उठले ना कि देखनहरू से दुआर कोड़ाए लागल.

लइका सुन्दर, जवान आ गुनी बा, से रूपा आ सुन्नर बाबा के मन में धीरे-धीरे भय पइसे लागल कि जवानी के बउराइल डेग कहीं बिछिल ना जाव. . . अब बिछलइला के पहिलहीं बेड़ी लगावे के विचार बन गइल. . . . विजय के बिआह सुधा से तय हो गइल. सुधो इंटर ले पढ़ले, गुनी आ सुन्दर रहली. विजय अपनहीं देखलन आ बिआह के दिन पड़ गइल.

विधि प विधि होखे लागल. विजय नाक सिकोड़वला के बादो विधिन में कवनो बिघिन ना डललन. तिलक से बिआह ले के विधि उनकरो मन मोह लिहलस. . . चाहें रघुवर के बहाने तिलक चढ़ल होखे, चाहे कोसिला मन के बहाने सगुन उठल. चाहे मटकोर के बेरा एक अँजुरी पानी में समुन्दर टकटोराइल होखे, चाहे लोढ़ा के मुँह पर नचा-नचा के परिछावन कइल होखे. द्वारपूजा, सेनुरदान, कोहबर . . . . ई विधिन से विजय के अपने विराट संस्कृति के सामने माथा नेवा देबे के पड़ल. अपने जीवन-संगिनी के विदाई के रूप देख के त ऊ मन के ढेर गहराई ले आहत हो गइलन.

ऊहाँ पंडित जी से विदाई के जतरा देखावल गइल त किरीन फूटला के पहिलहीं के जतरा रहल. ओने पूरूब के दुआरी से सूर्य देवता दुनिया में आवत रहलन, एने सुधा अपने असली जिनिगी जिए खातीर लइकनी से औरत के दुनिया में जात रहली. सहिए हऽ कि पति के पहिलकही छूअन से लइकनी औरत बन जाले.

विजय के ससुराल से घर ले छव-सात घंटा के रास्ता रहल, से बीच में कई जगह सुस्ता के चाय-पानी भइल. सुधा के भाई विनय कई बेर उनसे कुछ खाये-पीये के पूछलन, बाकिर भूख पीआस लगला के बादो ‘केहू चटोर ना कहे’ से लाजे एको शबद ना कहली. . . . औरतन के सबसे अनमोल गहना लाज ह, बाकिर पता ना अपना कवना-कवना करम-कुकरम के औरत लाज समझेली सों, ई कवनो मरद नइखन समझ सकत.

सुन्नर बाबा के दुआर पर दूलहिन के सवारी बारे बजे जुमि गइल. अब उतारे के पतरा देखल गइल. दू घंटा बाद बढि़याँ साइत रहल. हितई से आइल आ टोला भर के लइकनी झमेला लगवले रहली सँ. सुहागिन लोग सुधा के माँग बहोरल लोग.. . . दू घंटा बाद दउरी में डेग डालत, विजय के पाछे-पाछे सुधा सती माई के अथाने पहुँचली. ऊहाँ कोहबर के विधि भइला के बाद हथबोरउआ के तैयारी होखे लागल. हथबोरउआ, ई अइसन विधि ह, जवना के बाद घर में पहिला पग रखे वाली पतोह पहिला अनाज खाले. एह विधि के बाद जिनिगी भर खातिर एह घर के अन्नो से रिश्ता जुड़ जाला.

जिनिगी भर पतरा में जीए वाला सुन्नर बाबा के घरे कवनो विधि बिना साइत के ना होला. साइत देखे खातिर पतरा उघराइल त हथबोरउआ के साइत साँझ के रहल. दही-चीनी तैयार कइल रखा गइल. . . . ओने भूख-पिआस से सुधा के हाल बिगड़त रहल. मुँख सूख के चोकटाइल आम हो गइल रहे. . . दूलहिन अइला के उछाह में केहू उनकर बिगड़त हालत ना देखल. . . विजय दुआरे जा के निखहरे चैकी पर छितरा गइलन. ना तरे के फिकिर रहल, ना गोड़वारी-मुड़वारी के आ ना ठाँव के. सभे हित-नात एने ओने आन्हीं में उधिआइल गेहूँ के बोझा नियर छितराइल रहलें. घर के मेहरारू खाना बनावे में टर्र रहली सँ. ईयाद पड़ल त रूपा अपना पतोह के कुल के, मेहरारू के आ पत्नी के मान-मरजाद समझावे गइली. सुधा के बिगड़त दशा देख के पूछली, – ‘का हो सुधा, . . तबीयत ठीक नइखे का?’
कई बेर पूछला के बाद सुधा के मुँह से धीरे से निकलल, – ‘पिआस लागल बा.’
ई सुन के रूपा के दुख त जरूर भइल, बाकिर हथबोरउआ के पहिले पतोह ससुरा में एक्को बूंद पानी ले जीभ पर ना ध सकेले. कहली, – ‘तनी अउरी धीरज रखऽ. दू घंटा बाद हथबोरउआ के साइत बा.’

सुधा हिम्मत हार गइल रहली. अपने सास के ई वचन सुनतहीं गिर पड़ली. रूपा करेजा काढ़ के चिलइली. सभे आपन काम-धंधा छोड़ के धावल. दुआरे से मर्दानो लोग के बोलावल गइल. मुड़ी आ मुँह पर पानी छिड़काइल. सुधा के होश में आइल देख के रूपा दउड़ के सुन्नर बाबा से पूछली, – ‘एक गिलास पानी पिआ दिहल जाव?’
साइत के दीवाना सुन्नर बाबा आपन कसैलिया आँख बहरी क के कहलन, – ‘साइत के पहिले कुछू ना.’
विधि के ई बंदिश विजय के बोले पर मजबूर क दिहलस. कहलन, – ‘केहू मरियो जाय त का ह, . . . साइतिए देख के अगियो दिआई.’
बेटा के व्यंग्य बाबा के करेजा बेध दिहलस. आपन रोआब ना फीका पड़ जाव, से डपटलन, – ‘तू चुप रहऽ. जब विधि-विधान नइख जानत, त मुँह मत खजुआवऽ.’
‘चुल्ही में झोंकाव तहार ई विधि-विधान, जवन जान लेहला पर उतारू बा.’
एतना कहि के एक कचोरा पानी ले के विजय चललन तले उनकर माई डेहरी पर धइल नदिया के दही में हाथ डुबा के चटा देहली. सुन्नर बाबा आग बरल आँख से रूपा के देखलन त आपन निर्णय सुनवली, – ‘कवनो विधि जान लेबे के ना कहेला, आ हम कवनो विधियो तुरे के ना कहेब.’
सुन्नर बाबा के मुँहे बवा गइल. उनका बुझाइल कि ई उनकर अनपढ़ रूपा देवी नइखी बोलत. ई बानी कवनो देवी के ह. रूपा के बात बाबा के करेजा छू लिहलस. करेजा के कवनो कोना से प्रेम के पवित्र लहर फूटल, जवना में बाबा के रोंआ-रोंआ ले धोआ गइल. ओह लहर में डूब के तन प्रसन्न आ मन निर्मल हो गइल.


तमकुही रोड, सेवरही, कुशीनगर, उ. प्र.
संपर्क – kmpandey76@gmail.com

Advertisements